CBSE Class 12 Hindi Elective अपठित बोध अपठित गद्यांश

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CBSE Class 12 Hindi Elective अपठित बोध अपठित गद्यांश

अपठित-बोध के अंतर्गत विद्यार्थी को किसी अपठित गद्यांश तथा काव्यांश को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के सही विकल्पों वाले प्रश्नों के उत्तर चुनने होते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर देने से पूर्य अपठित को अच्छी प्रकार से पढ़कर समझ लेना चाहिए। जिन प्रश्नों के उत्तर पूछ्छे गए हैं बे उसी में ही छिपे रहते हैं। सटीक विकल्प वाले उत्तर का ही चुनाव करना चाहिए। अपठित का शीर्षक भी पूछा जाता है। शीर्षक को अपठित में व्यक्त भावों के अनुरूप ही चुनना चाहिए। शीर्षक कम-से-कम शब्दों वाला चुनना चाहिए। शीर्षक अपठित का मूल-भाव भी स्पष्ट करने वाला होना चाहिए।

अपठित गदूयांश :

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प का चनाय कीजिए –

1. इतिहास में विरासत में आपको भारतीय संगीत जैसी अमूल्य निधि मिली है। अन्य देशों के संगीतों की अपेक्षा इसमें जो विशिष्टता है, वह उन मान्यताओं के कारण है जो संगीव के संबंध में हमारे पूर्वजों की थी। भारत में संगीत क्षणिक आमोद-प्रमोद या अतृप्त तृष्णा की वस्तु न होकर, समस्व ब्रहमांड से ऐक्य का आभास है, आनंद प्रदान करने वाली आध्यात्मिक साधना है और मानव को ब्रह्म तक ले जाने बाला मार्ग है। संगीत के इस स्वभाव और ध्येय को हमारे देश के लोगों ने हमारी सम्यता के प्रारंभ में ही पहचान लिया था और संगीत का विकास इन्हीं आदर्शों के अनुकूल किया था।

उन्होंने संगीत और जीवन में किसी प्रकार की दीवार न खड़ी की। यह कहना अनुचित न होगा कि उन्होंने संगीत को हमारे जीवन में इस प्रकार बुन दिया कि सहसाब्दियों के पश्चात भी वह उसका अविच्चिन्न अंग बना हुआ है। संसार में संभवत: ऐसा अन्य कोई देश नहीं है जहाँ संगीत इतने पुराने युग से जन-जीवन में इतना व्याप्त हो जितना कि भारत में। भारतवासियों के अधिक संगीतप्रेमी होने की बात का उल्लेख मेगस्थनीज भी कर गया है। दूसरी शताब्दी ईई०पू० में लिखे गए ‘इंडिका’ नामक अपने ग्रंध में एरियन मेगस्थनीज का यह कथन उद्धृत है कि “सब जातियों की अपेक्षा भारतीय लोग संगीत के कहीं अधिक प्रेमी हैं।”

सहस्बों वर्ष से हमारे घरेलू और सांसारिक जीवन में लगभग सभी काम किसी-न-किसी प्रकार के संगीत से प्रारंभ होते रहे हैं। जन्म से लेकर मृत्यु वक यह संगीत हमारे साथ बना रहता है। जिस दिन बालक संसार में अपनी आँखें खोलता है, उस दिन से ही संगीत से भी उसका परिचय हो जाता है। नामकरण, कर्णछेदन, विवाह आदि में तो संगीत होता ही है। ऐसा कोई तीज-त्योहार नहीं होता, ऐसा कोई पर्व और संस्कार नहीं होता जिसमें संगीत न हो।

घर में ही क्यों? हमारे यहाँ खेत में और चौपाल में, चक्की चलाने और धान कूटने के समय भी संगीत चलता ही रहता है। यह हमारे जन-जीवन के उल्लास को प्रकट करने का तो प्रभावी साधन है ही साथ ही साथ उसको गतिमान बनाने का भी प्रबल अस्त्र है। संगीत रचनात्मक कार्यों में अग्रसर होने की सामूहिक स्फूरि और प्रेरणा प्रदान करता है और वह सामूहिक शक्ति देता है जो हमें उन कायों को करने के योग्य बना देती है जो अकेले या समूह में संगीत की प्रेरणा के बिना न कर पाते।

1. गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक चुनिए –
(क) सांसारिक जीवन
(ख) मान्यताएँ
(ग) स्फूर्ति और प्रेरणा
(घ) संगीत का महत्व
उत्तर :
(घ) संगीत का महत्व

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2. भारतीय संगीत में अन्य वेशों के संगीतों की अपेक्षा क्या-क्या विशिष्टताएँ हैं?
(क) ब्रह्मांड से ऐक्य का आभास है।
(ख) आनंद प्रदान करने वाली आध्यात्मिक साधना है।
(ग) मानव को ब्रह्म वक से जाने वाला मार्ग है।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प।

3. भारतीयों की संगीतप्रियता का उल्लेखा किस प्राचीन ग्रंथ में किया गया है?
(क) संजीविका ग्रंथ
(ख) चरकसंहिता
(ग) इंडिका ग्रंथ
(घ) महाभारत
उत्तर :
(ग) इंडिका ग्रंथ

4. भारतीयों के दिन-प्रतिविन के कायों में संगीत की भूमिका का उबाहरण है –
(क) खेतों में संगीत चलना
(ख) चौपालों में संगीत चलना
(ग) चक्की चालाने और धान कूटने के समय संगीत चलना
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प

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5. ‘भारतीय संगीत मानव को छाहम तक ले जाने वाला मार्ग है।’ कबन का आशय है –
(क) यह व्यक्ति को समाधिस्थ होने में सहायता करता है।
(ख) भारतीय संगीत समस्त विश्व व मानवता से एकात्मकता का संबंध स्थापित करता है।
(ग) संगीत के द्वारा मनोरंजन ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक साधना द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
(घ) विकल्प (ख) और (ग) सही हैं।
उत्तर :
(घ) विकल्प (ख) और (ग) सही हैं।

6. भारतीय संगीत मानव को कहाँ तक ले जाने बाला मार्ग है?
(क) ब्रह्म तक
(ख) मानव की पहुँच तक
(ग) संगीत-सागर की पहुँच तक
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(क) ब्रह्म तक

7. ‘आध्यात्रिकता’ में उपसर्ग और प्रत्यय अलग करके चुनिए-
(क) अध्या, इता
(ख) अध, एकता
(ग) अधि, इक
(घ) अध्य, ता
उत्तर :
(ग) अधि, इक

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8. मिभ वाक्य चुनिए –
(क) भारत में संगीत समस्त ब्रहमांड में ऐक्य का आभास है।
(ख) ऐसा कोई तीच-त्योहार नहीं होता, ऐसा कोई पर्व और संस्कार नही होता जिसमें संगीत न हो।
(ग) नामकरण, कर्णछेदन, विवाह आदि में संगीत होता है।
(घ) जन्म से मृत्यु तक संगीव हमारे साथ बना रहता है।
उत्तर :
(ख) ऐसा कोई तीच-त्योहार नहीं होता, ऐसा कोई पर्व और संस्कार नही होता जिसमें संगीत न हो।

9. मेगस्थनीज्ञ का कौन-सा कथन उद्धृत किया गया है?
(क) भारत में संगीत का बोलबाला केवल कुछ त्योहारों में ही होता है।
(ख) सब जातियों की अपेक्षा भारतीय लोग संगीत के कहीं अधिक प्रेमी हैं।
(ग) धारत के लोग संगीत से दूर भागते हैं।
(घ) सब जातियों में संगीत के प्रेमी कम मिलते हैं।
उत्तर :
(ख) सब जातियों की अपेक्षा भारतीय लोग संगीत के कहीं अधिक प्रेमी हैं।

10. संगीत के विषय में कथन और कारण की सत्यता परखिए –
कथन – संगीत रचनाइमक कायों में अग्रसर होने की सामूहिक स्कूरित और प्रेरणा प्रदान करता है।
कारण – यह हमें उन कायों को करने के योग्य बना देता है जो अकेले या समूह में इसकी प्रेरणा के बिना न कर पाते।
(क) कथन और कारण दोनों असत्य हैं।
(ख) कथन और कारण दोनों सत्य हैं।
(ग) कथन सत्य पर कारण असत्य है।
(घ) कथन असत्य है पर कारण सत्य है।
उत्तर :
(ख) कथन और कारण दोनों सत्य हैं।

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2. हिंदुस्तान बहुभाषी देश है। इस देश पर विदेशी भाषा के बढ़ते हुए प्रभुत्व और महत्व को देखते हुए विनोबा जी ने कहा था कि अंग्रेजी दुनिया के लिए एक खिड़की है। घर में केवल एक खिड़की रखेंगे तो सर्वाग विश्वदर्शन नहीं होगा। कम-से-कम आपको सात खिड़कियाँ रखनी चाहिए। झंग्लिश, फ्रेंच, जर्मन और रशियन-ये चार यूरोप की, चीनी और जापानी में दो पूर्व की और एक अरबी-इंरान से लेकर सीरिया तक का जो विस्तार है उसके लिए। इस तरह सात खिड़की रखेंगे तो दुनिया का सही दर्शन होगा, अन्यथा एकांगी दर्शन से अंग्रेज़ी भाषा के अधीन हो जाएँगे।

हिंदी जिसे सरहपा, अमीर खुसरो से लेकर भारतेंदु युग वक सिंचित और पोषित कर विकसित किया गया और गांधी जी जैसी हस्तियों की ओर से जातीय स्वाभिमान और साझी संस्कृति का वाहक बनाया गया। परंतु लार्ड मैकाले ने हिंदुस्तान में शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेज्जी भाषा रखकर एक ऐसा नौकर वर्ग चाहा जो जन्म, रक्त, रंग से भले हिंदुस्तानी हो, परंतु रुचि, भाषा, विचार और भावना से अंग्रेजी से प्रभावित थे। परिणाम यह आया कि त्रिटिश हुकूमत के समय ऐसी नौकरशाही अस्तित्व में आई जो अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त हिंदुस्तानी युवा वर्ग जो शासक और प्रजा के बीच रहकर समझाने का कार्य करते रहे।

धीरे-धीरे हिंदुस्तान में अंग्रेजी का प्रभाय व्यापक रूप से लक्षित होने लगा। आज हिंदी भाषा और भारतीय भाषाएँ हाशिए पर और हीनता बोध से ग्रस्त होती जा रही हैं। परंतु विनोबा जी के चिंतन में स्पष्ट दर्शन था कि अंग्रेजी भाषा चाहे कितनी समर्थ क्यों न हो परंतु हिंदी विचार तो हिंदी भाषा से अधिक अच्छी तरह कैसे व्यक्त कर सकेगी।

1. बहुभाषी वेश से आपका क्या अभिप्राय है?
(क) अनेक प्रकार की भाषाएँ बोली, लिखी और पढ़ी जाती हैं।
(ख) जहाँ देशी भाषाएँ बोली और पढ़ी जाती हैं।
(ग) जहाँ केवल विदेशी भाषाएँ बोली और पढ़ी जाती हैं।
(घ) जहाँ अनेक भाषाओं में राजकीय काम होता है।
उत्तर :
(क) अनेक प्रकार की भाषाएँ बोली, लिखी और पढ़ी जाती हैं।

2. सवांग विश्व-दर्शन से आप क्या समझते है?
(क) विश्व में चुने हुए देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
(ख) केवल बड़े देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
(ग) विश्व के शक्तिशाली देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
(घ) विश्व के अनेक देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
उत्तर :
(घ) विश्व के अनेक देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करना।

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3. विनोषा जी एकांगी वर्शन के पक्ष में क्यों नहीं थे?
(क) क्योंकि विश्व को विस्तृत रूप से समझना कठिन हो जाएगा।
(ख) क्योंकि कहीं देश किसी एक भाषा, संस्कृति और सभ्यता के अधीन न हो जाए।
(ग) क्योंकि देश कई भाषाओं की अधीनता से कहीं मुक्त न हो जाए।
(घ) (क) और (ख) विकल्प।
उत्तर :
(घ) (क) और (ख) विकल्प।

4. आप कैसे कह सकते हैं कि हिंदी साझी संस्कृति की वाहक है?
(क) क्योंकि सरहपा, अमीर खुसरो, भारतेंदु, महात्मा गांधी जैसी विभूत्वियों ने योगदान दिया।
(ख) क्योंकि एक ही धर्म की विभूतियों ने योगदान दिया।
(ग) क्योंकि सभी धमों, जातियों और संस्कृतियों का योगदान है।
(घ) (क) और (ग) विकल्प।
उत्तर :
(घ) (क) और (ग) विकल्प।

5. भारत में अंग्रेप्जी शिक्षा के पीछे किसकी भावना निहित थी?
(क) लॉर्ड इरविन
(ख) मैकाले की
(ग) ह्रफरिन
(घ) लुटबिंस
उत्तर :
(ख) मैकाले की

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6. भारत में मैकाले ने अंग्रेज्जी शिक्षा क्यों थोपी थी?
(क) ताकि अंग्रेजों द्वारा हिंदुस्तान पर शासन हो।
(ख) ताकि हिंदुस्तानियों द्वारा अंग्रेज्जों पर शासन हो।
(ग) ताकि अंग्रेज़ों द्वारा ब्रिटिश पर शासन हो।
(घ) ताकि हिंदुस्तानियों द्वारा हिंदुस्तान पर शासन हो।
उत्तर :
(घ) ताकि हिंदुस्तानियों द्वारा हिंदुस्तान पर शासन हो।

7. विनोधा जी के चिंतन का विषय क्या था?
(क) सभी भाषाओं को सम्मान मिलना चाहिए।
(ख) अंग्रेज्जी भाषा को अधिक सम्मान मिलना चाहिए।
(ग) हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं को बराबर सम्मान दिया जाना चाहिए।
(घ) हिंदुस्तानियों को अंग्रेजी का हिंदी के बराबर सम्मान करना चाहिए।
उत्तर :
(क) सभी भाषाओं को सम्मान मिलना चाहिए।

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8. गद्यांश का उचित शीर्षक चुनिए –
(क) सभी भाषाओं को सम्मान।
(ख) अंग्रेज्ती भाषा का प्रसार।
(ग) विनोबा का चिंतन।
(घ) अंग्रेज्री का हिंदी के बराबर सम्मान।
उत्तर :
(ग) विनोबा का चिंतन।

9. विकसित, हीनता – से प्रत्यय अलग चुनकर लिखिए-
(क) त, ता
(ख) ईत, नता
(ग) सित, ता
(घ) इत, ता
उत्तर :
(घ) इत, ता

10. त्रिटिश हुकूमत के समय नौकरशाही के लोगों का काम क्या था?
(क) त्रिटिश अधिकारियों को समझाने का कार्य करते रहे।
(ख) शासक और प्रजा के बीच रहकर समझाने का कार्य करते रहे।
(ग) केवल प्रजा के बीच रहकर समझाने का कार्य करते रहे।
(घ) केवल निरक्षर लोगों के बीच रहकर समझाने का कार्य करते रहे।
उत्तर :
(ख) शासक और प्रजा के बीच रहकर समझाने का कार्य करते रहे।

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3. इस सृष्टि का सिरमौर है मनुष्य, विधाता की कारीगरी का सर्वोत्तम नमूना। मानव को ब्रह्मांड का लघु रूप मानकर भारतीय दार्शनिकों ने ‘यत् पिण्डे तत् ब्रहमाण्डे’ की कल्पना की थी। उनकी यह कल्पना मात्र कल्पना नहीं थी, क्योंकि मानव-मन में जो विचार के रूप में घटित होता है, उसी का कृति रूप ही तो सृष्टि है।

परंतु वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाए तो मानव-शरीर की एक जटिल यंत्र से उपमा दी जा सकती है। जिस प्रकार यंत्र के एक पुजें में दोष आ जाने पर सारा यंत्र गड़बड़ा जाता है उसी प्रकार मानव शरीर के विभिन्न अवयवों में से यदि कोई एक अवयव भी बिगड़ जाता है तो उसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है। इतना ही नही गुर्द जैसे कोमल एवं नाजुक हिसे के खराब हो जाने से यह गतिशील यंत्र एकाएक अवरुद्ध हो सकता है और व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। एक अंग के विकृत होने पर सारा शरीर दड़ित हो, कालकवलित हो जाए-यह विचारणीय है।

यदि किसी यंत्र के पुर्जे को बदलकर उसके स्थान पर नया पुर्जा लगाकर यंत्र को पूर्ववत सुचारु एवं व्यवस्थित रूप से क्रियाशील बनाया जा सकता है तो शरीर के विकृत अंग के स्थान पर नव्य निरामय अंग लगाकर शरीर को स्वस्थ एवं सामान्य क्यों नहीं बनाया जा सकता? शल्य-चिकित्सकों ने इस दायित्वपूर्ण चुनौती को स्वीकार किया तथा निरंतर अध्यवसायपूर्ण साधना के अनंतर अंग-प्रत्यारोपण के क्षेत्र में सफलता प्राप्त की। अंग-प्रत्यारोपण का उद्देश्य है कि मनुष्य दीर्घायु प्राप्त कर सके।

यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि मानव-शरीर हर किसी के अंग को उसी प्रकार स्वीकार नहीं करता, जिस प्रकार हर किसी का रक्त उसे स्वीकार्य नहीं होता। रोगी को रक्त देने से पूर्व रक्त-वर्ग का परीक्षण अत्यावश्यक है। इसके साथ ही अंग-प्रत्यारोपण से पूर्व ऊतक-परीक्षण भी अनिवार्य है। आज का शल्य-चिकित्सक गुर्द, यकृत, आँत, फेफडे और हदय का प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक कर रहा है। साधन-संपन्न चिकित्सालयों में मस्तिष्क के अविरिक्त शरीर के प्रायः सभी अंगों का प्रत्यारोपण संभव हो गया है। कौन जाने कल हम जीता-जागवा मनुष्य ही प्रयोगशाला में बना सकें।

1. गव्यांश को पढ़कर एक उचित शीर्षक चुनिए –
(क) चिकित्सा और अंग प्रत्यारोपण
(ख) प्रयोगशालाअं की उपयोगिता
(ग) मानव रक्त की जरूरत
(घ) मानव शरीर
उत्तर :
(क) चिकित्सा और अंग प्रत्यारोपण

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2. सृष्टि का लघु रूप किसे कहा गया है?
(क) चिकित्सा को
(ख) मानय को
(ग) शल्य-चिकित्सक
(घ) विज्ञान को
उत्तर :
(ख) मानय को

3. अंग प्रत्यारोपण के विषय में कथन और कारण की सत्यता परखिए। –
कथन – शल्य चिकित्सकों ने अंग प्रत्यारोपण करके सफलता प्राप्त की।
कारण – ठन्होने मनुष्य को दीघार्यु बनाने के लिए निरंतर साधना की।
(क) कथन और कारण दोनों असत्य हैं।
(ख) कथन और कारण दोनों सत्य हैं।
(ग) कथन सत्य पर कारण असत्य।
(घ) कथन असत्य पर कारण सत्य है।
उत्तर :
(ख) कथन और कारण दोनों सत्य हैं।

4. सृष्टि किसे कहा गया है?
(क) मानव की कल्पित विचारधारा का संसार।
(ख) मानव-मन में विचारों के रूरप में घटित होने का कृति रूप।
(ग) मानव की बुदधि से उपजी एक कपोलकल्पित विचारधारा।
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं।
उत्तर :
(ख) मानव-मन में विचारों के रूरप में घटित होने का कृति रूप।

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5. ‘प्रत्यारोपण’ में उपसर्ग है –
(क) प्र
(ख) प्रति
(ग) ति
(घ) प्रती
उत्तर :
(ख) प्रति

6. भारतीय वार्शनिकों ने क्या कल्पना की थी?
(क) मानव को ब्रह्मांड का लघु रूप मानकर यत् पिण्डे तत् व्रह्माण्डे’ की कल्पना की थी।
(ख) मानव को ब्रह्मांड का दीर्घ रूप की कल्पना की थी।
(ग) मानव को ब्रह्मांड के तुच्छ रूप की कल्पना की थी।
(घ) ये सभी विकल्प सहीं हैं।
उत्तर :
(क) मानव को ब्रह्मांड का लघु रूप मानकर यत् पिण्डे तत् व्रह्माण्डे’ की कल्पना की थी।

7. किसने दायित्बपूर्ण चुनौती को स्वीकार किया तथा निरंतर अध्यवसायपूर्ण साथना के अनंतर अंग-प्रत्यारोपण के क्षेत्र में सफलता प्राप्त की?
(क) शल्य-चिकित्सकों ने
(ख) मेडिसिन कंपनियों ने
(ग) स्वास्थ्य मोंत्रियों ने
(घ) प्रसुति रोग चिकित्सकों ने
उत्तर :
(क) शल्य-चिकित्सकों ने

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8. अंग-प्रत्यारोपण से पहले किस परीक्षण की आवश्यकता होती है?
(क) ऊतक-परीक्षण
(ख) मस्तिक्क परीक्षण
(ग) रक्त परीक्षण
(घ) मनोवैज्ञानिक परीक्षण
उत्तर :
(क) ऊतक-परीक्षण

9. आज का शल्य-चिकित्सक किन अंगों का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण कर रहा है?
(क). सभी बड़े अंगों का
(ख) केवल फेफड़े और हद्य का
(ग) केवल गुर्दे, यकृष का
(घ) गुर्द, यकृत, औत, फेफड़े और हुदय का
उत्तर :
(घ) गुर्द, यकृत, औत, फेफड़े और हुदय का

10. विभिन्न अवयवों में से यदि कोई एक अवयव भी बिगड़ जाता है तो उसका प्रभाव किस पर पड़ता है?
(क) केवल नाज़क अंगो पर ही पड़ता है।
(ख) फेफड़े और हद्य पर ही पड़ता है।
(ग) पूरे शरीर पर पड़ता है।
(घ) आँत, फेफड़े और हदय पर पड़ता है।
उत्तर :
(ग) पूरे शरीर पर पड़ता है।

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4. यह सत्य है कि दोनों पक्षों के वीर इस युद्ध को धर्मयुद्ध मानकर लड़ रहे थे, किंतु धर्म पर दोनों में से कोई भी अडिंग नहीं रह सका। ‘लक्ष्य प्राप्त हो या न हो, किंतु हम कुमार्ग पर पाँव नहीं रखेंगे’-इस निष्ठा की अवहेलना दोनों और से हुई और दोनों पक्षों के सामने साध्य प्रमुख और साधन गौण हो गया। अभिमन्यु की हत्या पाप से की गई तो भीष्म, द्रोण, भूरिश्रवा और स्वयं दुर्योधन का वध भी धर्मसम्मत नही कहा जा सकता। जिस युद्ध में भीष्म, द्रोण और श्रीकृष्ण विद्यमान हों, उस युद्ध में भी धर्म का पालन नहीं हो सके, इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि युद्ध कभी भी धर्म के पथ पर रहकर लड़ा नहीं जा सकता।

हिंसा का आदि भी अधर्म है, मध्य भी अधर्म है और अंत भी अधर्म है। जिसकी आँखों पर लोभ की पट्टी नहीं बँधी है, जो क्रोध और आवेश अथवा स्वार्थ में अपने कर्तव्य को भूल नहीं गया है, जिसकी आँख साधना की अनिवार्यता से हट कर साध्य पर ही केंद्रित नहीं हो गई है, वह युद्ध जैसे मलिन कर्म में कभी भी प्रवृत्त नही होगा। युद्ध में प्रवृत्त होना ही इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने रागों का दास बन गया है, फिर जो रागों की दासता करता है, वह उनका नियंत्रण कैसे करेगा।

अगर यह कहिए कि विजय के लिए युद्ध अवश्यंभायी है तो विजय को मैं कोई बड़ा ध्येय नहीं मानता। जिस ध्येय की प्राप्ति धर्म के मार्ग से नहीं की जा सकती, वह या तो बड़ा ध्येय नहीं है अथवा अगर है तो फिर उसे पाप के मार्ग से पाने का प्रयास व्यर्थ है। संग्राम के कोलाहल में चाहे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा हो, किंतु आज में अपनी आत्मा की इस पुकार को स्पष्ट सुन रहा हूँ कि युधिष्ठिर। तुम जो चाहते थे वह वस्तु तुहहें नहीं मिली।

संग्राम तो जैसे-तैसे समाप्त हो गया किंतु उससे देश भर में हिंसा की जो मानसिकता फैली, उसका क्या होगा? क्या लोग हिसा के खेल को दुहराते जाएँगे अथवा यह विचार कर शांति से काम लेंगे कि शत्रुओं का भी मस्तक उतारना बर्बरता और खंगलीपन का काम है।

1. गद्यांश को पढ़कर एक उचित शीर्षक चुनिए-
(क) धर्मयुद्ध
(ख) बर्चरता
(ग) महासंग्राम
(घ) हिंसा
उत्तर :
(क) धर्मयुद्ध

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2. कौरव-पांडव युद्ध को क्या मानकर लड़ रहे थे?
(क) वीरता का युद्ध
(ख) बर्बरता का युद्ध
(ग) सुनियोजित अधर्म का युद्ध
(घ) धर्मयुद्ध
उत्तर :
(घ) धर्मयुद्ध

3. युद्ध में किस निष्ठा की अवहेलना दोनों पक्षों-कौरवों व पांडवों की ओर से हुई थी?
(क) धर्म पर अडिग रहेंगे।
(ख) कुमार्ग पर पाँव नहीं रखेंगे।
(ग) हिंसा नहीं अपनाएँगे।
(घ) विकल्प (क) और (ख) सही हैं।
उत्तर :
(घ) विकल्प (क) और (ख) सही हैं।

4. युद्ध को कौन-सा कर्म माना गया है?
(क) पवित्र कम्म
(ख) मलिन कर्म
(ग) हिंसक कर्म
(घ) पूर्वनियोजित कर्म
उत्तर :
(ख) मलिन कर्म

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5. युत्ध को मलिन कर्म किसलिए माना गया है?
(क) क्योंकि हार तुच्छ योद्धाओं की होती है।
(ख) क्योंकि निकृष्ट योद्धाओं को ही मारा जाता है।
(ग) क्योंक वीरतापूर्ण कायों का प्रदर्शन होता है।
(घ) क्योंकि अधर्म और स्वार्थ का बोलबाला होता है।
उत्तर :
(घ) क्योंकि अधर्म और स्वार्थ का बोलबाला होता है।

6. युद्ध में सभी पक्ष अपना ध्यान किस पर केंद्रित करते हैं?
(क) शत्रु पर
(ख) साधना के बजाय साध्य पर
(ग) प्रदर्शन पर
(घ) अधर्म और स्वार्थ पर
उत्तर :
(ख) साधना के बजाय साध्य पर

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7. मनुष्य किसका दास बन गया है?
(क) परिस्थितियों का
(ख) इच्छाओं का
(ग) रागों का
(घ) कल्पनाओं का
उत्तर :
(ग) रागों का

8. अभिमन्यु का वध किस श्रेणी में आता है?
(क) न्याय की
(ख) धर्म की
(ग) पुप्य की
(घ) पाप की
उत्तर :
(घ) पाप की

9. शत्रुओं का भी मस्तक उतारना कैसा काम माना गया है?
(क) न्यायसंगत
(ख) धर्मसंगत
(ग) बर्बरता और जंगलीपन का काम
(घ) पुण्यजनित
उत्तर :
(ग) बर्बरता और जंगलीपन का काम

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10. लेखक के संबोधन के अनुसार किसे वांछित वस्तु नही मिली?
(क) भीष्म को
(ख) ध्रुतराष्ट्र को
(ग) युधिष्ठिर को
(घ) द्रोणाचार्य को
उत्तर :
(ग) युधिष्ठिर को

5. राष्ट्र केवल ज्ञमीन का टुकड़ा ही नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत होती है जो हमें अपने पूर्वजों से परंपरा के रूप में प्राप्त होती है। जिसमें हम बड़े होते हैं, शिक्षा पाते हैं और साँस लेते हैं- हमारा अपना राष्ट्र कहलाता है और उसकी पराधीनता व्यक्ति की परतंत्रता की पहली सीढ़ी होती है। ऐसे ही स्वतंत्र राष्टू की सीमाओं में जन्म होने वाले व्यकित का धर्म, जाति, भाषा या संप्रदाय कुछ भी हो, आपस में स्नेह होना स्वाभाविक है। राष्ट्र के लिए जीना और काम करना, उसकी स्वतंत्रता तथा विकास के लिए काम करने की भावना राष्ट्रीयता कहलाती है।

जब व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से धर्म, जाति, कुल आद् के आधार पर व्यवहार करता है तो उसकी दृष्टि संकुचित हो जाती है। राष्ट्रीयता की अनिवार्य शर्त है- देश को प्राथमिकता, भले ही हमें ‘स्व’ को मिटाना पड़े। महात्मा गांधी, तिलक, सुभाषचंद्र बोस आदि के कायों से पता चलता है कि राष्ट्रीयता की भावना के कारण उन्हें अनगिनत कष्ट उठाने पड़े किंतु वे अपने निश्चय में अटल रहे। व्यक्ति को निजी अस्तित्ब कायम रखने के लिए पारस्परिक सभी सीमाओं की बाधाओं को भुलाकर कार्य करना चाहिए तभी उसकी नीतियाँ-रीतियाँ राष्ट्रीय कही जा सकती हैं।

जब-जब भारत में फूट पड़ी, तब-तब विदेशियों ने शासन किया। चाहे जातिगत भेद्भाव हो या भाषागत-तीसरा व्यक्ति उससे लाभ उठाने का अवश्य यत्न करेगा। आज देश में अनेक प्रकार के आंदोलन चल रहे हैं। कहीं भाषा को लेकर संघर्ष हो रहा है तो कही धर्म या क्षेत्र के नाम पर लोगों को निकाला जा रहा है जिसका परिणाम हमारे सामने है। आदमी अपने अहं में सिमटता जा रहा है। फलस्वरूप राष्ट्रीय बोध का अभाव परिलक्षित हो रहा है।

1. प्रस्तुत गद्यांश का उचित शीर्षक चुनिए –
(क) राष्ट्रीयता की भावना
(ख) राष्ट्रीय विभूतियाँ
(ग) नीतियाँ-रीतियाँ
(घ) भाषा का संघर्ष
उत्तर :
(क) राष्ट्रीयता की भावना

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2. आदमी किसमें सिमटता जा रहा है?
(क) गौरव में
(ख) स्वार्थ में
(ग) अह में
(घ) पर काज में
उत्तर :
(ग) अह में

3. स्व को मिटाना क्यों आवश्यक है?
(क) स्व से व्यक्ति की दृष्टि संकुचित होती है।
(ख) स्व रखने वाला राष्ट्र विकास नहीं कर सकता।
(ग) ‘स्व’ को मिटाना देश की प्रगति में सहायक है।
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं।
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं।

4. “राष्ट्र केवल ज्जमीन का टुकड़ा ही नहीं बस्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत भी है।” का अर्थ है –
(क) राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है।
(ख) वह व्यक्तियों से बसा संस्कृति तथा विचार-क्षेत्र है।
(ग) जीवनमूल्य स्थापित करने का स्थल है।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प।

5. लेखक का राष्ट्रीयता से क्या आशय है?
(क) केवल राष्ट्र के लिए जीना और काम करना।
(ख) राष्ट् की स्वतंत्रता व विकास के लिए काम करने की भावना न होना।
(ग) राष्ट्र में रहकर मात्र स्वयं के लिए अच्छी प्रगति करना।
(घ) राष्ट्र की प्रगतिवादी नीतियों की आलोचना करना।
उत्तर :
(क) केवल राष्ट्र के लिए जीना और काम करना।

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6. राष्ट्रीय बोध का अभाव किन-किन रूपों में दिखाई देता है?
(क) भाषा के नाम पर आंदोलन चलना।
(ख) धर्म के नाम पर आंदोलन चलना।
(ग) क्षेत्र के नाम पर आंदोलन चलना।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प।

7. वेश की प्रगति कब होती है?
(क) जब व्यक्ति अपने अह को त्याग कर देश के विकास के लिए कार्य करता है।
(ख) जब व्यक्ति अपने लालचवश अपने विकास के लिए कार्य करता है।
(ग) जब व्यकित अपने परिवार को त्याग कर देश के विकास के लिए कार्य करता है।
(घ) जब व्यक्ति अपने गौरव को त्याग कर देश के विकास के लिए कार्य करता है।
उत्तर :
(क) जब व्यक्ति अपने अह को त्याग कर देश के विकास के लिए कार्य करता है।

8. मनुष्य व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण किसके लिए सोचता है?
(क) वह अपनी जाति, धर्म, क्षेत्र आद् के बारे में सोचता है।
(ख) वह दिल से देश के बारे में सोचता है।
(ग) वह जाति, धर्म, क्षेत्र से हटकर सोचता है।
(ब) इनमें से सभी।
उत्तर :
(क) वह अपनी जाति, धर्म, क्षेत्र आद् के बारे में सोचता है।

9. व्यक्तिगत स्वार्थ एवं राष्ट्रीय भावना के बारे में क्या सत्य है?
(क) परस्पर समर्थक तत्व हैं।
(ख) एक-दूसरे से मेल खाते है।
(ग) परस्पर विरोधी तत्व है।
(घ) एक दूसरे की सही व्याख्या करता है।
उत्तर :
(ग) परस्पर विरोधी तत्व है।

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10. जब-जब भारत में फूट पड़ी, तब-तब क्या हुआ?
(क) भारत और उन्नवि करता गया।
(ख) भारतीयों ने भारतीयों पर ही शासन किया।
(ग) भारत को कोई फर्क नहीं पड़ा।
(घ) विदेशियों ने शासन किया।
उत्तर :
(घ) विदेशियों ने शासन किया।

6. हमारे देश ने आलोक और अधकार के अनेक युग पार किए हैं, परंतु अपने सांस्कृतिक उत्तराधिकार के प्रति वह नितांत सावधान रहा है। उसमें अनेक विचारधाराएँ समाहित हो गई, अनेक मान्यताओं ने स्थान पाया, पर उसका व्यक्तित्व सार्वभौम होकर भी उसी का रहा। उसके अंतर्गत आलोक ने उसकी वाणी के हर स्वर को उसी प्रकार उद्भासित कर दिया, जैसे आलोक हर तरंग पर प्रतिबिंबित होकर उसे आलोक की रेखा बना देता है। एक ही उत्स से जल पाने वाली नदियों के समान भारतीय भाषाओं के बाहय और आंतरिक रूपों में उत्सगत विशेषताओं का सीमित हो जाना ही स्वाभाविक था।

कूप अपने अस्तित्व में भिन्न हो सकते हैं, परंतु धरती के तल का जल तो एक हीगा। इसी से हमारे चिंतन और भावजगत में ऐसा कुछ नहीं है, जिसमें सब प्रदेशों के हृदय और बुद्धि का योगदान और समान अधिकार नहीं है। आज हम एक स्वतंत्र राष्ट्र की स्थिति पा चुके हैं, राष्ट्र की अनिवार्य विशेषताओं में दो हमारे पास हैं-भौगोलिक अखंडता और सांस्कृतिक एकता परंतु अब तक हम उस वाणी को प्राप्त नहीं कर सके हैं, जिसमें एक स्वतंत्र राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के निकट अपना परिचय देता है। जहाँ तक बहुभाषा-भाषी होने का प्रश्न है, ऐसे देशों की संख्या कम नहीं है जिनके भिन्न भागों में भिन्न भाषाओं की स्थिति है। पर उनकी अविच्छिन्न स्वरंत्रता की परंपरा ने उन्हें सम-विष्षम स्वरों से एक राग रच लेने की क्षमता दे दी है।

हमारे देश की कथा कुछ दूसरी है। हमारी परतंत्रता आँधी-तुफान के समान नहीं आई, जिसका आकस्मिक संपर्क तीव्र अनुभूति से अस्तित्व को कंपित कर देता है। वह तो रोग के कीटाणु लाने वाले मंद समीर के समान साँस में समाकर शरीर में व्याप्त हो गई है। हमने अपने संपूर्ण अस्तित्व से उसके भार को दुर्वह नहीं अनुभव किया और हमें यह ऐतिहासिक सत्य भी विस्मृत हो गया कि कोई भी विजेता विजित कर राजनीतिक प्रभुत्य पाकर ही संतुष्ट नही होता, क्योंकि संस्कृतिक प्रभुत्य के बिना राजनीतिक विजय न पूर्ण है, न स्थायी। घटनाएँ संस्कारों में चिर जीवन पाती हैं और संस्कार के अक्षयवाहक, शिक्षा, साहित्य, कला आदि हैं।

दीर्षकाल से विदेशी भाषा हमारे विचार-विनिमय और शिक्षा का माध्यम ही नहीं रही, वह हमारे विद्वान और संस्कृत होने का प्रमाण भी मानी जाती रही है। ऐसी स्थिति में यदि हममें से अनेक उसके अभाव में जीवित रहने की कल्पना से सिहर उठते हैं, तो आश्चर्य की बात नही। परलोक की स्थिति को स्थायी मानकर तो चिकित्सा संभव नहीं होती। राष्ट्र-जीवन की पूर्णता के लिए उसके मनोजगत को मुक्त करना होगा और यह कार्य विशेष प्रयल-साध्य है, क्योंकि शरीर को बाँधने वाली भृंखला से आत्मा को जकड़ने वाली भृंखला अधिक दृढ़ होती है।

आज राष्ट्रभाषा की स्थिति के संबंध में विवाद नहीं है, पर उसे प्रतिष्ठित करने के साधनों को लेकर ऐसी विवादैषणा जागी है कि साध्य ही दूर से दूरतम होता जा रहा है। विवाद जब तर्क की सीधी रेखा पर चलता है, तब लक्य निकट आ जाता है, पर जब उसके मूल में आशंका, अंवस्वास और अनिच्छा रहती है, तब कहीं न पहुँचना ही उसका लक्य बन जाता है।

1. अवतरण का उचित शीर्षक है।
(क) अनेक युग
(ख) राष्ट्रभाषा की स्थिति
(ग) अखंडता
(घ) विदेशी भाषा
उत्तर :
(ख) राष्ट्रभाषा की स्थिति

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2. हमारा देश प्रमुख रूप से किसके प्रति सावधान रहा है ?
(क) संपत्तिर्यों के उत्तरधिकार
(ख) सांस्कृतिक उत्तराधिकार
(ग) स्वतंत्रता के उत्तराधिकार
(घ) धार्मिक उत्तराधिकार
उत्तर :
(ख) सांस्कृतिक उत्तराधिकार

3. राष्ट्र की कौन-सी अनियार्य विशेषताएँ हमारे पास हैं ?
(क) भौगोलिक अखंडत्ता
(ख) सांस्कृतिक एकता
(ग) शैक्षणिक एकता
(घ) विकल्प (क) और (ख)
उत्तर :
(घ) विकल्प (क) और (ख)

4. कौन मंव समीर की भांति सास में समाकर शरीर में व्याप्त हो गई है?
(क) विचारथारा
(ख) कल्पना
(ग) परतंध्रवा
(घ) अखंडता
उत्तर :
(ग) परतंध्रवा

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5. राचनीतिक विजय किसके बिना न पूर्ण है न स्थायी?
(क) धार्मिक अनुष्ठान के बिना
(ख) कानूनी दाँव-पेंच के बिना
(ग) सांस्कृतिक प्रभुत्य के बिना
(घ) भौगोलिक नेतृत्व के बिना
उत्तर :
(ग) सांस्कृतिक प्रभुत्य के बिना

6. हमारे वेश की परतंत्रता किस प्रकार आई थी?
(क) आँधी की तरह
(ख) कलकल करती नदी की तरह
(ग) संकेत देकर,
(घ) धीरे-धीरे मानव के अस्तित्व को बस में करते हुए
उत्तर :
(घ) धीरे-धीरे मानव के अस्तित्व को बस में करते हुए

7. हमारी राष्ट्रभाषा की वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या क्या है ?
(क) कम प्रचारित होने की
(ख) राष्ट्रभाषा चुनने की
(ग) विश्व में व्याप्त होने की
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(ख) राष्ट्रभाषा चुनने की

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8. विवाद के तर्क की रेखा में चलने से क्या होता है?
(क) मानव उलझ जाता है।
(ख) लक्ष्य निकट आ जाता है।
(ग) पथ धुँधला दिखता है।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(ख) लक्ष्य निकट आ जाता है।

9. घटनाएँ किस पर चिर जीवन पाती हैं?
(क) संस्कारों में
(ख) विकारों में
(ग) मनोभावों में
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(क) संस्कारों में

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10. कौन-सी भाषा हमारे विद्वान और संस्कृत होने का प्रमाण मानी जाती है?
(क) हिंदी
(ख) संस्कृत
(ग) विदेशी भाषा
(घ) कोई नही
उत्तर :
(ग) विदेशी भाषा

7. पतझड़ ऋतु आने पर जेल के हमारे आँगन में नीम के पेड़ से पत्तों के गिरने पर मन में कभी-कभी चिंता होने लगती है कि यह पेड़ का काल आया है या उसका केवल कायापलट हो रहा है? यों तो पत्तों को गिरते देखकर मन में विषाद् का भाव उत्पन्न होना चाहिए, किंतु ऐसा बिलकुल नहीं होता, उलटा मजा आता है-पत्ते इतने झड़ते हैं मानो टिड्डी दल फैल गया हो, मालूम होता है पत्तो को कितने ही गोल-गोल चक्कर काटने पड़ते हैं उन्हें नीचे उतरने की थोड़ी-सी जल्दी नही होती।

और फिर गिरने के बाद् क्या वे चुपच्हप पड़े रहेंगे? नहीं, कदापि नहीं। छोटे बच्चे जिस प्रकार दौड़ने का और एक-दूसरे को पकड़ने का खेल खेलते है, उसी प्रकार ये पत्ते भी इधर-से-उधर और उधर-से-इधर गोल-गोल चक्कर काटते रहते हैं। हवा के झोंकों के साथ ये हँसते-कूदते मेरी ओर दौड़े आते हैं। मुझे लगता है कि इन पत्तों को थोड़ी देर के बाद पेड़ से फूटने वाली कोपलों को झटपट जगह दे देने की ही अधिक जल्दी होती होगी। साँप जिस प्रकार अपनी केंचुली उतारकर फिर से जवान बनता है, उसी प्रकार पुराने पत्ते त्याग कर पेड़ भी वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए फिर से जवान बनने की वैयारी करता होगा।

इसीलिए यह कहने पर मन नहीं होता कि ये पत्ते टूटते हैं या गिरते हैं। ये पत्ते तो छूट जाते हैं। हाथ में पकड़ रखा हुआ कोई पक्षी जैसे पकड़ कुछ ढीली होते ही चकमा देकर उड़ जाता है, उसी प्रकार ये पत्ते केजी से छूट जाते हैं। यह विचार भी मन में आता है कि ये पत्ते गिरने वाले तो हैं ही, तो फिर सबके सब एक साथ क्यों नहीं गिरते। पर्णहीन वृक्ष की मुक्त शोभा तो देखने को मिलेगी। जिस पेड़ पर एक भी पत्ता नहीं रहा और अँगुलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी करके जो पागल के समान खड़ा है और जो आकाश के परर्दे पर कालीन के चित्र के समान मालूम हो रहा है, उसकी शोभा कभी-कभी आपने ध्यान देकर निहारी है? पर्णहीन टहनियों की जाली सचमुच ही बहुत सुंदर दिखाई देती है।

1. नीम का पेड़ कहाँ था?
(क) कवि के आँगन में
(ख) जेल के आँगन में
(ग) पहाड़ी में
(घ) नदी के किनारे
उत्तर :
(ख) जेल के आँगन में

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2. कवि को किस बात की चितता थी?
(क) पेड़ का अंकुरण हो रहा था।
(ख) पेड़ पुराना हो रहा था।
(ग) पेड़ का कायापलट हो रहा था।
(घ) पेड़ का सिंचन कार्य हो रहा था।
उत्तर :
(ग) पेड़ का कायापलट हो रहा था।

3. पत्तों की तुलना किससे की गई है?
(क) बंदरों की टोली से
(ख) टिद्डी दल से
(ग) मक्खियों के समूह से
(घ) बच्चों की टोली से
उत्तर :
(ख) टिद्डी दल से

4. हुवा के झोंको का पत्तों पर क्या प्रभाय पड रहा था?
(क) वे हँस-कूद रहे थे।
(ख) वे मिट्टी से घूसरित हो रहे थे।
(ग) बे ध्वनिहीन हो रहे थे।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(क) वे हँस-कूद रहे थे।

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5. लेखक ने गोल-गोल चक्कर काटते पत्तों की तुलना किससे की है?
(क) फिरकी से
(ख) चक्रवात से
(ग) बच्चों से
(घ) पतंग से
उत्तर :
(ग) बच्चों से

6. पत्तों को दूटने की संज्ञा लेखक ने किससे की है?
(क) फूटने की
(ख) छूटने की
(ग) इठलाने की
(घ) टूटने की
उत्तर :
(ख) छूटने की

7. हाथ में पकड़ा हुआ पक्षी चकमा देकर कब उड़ जाता है?
(क) पकड़ ढील होने पर
(ख) मन भटकने पर
(ग) चोट पहुँचाकर
(घ) क्रंद्न करने पर
उत्तर :
(क) पकड़ ढील होने पर

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8. लेखक के मन का उतावलापन किस बात से स्पष्ट हो जाता है?
(क) पत्तों की तुलना बच्चों से करने पर
(ख) पत्तों की तुलना साँष से करने पर
(ग) पत्तों की तुलना पक्षियों से करने पर
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प

9. साँप के पुनः जबान होने का पता कैसे लगता है?
(क) जब वह खुंखार बन जाता है।
(ख) जब वह केचुली उतारता है।
(ग) जब वह उड़ने लगता है।
(घ) जब वह फुफकार मारने लगता है।
उत्तर :
(ख) जब वह केचुली उतारता है।

10. गद्यांश का उचित शीर्षक है –
(क) पतझड् और परिवर्तन
(ख) यौवन का महत्व
(ग) पर्णहीन टहनियाँ
(घ) प्राणियों की स्वतंत्रता
उत्तर :
(क) पतझड् और परिवर्तन

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8. मैं घहरते हुए सावन-भादो में भी वहॉं गया हैं और मेंने इस प्रपात के उद्गम यौवन के उस महावेग को भी देखा है जो सौ-डेढ़-सौ फ़ीट की अपनी चौड़ी धारा की प्रबल भुजाओं में धरती के चटकीले धानी आँचर में उफनाते सावन को कस लेने के लिए व्याकुल हो जाता है और मैने देखा है कि जब अंबर के महलों में घनालिंगन करने वाली सौदामिनी धरती के इस सौभाग्य की ईष्यां में तड़प उठती है, तब उस तड़पन की कौँध में इस प्रपात का उमड़ाव फूलकर दुगुना हो जाता है।

शरद की शुञ्र ज्योत्त्ना में जब यामिनी पुलकित हो गई है और जब इस प्रपात के यौवन का मद सुमार पर आ गया है और उस खुमारी में इसका सौंदर्य मुग्धा के वदनमंडल की भॉंति और अधिक मोहक बन गया है, तब भी मैने इसे देखा है और तभी जाकर मैंने शरदिंदु को इस प्रपात की शांत तरल स्फटिक-धारा पर बिद्छलते हुए देखा है।

पहली बार जब में गया था तो कहाँ ठहरने के लिए कोई स्थान नहीं बना था और इसलिए खड़ी दुपहरी में चट्टानों की ओट में ही छाँह मिल सकी थी। ये भूरी-भूरी चट्टानें पानी के आघात से घिस-घिसकर काफ़ी समतल बन गई हैं और इनका ढाल बिलकुल खड़ा है। इन चट्टानों के कम्मरों पर बैठकर लगभग सात-आठ हाथ दूर प्रपात के सीकरों का छिड़काव रोम-रोम से पिया जा सकता है। इन शिलाओं से ही कुंड में छलाँग मारने वाले धवल जल-बादल पेंग मारते से दिखाई देते हैं और उनके मंद गर्जन का स्वर भी जाने किस मल्हार के राग में चढ़ता-उतरता रहता है कि मन उसमें खो-सा जाता है।

एक शिला की शीतल छाया में कगार के नीचे पैर द्वाले मैं बड़ी देर तक बैठे-बैठे सोचता रहा कि मृत्यु के गहन कूप की जगत पर पैर लटकाए भले ही कोई बैठा हो, किंतु यदि उसे किसी ऐसे सँददर्य के उद्रेक का दर्शन मिलता रहे तो वह मृत्यु की भयावह गहराई भूल जाएगा। मृत्यु स्वयं ऐसे उन्मादी सौंदर्य के आगे हार मान लेती है, नहीं तो समय की कसौटी पर यौवन का गान अमिट स्वर्ण-रेखा नहीं खींच सकता था।

मिट्टी में खिले हुए गुलाब की पंखुडिियाँ भर जाती हैं और उनको झरते देख मृत्यु हैंसना चाहती है, पर उस मिट्टी में से जब गुलाब की गंध ओस पड़ने पर उसाँस की भाँति निकल पड़ती है, तब मूत्यु गलकर पानी हो जाती है। मैं सोचता रहा कि यहाँ जो अजर-अमर साँदर्य उमड़ा चला जा रहा है, वह स्वयं विलय का साँदर्य है-विलय मटमैली धारा का शुभ्र जल-कणों में, शुञ़ जल-कणों की राशि का शुभ्रतर वाण में और वाष्प का सौँदर्य के रस-भरे जूही-लदे घुँघराले और लहरीले चूड़ापाश में।

यह चूड़ापाश जूहियों से इस तरह सज जाता है कि उसके निचले छोर की श्यामलता भर दिखाई पड़ सकती है। एक अद्वितीय चाँदनी उसे ऊपर से छाप लेती है। मेंने देखा कि साँझ हो आई है। सूर्य की तिरही किरणें जाते-जाते इस सौँदर्य का रहस्य-भेदन करते जाना चाहती हैं। पर जैसे प्रपात जाने कितने कवच-मंत्र-उच्चारण करता हुआ और मुखर हो रहा है और अपने को इस प्रकार समेट रहा है कि रवि-रश्मियों का प्रयत्न आप से आप विफल हो रहा है।

1. अवतरण का उचित शीर्षक है –
(क) यौवन का महावेग
(ख) जलप्रपात का सौदर्य
(ग) शिला की शीतल छाया
(घ) अमर संददर्य
उत्तर :
(ख) जलप्रपात का सौदर्य

2. प्रपात व्याकुल क्यों हो जाता है?
(क) सावन को कस लेने के लिए
(ख) घनालिंगन करने के लिए
(ग) ज्योत्सना को पुलकित करने के लिए
(घ) चट्टानों की ओट में छाँ पाने के लिए
उत्तर :
(क) सावन को कस लेने के लिए

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3. शिलाओं में छलांग मारने वाले धवल जल-बादल कैसे विखाई वेते हैं?
(क) चोट मारते हुए
(ख) विशाल रूप बनाकर डराते हुए
(ग) पेंग मारवे हुए
(घ) यान की तरह उड़ते हुए
उत्तर :
(ग) पेंग मारवे हुए

4. जल प्रपात वेखने गए कवि ने धूप से अपना बचाव कैसे किया था?
(क) चट्टान की ओट में छुप गया था।
(ख) जल में समाधिस्थ हो गया था।
(ग) पेड़ों की झुरमुट में लेट गया था।
(घ) गहरी खाई में छिप गया था।
उत्तर :
(क) चट्टान की ओट में छुप गया था।

5. मृत्यु के विषय में कथन और कारण की सत्यता परखिए-
कथन – मृत्यु जलप्रपात के समक्ष हार मान लेती है।
कारण – प्रपात का सौंदर्य उन्मादी और यौवन के महावेग से भरा होता है।
(क) कथन और कारण दोनों सत्य हैं।
(ख) कथन और कारण दोनों असत्य हैं।
(ग) कथन सत्य पर कारण असत्य है।
(घ) कथन असत्य पर कारण सत्य है।
उत्तर :
(क) कथन और कारण दोनों सत्य हैं।

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6. जल-प्रपात सूर्य किरणों को पाकर कैसा प्रतीत होता है?
(क) कवच मंत्र उच्चारण करता हुआ
(ख) प्रकृति को नमन करता हुआ
(ग) हास परिहास करता हुआ
(घ) मानव को वेद्ना पहुँचाता हुआ
उत्तर :
(क) कवच मंत्र उच्चारण करता हुआ

7. मृत्यु क्यों हैसना चाहती है?
(क) मानव को जल प्रपात में क्रीड़ा करते हुए
(ख) गुलाब की पंखुड़ियाँ झड़ते देखकर
(ग) शुभ्र जल कणों को देखकर
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(ख) गुलाब की पंखुड़ियाँ झड़ते देखकर

8. जब गुलाब की गंध ओस पड़ने पर साँस की तरह निकल पड़ती है तब क्या होता है?
(क) मृत्यु गलकर पानी हो जाती है।
(ख) मृत्यु आलिंगन करने लग जाती है।
(ग) मृत्यु रुदन कर तांडव करती है।
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(क) मृत्यु गलकर पानी हो जाती है।

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9. चूड़ापाशा किससे सज जाता है?
(क) लताओं से
(ख) जूहियों से
(ग) शुध्र कणों से
(घ) सूर्य की रशिमयों से
उत्तर :
(ख) जूहियों से

10. जूहियों से सजे चूडृापाश में किसका आवरण दिखाई देता है?
(क) तुषार का
(ख) मिट्टी का
(ग) चाँदनी का
(घ) धूप का
उत्तर :
(ग) चाँदनी का

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए अपठित गद्यांश :

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढकर पूछे गए प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प चुनिए –

1. वर्तमान संप्रदायिक संकीर्णता के विषम वातावरण में संत-साहित्य की उपादेयता बहुत है। संतों में शिरोमणि कबीरदास भारतीय धर्म-निरपेक्षता के आधार पुरुष है। संत कबीर एक सफल साधक, प्रभावशाली उपदेशक, महान नेता और युग-द्रष्टा थे। उनका समस्त काव्य विचारों की भव्यता, हददय की तन्मयता तथा औदायं से परिपूर्ण है। उन्होंने कविता के सहारे अपने विचारों को और भारतीय धर्म-निरेपक्षता के आधार को युग-युगांतर के लिए अमरता प्रदान की। कबीर ने धर्म को मानव धर्म के रूप में देखा था।

सत्य के समर्थक कबीर छ्रदय में विचार-सागर और वाणी में अभूतपूर्ण शक्ति लेकर अवतरित हुए थे। उन्होंने लोक-कल्याण कामना से प्रेरित होकर स्वानुभुति के सहारे काव्य-रचना की। वे पाठशाला या मकतब की देहरी से दूर जीवन के विद्यालय में ‘मसि कागद छुयो नहिं की दशा में जीकर सत्य, इँश्वर विश्वास, प्रेम, अहिंसा, धर्म-निरपेक्षता और सहानुभूति का पाठ पढ़ाकर अनुभूतिमूलक ज्ञान का प्रसार कर रहे थे। कबीर ने समाज में फैले हुए मिध्याचारों और कुत्सित भावनाओं की धज्जियाँ उड़ा दी।

स्वकीय भोगी हुई बेदनाओं के आक्रोश से भरकर समाज में फैले हुए ढोंग और ढकोसलों, कुत्सित विचारधाराओं के प्रति दो टूक शब्दों में जो बात्तें कहीं, उनसे समाज की आँखें फटी की फटी रह गई और साधारण जनता उनकी वाणियों से चेतना प्राप्त कर उनकी अनुगामिनी बनने को बाध्य हो उठी। देश की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान वैयक्तिक जीवन के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न संत कबीर ने किया। उन्होंने बाँह उठाकर बलपूर्वक कहा –

कबीर खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।।

1. गव्यांश का उचित शीर्षक है –
(क) साप्रदायिक संकीर्णता
(ख) संत साहित्य
(ग) संत शिरोमणि कबीरदास
(घ) लोक कल्याप
उत्तर :
(ग) संत शिरोमणि कबीरदास

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2. कबीर के बारे में कौन-सा असत्य कथन है?
(क) धार्मिकता निरपेक्षता का आधार पुरुष
(ख) सफल साधक व उपदेशक
(ग) युग-द्रष्टा
(घ) धार्मिक कट्टरता के समर्थक
उत्तर :
(घ) धार्मिक कट्टरता के समर्थक

3. कबीर ने धर्म को कैसे देखा था?
(क) मानव धर्म के रूप में
(ख) सनातन धर्म के रूप में
(ग) ईश्वरीय धर्म के रूप में
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(क) मानव धर्म के रूप में

4. कबीर ने किस भावना से प्रेरित होकर काव्य रचा?
(क) स्व-कल्याण की भावना से
(ख) लोक कल्याण की भावना से
(ग) धर्म विशेष की भावना से
(घ) ज्ञान विशेष की भावना से
उत्तर :
(ख) लोक कल्याण की भावना से

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5. कबीर ने अपने साहित्य ज्ञान के जरिए लोगों को कौन-सा पाठ पढ़ाया?
(क) सत्य-ईश्वर
(ख) प्रेम-विश्वास
(ग) अहिंसा-धर्मनिरपेक्षता
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प

6. ‘मसि कागद छुयो नहिं’ से कबीर के बारे में क्या पता चलता है?
(क) कबीर अनपढ़ थे।
(ख) कबीर बहुत पड़े-लिखे थे।
(ग) कबीर महान संत थे।
(घ) कबीर घुमक्कड़ थे।
उत्तर :
(क) कबीर अनपढ़ थे।

7. क्या सुनकर समाज की आँखें फटी की फटी रह गड़??
(क) ढोंग-ढकोसलों के खिलाफ कबीर की बाणी सुनकर
(ख) हदय की तन्मयता का अनुभव कर
(ग) अमरता का संदेश सुनकर
(घ) वैयक्तिक जवन की उपयोगिता समझकर
उत्तर :
(क) ढोंग-ढकोसलों के खिलाफ कबीर की बाणी सुनकर

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8. कबीर की दृष्टि में धर्म क्या है?
(क) समाज-कल्याण का साधन
(ख) ईश्वर प्राप्ति का साधन
(ग) जीवन की खाई
(घ) विकल्प (क) एवं (ख)
उत्तर :
(घ) विकल्प (क) एवं (ख)

9. कबीर किसके साथ खड़े होने की बात करता है?
(क) जो धर्मावलंबी हो।
(ख) जो विषय-वासनाओं को जला देने वाला हो।
(ग) जो प्रेम से दूर रहकर एकांत जीवन जीता है।
(घ) जो धर्मनिरपेक्षता का प्रसार करता हो।
उत्तर :
(ख) जो विषय-वासनाओं को जला देने वाला हो।

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10. ‘सांप्रदायिकता’ में उपयुक्त प्रत्यय है –
(क) ता
(ख) कता
(ग) इक, ता
(घ) ईक, ता
उत्तर :
(ग) इक, ता

2. यह सत्य है कि दोनों पक्षों के वीर इस युद्ध को धर्मयुद्ध मानकर लड़ रहे थे, किंतु धर्म पर दोनों में से कोई भी अडिग नहीं रह सका।’लक्ष्य प्राप्त हो या न हो, किंतु हम कुमार्ग पर पाँव नहीं रखेंगे’-इस निष्ठा की अवहेलना दोनों और से हुई और दोनों पक्षों के सामने साध्य प्रमुख और साधन गौण हो गया। अभिमन्यु की हत्या पाप से की गई तो भीष्म, द्रोण, भूरिश्रवा और स्वर्य दुयौधन का वथ भी धर्म सम्मत नहीं कहा जा सकता। जिस युद्ध में भीष्म, द्रोण और श्रीकृष्ण विच्यमान हों, इस युद्ध में भी धर्म का पालन नहीं हो सके, इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि युद्ध कभी भी धर्म के पथ पर रहकर लड़ा नही जा सक्ता।

हिंसा का आदि भी अधर्म है, मध्य भी अधर्म है और अंत भी अधर्म है। जिसकी आँखों पर लोभ की पट्टी नहीं बँधी है, जो क्रोध और आवेश अथवा स्वार्थ में अपने कर्तव्य को भूल नहीं गया है, जिसकी औँख साधना की अनिवार्यता से हट कर साध्य पर ही केंद्रित नहीं हो गई है, वह युद्ध जैसे मलिन कर्म में कभी भी प्रवृत्त नहीं होगा। युद्ध में प्रवृत्त होना ही इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने रागों का दास बन गया है, फिर जो रागों की दासता करता है, वह उनका नियंत्रण कैसे करेगा।

अगर यह कहें कि विजय के लिए युद्ध अवश्यंभावी है तो विजय को मे कोई बड़ा ध्येय नहीं मानता। जिस ध्येय की प्राप्ति धर्म के मार्ग से नही की जा सकती, वह या तो बड़ा ध्येय नही है अथवा अगर है तो फिर उसे पाप के मार्ग से पाने का प्रयास व्यर्थ है। संग्राम के कोलाहल में चाहे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा हो, किंतु आज में अपनी आत्मा की इस पुकार को स्पष्ट सुन रहा हूँ कि युधिष्ठिर। तुम जो चाहते थे वह वस्तु तुम्हें नहीं मिली।

संग्राम तो जैसे-तैसे समाप्त हो गया किंतु उससे देश भर में हिंसा की जो मानसिकता फैली, उसका क्या होगा ? क्या लोग हिंसा के खेल को दुहराते रहेंगे अथवा यह विचार कर शांति से काम लेंगे कि शत्रुओं का भी मस्तक उतारना बर्बरता और जंगलीपन का काम है।

1. कौरवों और पांडवों ने महाभारत युद्ध को क्या माना?
(क) विश्व-युद्ध
(ख) धर्म-युद्ध
(ग) कर्म-युद्ध
(घ) अधर्म-युद्ध
उत्तर :
(ख) धर्म-युद्ध

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2. कौरवों-पांडवों दोनों पक्षों में किस निष्ठा की ब्रात कही गई है?
(क) लक्ष्य प्राप्त हो या न हो किंतु कुमार्ग पर पाँय नहीं रखेंगे।
(ख) लक्ष्य-प्राप्ति ही हमारा ख्येय होगा।
(ग) आवश्यकता पड़ी तो अधर्म का अवलंबन लेंगे।
(घ) युद्ध को मात्र कर्म क्षेत्र समझोंगे।
उत्तर :
(क) लक्ष्य प्राप्त हो या न हो किंतु कुमार्ग पर पाँय नहीं रखेंगे।

3. युत्य को कैसा कर्म माना गया है?
(क) सद्कर्म
(ख) आकस्भिक कर्म
(ग) मलिन कर्म
(घ) विध्वंसक कर्म
उत्तर :
(ग) मलिन कर्म

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4. मलिन कर्म से क्या आशय है?
(क) जो साधना से हटकर साध्य पर केंद्रित हो गया हो।
(ख) जो अक्रोध पर कैद्रित हो गया हो।
(ग) जो स्वार्थ पर केंद्रित हो गया हो।
(घ) जो केवल पाप में संलग्न हो गया हो।
उत्तर :
(क) जो साधना से हटकर साध्य पर केंद्रित हो गया हो।

5. युव्ध में प्रयृत्ति रखने वाले लोग किसके दास बन जाते हैं?
(क) कर्मौं के
(ख) धर्मों के
(ग) रागों के
(घ) दामों के
उत्तर :
(ग) रागों के

6. हिंसा किस पर आयारित होती है?
(क) अधर्म
(ख) वीरता
(ग) क्रोध
(घ) धर्म
उत्तर :
(क) अधर्म

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7. हिंसा का आवि, मध्य और अंत किसे माना गया है?
(क) आवेश को
(ख) स्वार्थ साधना
(ग) अधर्म को
(घ) लक्ष्य
उत्तर :
(ग) अधर्म को

8. साधन किसका आधार माना गया है?
(क) साध्य का
(ख) दासता का
(ग) कर्तव्य का
(घ) घृणा का
उत्तर :
(क) साध्य का

9. महाभारत के किस पात्र की हत्या पाप से की गई है?
(क) जयद्रथ
(ख) कर्ण
(ग) अभिमन्यु
(घ) जयंत
उत्तर :
(ग) अभिमन्यु

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10. गय्यांश का उचित संदेश है-
(क) स्वार्थ के कारण कर्तब्य-पथ न छोड़ना
(ख) धर्म के माग्ग पर मुसीबत आने पर विचलित हो जाना
(ग) हिंसा का मार्ग अपनाना
(घ) दूसरों के प्रति दुर्भावना रखना
उत्तर :
(क) स्वार्थ के कारण कर्तब्य-पथ न छोड़ना

3. प्राचीन काल से ही भारत में संयुक्त परिवारों का प्रचलन रहा है। एकल परिवार कभी भारतीय सोच में नहीं रहे। संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त रहता था और परिवार के प्रति सम्भिलित उत्तरदायित्व और एक प्रकार से सामाजिकता का बोध जागृत रहता था। संतान के लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, विवाह आदि सुख-दुख की चिंता सभी को रहती और संतान भी माँ-बाप के अतिरिक्त घर-परिवार के बड़े-बूडों के हार्थों पलकर बड़ी होती, उनके संस्कारों से पल्लवित होती, आजीबन निश्चिंत रहने का सुख भोगती हुई बड़ों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को महसूस करती। इस प्रकार संयुक्त परिवारों में बचपन, यौवन और बुढ़ापा सभी आनंद में बीतते।

अब संयुक्त परिवार प्रथा के दूटने से परिवारों में बिखराव आ गया है। चूँक व्यक्ति परिवार की और परिवार समाज की इकाई है, इसलिए परिवारों के टूटने से समाज में भी बिखराव और अलगाव दिखाई पड़ रहा है। उसकी कल्पना शायद किसी ने भी नहीं की होगी। समाज के मूल्य बदल रह हैं। मान्यताएँ बदल रही हैं और यह बदलाव की प्रक्रिया व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज में परस्पर हो रही है। लगता है जैसे नई पीढ़ी अनुशासन को बंधनों का नाम देती हुई धीरि-धीरे उच्चृंखलता की ओर बढ़ रही है।

परिवारों में बिखराव के पीछे पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी का वैचारिक संघर्ष भी है। पुरानी पीढ़ी अपनी रूढ़ियों, परंपराओं को त्याग नहीं पाती और अपनी सोच को जबरदस्ती लादना अपना कर्तव्य समझती है। नई पीढ़ी का आकाश बहुत विस्तृत है। उसे पाने के लिए उसे पुरातनता सहायक नहीं लगती। विचारों का संघर्ष तो है ही, नई पीड़ी पर नए आकर्षणों का दबाव भी है।

उनकी धनतिप्सा, स्वार्थ-भावना, सुख-चैन की जिंदगी जीने की ललक आदि का प्रभाव भी है। उनमें ‘स्व’ और ‘अहं’ प्रधान होता जा रहा है। पुरानी पीढ़ी अपने संस्कारों और मर्यदिाओं में बँधी और नई पीढ़ी उन पर कुठाराघात करने को उतारू, जब तक इन दोनों में सामंजस्य न हो, परिवारों का विघटन होता रहेगा। देश के लिए यह शुभ लक्षण नहीं है। दोनों पीड़ियों को समय और परिस्थिति के अनुकूल अपने-अपने दृष्टिकोण में परिकर्तन लाना होगा। जब परिवारों में परस्पर सद्धावना, सहयोग, प्रेम, त्याग आदि की भावनाएँ प्रबल होंगी तो हर व्यक्ति सुखी होगा। परिवाऐं में खुशहाली होगी।

1. संयुक्त परिवार में कौन-कौन रहते हैं?
(क) माँ-बाप
(ख) माँ-बाप व संतान
(ग) दादा-दादी, मॉ-बाप, चाच-चाची
(घ) ये सभी
उत्तर :
(ग) दादा-दादी, मॉ-बाप, चाच-चाची

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2. किस परिवार में संतानें बडे-बूहों के संस्कारों में पल्लवित होती हैं?
(क) संयुक्त परिवार की
(ख) श्रम विभाजन की
(ग) बिखराव की
(घ) एकता की
उत्तर :
(क) संयुक्त परिवार की

3. संयुक्त परिवारों के टूटने से कौन-सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है?
(क) धन संग्रह की
(ख) त्रम विभाजन की
(ग) बिखराव की
(घ) एकता की
उत्तर :
(ग) बिखराव की

4. नई पीढ़ी किसके पीछे भाग रही है?
(क) धन लिप्सा
(ख) स्वार्थ भाबना
(ग) सुख-चैन के पीछे
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प

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5. नई पीढ़ी संयुक्त परिवार में क्यों नहीं रहना चाहती है?
(क) उसे लोगों का जमावड़ा अच्छा नही लगता।
(ख) उसे सामूहिक विचारों का आदान-प्रदान अच्छा नहीं लगता।
(ग) उसे दबाव पसंद् नहीं है।
(घ) उसे आपसी प्यार पसंद नहीं है।
उत्तर :
(ग) उसे दबाव पसंद् नहीं है।

6. समाज की इकाई किसे कहा गया है?
(क) परिवार
(ख) व्यक्ति
(ग) देश
(घ) समूह
उत्तर :
(क) परिवार

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7. ‘नई पीढ़ी का आकाश बहुत विस्तुत है’ का आशय है-
(क) वह पुरानी पीढ़ी से संतुष्ट है।
(ख) बह परंपराओं से बाहर स्वच्छंद विचरण करना चाहती है।
(ग) वह पुरानी पीढ़ी से कम सोचती है।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(ख) बह परंपराओं से बाहर स्वच्छंद विचरण करना चाहती है।

8. लेखक के विचार से दोनों पीढ़ियों में सामंजर्य संभव है –
(क) परस्पर भेदभाव त्यागकर रूढढ़ियों और जीवन-मूल्यों का समावेश कर
(ख) परंपराओं को खत्म करके
(ग) संस्कारों के बल-बूते न पड़कर
(घ) कम ग्रहण करने की भावना लाकर
उत्तर :
(क) परस्पर भेदभाव त्यागकर रूढढ़ियों और जीवन-मूल्यों का समावेश कर

9. गद्यांश का उच्चित शीर्षक है-
(क) परिवार के भेद
(ख) पुरानी-नई पीढ़ी में अंतर
(ग) जीवन-मूल्य
(घ) भेद्भाव
उत्तर :
(ख) पुरानी-नई पीढ़ी में अंतर

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10. ‘बैचारिक’ में प्रत्यय है –
(क) रिक
(ख) इक
(ग) इक
(घ) क
उत्तर :
(ग) इक

4. ‘दाँत’-इस दो अक्षर के शब्द तथा इन थोड़ी-सी छोटी-छोटी हड्डियों में भी उस चतुर कारीगर ने वह कौशल दिखलाया है कि किसके मुँह में दाँत हैं जो पूरा वर्णन कर सके। मुख की सारी शोभा और सभी भोज्य पदार्थों का स्वाद इन्ही पर निर्भर है। कवियों ने अलक, भूरता बरौनी अदि की छवि लिखने में बहुत रीति से बाल की खाल निकाली है पर सच पूछ्छिए तो इन्हीं की शोभा से सबकी शोभा है। जब दाँतों के बिना पोपला-सा मुँह निकल आता है और चिडुक एवं नासिका एक में मिल जाती हैं, उस समय सारी सुधराई मिट्टी में मिल जाती है। कवियों ने इनकी उपमा हीरा, मोती, माणिक से दी है, बह बहुत ठीक है।

यह वह अंग है जिसमें पाकश्वस्त्र के छहों रस एवं काव्यशास्त्र के नवों रस का आधार है। खाने का मजा इन्ही से है। इस बात का अनुभव यदि आपको न हो तो किसी बृद्ध से पूह देखिए। केवल सतुआ चाटने के और रोटी को दूध में चथा द्वाल में भिगोकर गले के नीचे उतारने के सिवाय दुनिया भर की चीर्यों के लिए वह तरस कर ही रह जाता होगा।

सच है दाँत बिना जब किसी काम के न रहें तब पूछे कौन ? शंकराचार्य का यह पद महारंत्र है “‘अंग गलितं पलितं मुंड दशनविहीनं जातं तुंडम्” आदि। एक कहावत भी है –

“‘दाँत खियाने, खुर खिसे, पीठ बोझा नहिं लेइ,
ऐसे बूढ़े बैल को कौन बाध भुस देइ।”

आपके दाँत हाथी के दाँत तो हैं नहीं कि मरने पर भी किसी के काम आएँगे। आपके दाँत तो यह शिक्षा देते हैं कि जब तक हम अपने स्थान, अपनी जाती (दंतावली) और अपने काम में दृढ़ हैं, तभी तक हमारी प्रविष्ठा है। यहाँ तक कि बड़े-बड़े कवि हमारी प्रशंसा करते हैं। पर मुख से बाहर होते ही एक अपावन, घृणित और फेंकने वाली हड्डी हो जाते हैं। गाल और होंठ दाँतो का परदा हैं। जिसके परदा न रहा अर्थात स्वजातित्व की गैरतदारी न रही, उनकी निर्लज्ज जिंदगी व्यर्थ है। ऐसा ही हम उन स्वार्थ के अंधों के हक में मानते हैं जो रहे हमारे साथ, बने हमारे साथ ही, पर सदा हमारे देश-जाति के अहित ही में तत्पर रहते हैं। उनके होने का हमें कौन सुख ? दुखती दाढ़ की पीड़ा से मुक्ति उसके उखड़वाने में ही है। हम तो उन्ही की जै-जै कार करेंगे जो अपने देशवासियों से दाँत काटी रोटी का बरता रखते हैं।

1. ‘इन्ही की शोभा से सारी शोभा है।’ ‘इन्हीं’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) अक्षरों के लिए
(ख) हड्डियों के लिए
(ग) दाँतों के लिए
(घ) आँखों के लिए
उत्तर :
(ग) दाँतों के लिए

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2. लेखक ने ईंशर की अनूठी देन किसे कहा है?
(क) गाल को
(ख) गाल
(ग) नासिका
(घ) जीभ
उत्तर :
(घ) जीभ

3. कवियों ने दाँतों की तुलना किससे की है?
(क) हीरा
(ख) मोती
(ग) माणिक
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प

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4. भोजन के आनंद में दाँतों का क्या योगदान है?
(क) दाँतो से चबाए जाने के कारण भोजन से प्राप्त रस शरीर को मिलता है।
(ख) भोजन को बारीक कर देते हैं।
(ग) भोजन को स्वादिष्ट बना देते हैं।
(घ) इनमें से सभी विकल्प।
उत्तर :
(घ) इनमें से सभी विकल्प।

5. चुँह की शोभा कब तक है?
(क) जब तक फुंसियाँ नहीं हैं।
(ख) जब तक दाँत हैं।
(ग) जब तक तिल हैं।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(ख) जब तक दाँत हैं।

6. मुँह से दाँतों के निकलने से-
(क) चेहरा सुंदर-सा लगता है।
(ख) चेहरा अनजाना-सा लगता है।
(ग) चेहरा घृणित-सा लगता है।
(घ) चेहरा अपरिवर्तनशील लगता है।
उत्तर :
(ग) चेहरा घृणित-सा लगता है।

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7. मुँह में दाँतों को परदे की तरह कौन ढककर रखते हैं?
(क) जीभ
(ख) गाल-ओठ
(ग) तालु
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(ख) गाल-ओठ

8. गाल-ओठ परदे की ओट में क्या शिक्षा वेते हैं?
(क) अनुशासन की
(ख) वाचन की
(ग) मर्यादा की
(घ) विकल्प (क) तथा (ख)
उत्तर :
(घ) विकल्प (क) तथा (ख)

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9. गव्यांश का उचित शीर्षक है-
(क) दाँत
(ख) चेहरा
(ग) निर्लंज्ज जिंद्यी
(घ) काटी रोटी
उत्तर :
(क) दाँत

10. गद्यांश में लेखक का क्या उद्वेश्य है?
(क) व्यक्ति को चेहरे की तरह सुंदर होना चाहिए।
(ख) व्यक्ति को दाँत की तरह देश की रक्षा करनी चाहिए।
(ग) व्यक्ति को भोजन से प्राप्त रस का लाभ उठाना चाहिए।
(घ) ये सभी विकल्प।
उत्तर :
(ख) व्यक्ति को दाँत की तरह देश की रक्षा करनी चाहिए।

5. परिश्रम ‘कल्पवृक्ष’ है। जीवन की कोई भी अभिलाषा परिश्रम रूपी कल्पवृक्ष से पूर्ण हो सकती है। परिश्रम जीवन का आधार है, उज्ज्वल भविष्य का जनक और सफलता की कुंजी है। सृष्टि के आदि से अद्यतन काल तक विकसित सभ्यता और सर्वत्र उन्नति परिश्रम का परिणाम है। आज से लगभग पचास साल पहले कौन कल्पना कर सकता था कि मनुष्य एक दिन चौँद पर कद्म रखेगा गi अंचरिक्ष में विचरण करेगा पर निरंतर श्रम की बदौलत मनुष्य ने उन कल्पनाओं एवं संभावनाओं को साकार कर दिखाया है। मात्र हाथ-पर-हाथ धरकर बैठे रहने से कदापि संभव नहीं होता।

किसी देश, राष्ट्र अथवा जाति को उस देश के भौतिक संसाधन तब तक समृद्ध नहीं बना सकते जब तक कि वहाँ के निवासी उन संसाधनों का दोहन करने के लिए अथक परिश्रम नहीं करते। किसी भूभाग की मिट्टी कितनी भी उपजाक क्यों न हो, जब्र तक विधिवत परिश्रमपूर्वक उसमें जुताई, बुआई, सिंचाई, निराई-गुड़ाई नही होगी, अच्छी फ्रसल प्राप्त नहीं हो सकती। किसी किसान को कृषि संबंधी अत्याधुनिक कितनी ही सुविधाएँ उपलब्ध करा दीजिए, यदि उसके उपयोग में लाने के लिए समुचित श्रम नहीं होगा, उत्पादन क्षमता में वृद्धि संभव नहीं है।

परिश्रम से रेगिस्तान भी अन्न उगलने लगते हैं। हमारे देश की स्वत्यंत्रता के पश्चात हमारी प्रगति की द्वत-गति भी हमारे श्रम का ही फल है। भाखड़ा-नांगल का विशाल बाँध हो या धुंबा या श्री हरिकोटा के रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र, हरित क्राति की सफलता हो या कोविड-19 की रोकथाम के लिए टीका तैयार करना, प्रत्येक सफलता हमारे श्रम का परिणाम है तथा प्रमाण भी है।

जीवन में सुख की अभिलाषा सभी को रहती है। बिना श्रम किए भौतिक साधनौं को जुटाकर जो सुख प्राप्त करने के फेर में है, वह अंधकार में है। उसे वास्तविक और स्थायी शांवि नहीं मिलती। गांधी जी तो कहते थे कि जो बिना भ्रम किए भोजन ग्रहण करता है, वह चोरी का अन्न खाता है। ऐसी सफलता मन को शांति देने के बजाए उसे व्यथित करेगी।

परिश्रम से दूर रहकर और सुखमय जीवन व्यतीत करने वाले विद्यार्थी को ज्ञान कैसे प्राप्त होगा? हवाई किले तो सहच ही बन जाते हैं, लेकिन वे हवा के हलके झोंके से छह जाते हैं। मन में मधुर कल्पनाओं के सँंजोने मात्र से किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती। कार्य सिद्धि के लिए उद्यम और सतत उद्यम आवश्यक है। तुलसीदास ने सत्य ही कहा है-सकल पदारथ है जग माही। करमहीन नर पावत नाही।। अर्थात इस दुनिया में सारी चीज़ें हासिल की जा सकती है लेकिन कर्महीन व्यक्ति को कभी नहीं मिलती है।

अगर आप भविष्य में सफलता की फ़सल काटना चाहते हैं, तो आपको उसके लिए बीज आज ही बोने होंगे, आज बीज नहीं बोएँगे, तो भविष्य में फ़सल काटने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? पूरा संसार कर्म और फल के सिद्धांतों पर चलता है इसलिए कर्म की तरफ़ आगे बढ़ना होगा।

यदि सही मायनों में सफल होना चाहते हैं तो कर्म में जुट जाएँ और तब तक जुटे रहे जब तक कि सफल न हो जाएँ। अपना एक-एक मिनट अपने लक्ष्य को समर्पित कर दें। काम में जुटने से आपको हर वस्तु मिलेगी जो आप पाना चाहते है-सफलता, सम्मान, धन, सुख या जो भी आप चाहते हैं।

1. गद्यांश में परिश्रम को ‘कल्पवृक्ष’ के समान बताया गया है क्योंकि इससे-
(क) भौतिक संसाधन जुटाए जाते हैं।
(ख) परिश्रमी व्यक्ति बृक्ष के समान परोपकारी होता है।
(ग) इच्छा दमन करने का बल प्राप्त होता है।
(घ) व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ण पूर्ति संभव है।
उत्तर :
(घ) व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ण पूर्ति संभव है।

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2. गद्यांश में अच्ही फ़सल प्राप्त करने के लिए कहे गए कबन से स्पष्ट होता है कि-
(क) भौतिक संसाधनों का दोहन करना आवश्यक है।
(ख) संसाधनों की तुलना में परिश्रम की भूमिका अधिक है।
(ग) ज्ञान प्राप्त करने के लिए परिश्रम आवश्यक है।
(घ) कष्ट करने से ही कृष्ग मिलते हैं।
उत्तर :
(ख) संसाधनों की तुलना में परिश्रम की भूमिका अधिक है।

3. भारत के परिश्रम के प्रमाण क्या-क्या बताए गए हैं?
(क) बाँध, कोविड- 19 की रोकथाम का टीका, प्रक्षेपण केंद्र
(ख) कोविड- 19 की रोकथाम का टीका, प्रक्षेपण केंद्र, रेगिस्तान
(ग) कोविड-19 की रोकथाम का टीका, प्रक्षेपण केंद्र, हवाई पद्टियों का निर्माण
(घ) वृक्षारोपण, कोविड-19 की रोकथाम का टीका, प्रक्षेपण केंद्र
उत्तर :
(क) बाँध, कोविड- 19 की रोकथाम का टीका, प्रक्षेपण केंद्र

4. कैसे व्यक्ति को अंधकार में बताया गया है?
(क) श्रमहीन व्यक्ति
(ख) विश्रामहीन व्यक्ति
(ग) नेत्रहीन व्यक्ति
(घ) प्रकाशहीन व्यक्ति
उत्तर :
(क) श्रमहीन व्यक्ति

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5. ‘”हवाई किले तो सहुज ही बन जाते हैं, लेकिन ये हवा के हलके झोंके से बह जाते हैं।’-इस कथन के द्वारा लेखक कहना चाहता है कि-
(क) तेष्र चक्रवर्ती हवाओं से आवासीय परिसर नष्ट हो जाते हैं।
(ख) हवा का रुख अपने पक्ष में परिश्रम से किया जा सकता है।
(ग) हवाई कल्पनाओं को सदैव सँजोकर रखना असंभव है।
(घ) परिश्रमहीनता से वैयक्तिक उपलब्धि नितांत असंभव है।
उत्तर :
(घ) परिश्रमहीनता से वैयक्तिक उपलब्धि नितांत असंभव है।

6. ‘सतत उद्यम’ से क्या तात्पर्य है?
(क) निरंतर तपता हुआ उद्यम
(ख) निरंतर परिश्रम करना
(ग) सतत उठते जाना
(घ) ज्ञान का सतत उद्यम
उत्तर :
(ख) निरंतर परिश्रम करना

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7. किस अवस्था में प्राप्त सफलता मन को व्यधित करेगी?
(क) सकल पदार्थ द्वारा प्राप्त करने पर
(ख) भौतिक संसाधनों दूवारा प्राप्त करने पर
(ग) दूसरों द्वारा किए गए अथक प्रयासों से
(घ) आसान व श्रमहीन तरीके से प्राप्त करने पर
उत्तर :
(घ) आसान व श्रमहीन तरीके से प्राप्त करने पर

8. ‘स्वतंत्रता’ शब्द में उपसर्ग व प्रत्यय अलग करने पर होगा –
(क) स्व + तंत्र + ता
(ख) सु + वंत्र + ता
(ग) स् + वतंत्र + ता
(घ) स् + बंंत + ता
उत्तर :
(क) स्व + तंत्र + ता

9. ‘समुचित’ शब्द का अर्य है –
(क) उपर्युक्त
(ख) इपयुक्त
(ग) उपभोक्ता
(घ) उपक्रम
उत्तर :
(ख) इपयुक्त

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10. गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक है –
(क) परिश्रम और स्वतंत्रता
(ख) परिश्रमः सफल जीवन का आधार
(ग) परिश्रम और कल्पना
(घ) परिश्रम : कल्पना की उड़ान
उत्तर :
(ख) परिश्रमः सफल जीवन का आधार

6. विज्ञान प्रकृति को जानने का महत्वपूर्ण साधन है। भौतिकता आज आधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का स्तर निर्धारित करती है। विज्ञान केवल सत्य, अर्थ और प्रकृति के बारे में उपयोग ही नहीं बल्कि प्रकृति की ख्ऐोज का एक क्रम है। विज्ञान प्रकृति को जानने का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह प्रकृति को जानने के विषय में हमें महत्वपूर्ण और विश्वसनीय ज्ञान देता है।

व्यक्ति जिस बात पर विश्वास करता है वही उसका ज्ञान बन जाता है। कुछ लोगों के पास अनुचित ज्ञान होता है और वह उसी ज्ञान को सत्य मानकर उसके अनुसार काम करते हैं। वैज्ञानिकता और आलोचनात्मक विचार उस समय जरूरी होते हैं जब वह विश्वसनीय ज्ञान पर आधारित हों। वैज्ञानिक और आलोचक अकसर तर्कसंगत विचारों का प्रयोग करते हैं। तर्क हमें उचित सोचने पर प्रेरित करते हैं। कुछ लोग तर्कसंगत विचारधारा नहीं रखते क्योंकि उन्होंने कभी तर्क करना जीवन में सीखा ही नहीं होता।

प्रकृति वैज्ञानिक और कवि दोनों ही उपास्या है। दोनों ही उससे निकटतम संबंध स्थापित करने की चेष्टा करते हैं, किंतु दोनों के दृष्टिकोण में अंतर है। वैज्ञानिक प्रकृति के बाह्य रूप का अवलोकन करता है और सत्य की खोज करता है, परंतु कवि बाहय रूप पर मुभध होकर उससे भावों का वादात्म्य स्थापित करता है। वैज्ञानिक प्रकृति की जिस वस्तु का अवलोकन करता है, उसका सूक्ष्म निरीक्षण भी करता है।

चंद्र को देखकर उसके मस्तिष्क में अनेक विचार उठते हैं उसका तापक्रम क्या है, कितने वर्षों में वह पूर्णतः शीवल हो जाएगा, ज्वार-भाटे पर उसका क्या प्रभाव होता है, किस प्रकार और किस गति से वह सौरमंडल में परिक्रमा करता है और किन तत्वों से उसका निर्माण हुआ है? वह अपने सूक्ष निरीक्षण और अनवरत चिंतन से उसको एक लोक ठहराता है और उस लोक में स्थित ज्वालामुखी पर्वतो तथा जीवनधारियों की खोज करता है। इसी प्रकार वह एक प्रफुल्लित पुष्प को देखकर उसके प्रत्येक अंग का विश्लेषण करने को तैयार हो जाता है। उसका प्रकृति-विषयक अध्ययन वस्तुगत होता है।

उसकी दृष्टि में विश्लेषण और वर्ग विभाजन की प्रधानता रहती है। वह सत्य और वास्तविकता का पुजारी होता है। कवि की कविता भी प्रत्यक्षावलोकन से प्रस्कुटित होती है, वह प्रकृति के साथ अपने भावों का संबंध स्थापित करता है। वह उसमें मानव चेतना का अनुभव करके उसके साथ अपनी आंतरिक भावनाओं का समन्वय करता है। वह तथ्य और भावना के संबंध पर बल देता है। उसका वस्तु वर्णन हृदय की प्रेरणा का परिणाम होता है, वैज्ञानिक की भौतत मस्तिष्क की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं। कवियों द्वारा प्रकृति-चित्रण का एक प्रकार ऐसा भी है जिसमे प्रकृति का मानवीकरण कर लिया जाता है अर्थात प्रकृति के तत्चों को मानव ही मान लिया जाता है।

प्रकृति में मानवीय क्रियाओं का आरोपण किया जाता है। हिंदी में इस प्रकार का प्रकृति-चित्रण छायावादी कवियों में पाया जाता है। इस प्रकार के प्रकृति-चित्रण में प्रकृति सर्वंधा गौण हो जाती है। इसमें प्राकृतिक वस्तुओं के नाम तो रहते हैं परंतु झंकृत चित्रण मानवीय भावनाओं का ही होता है। कवि लहलहाते पौधे का चित्रण न कर खुशी से झूमते हुए बच्चे का चित्रण करने लगता है।

1. विज्ञान प्रकृति को जानने का एक महत्वपूर्ण साधन है क्योंकि यहि-
(क) समग्र ज्ञान के साथ तादात्य स्थापित करता है।
(ख) प्रकृति आधुनिक विज्ञान की उपास्या है।
(ग) महत्वपूर्ण और विश्वसनीय इश्रान प्रदान करता है।
(घ) आधुनिक बैज्ञानिक का स्तर निधारित करता है।
उत्तर :
(ग) महत्वपूर्ण और विश्वसनीय इश्रान प्रदान करता है।

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2. “ैैज्ञानिक प्रकृति के बाहूय रूप का अवलोकान करते हैं यह कथन वर्शाता है कि वे-
(क) कवियों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ हैं।
(ख) ज्यार-भाटे के परिणाम से बचना चाहते हैं।
(ग) वर्ग विभाजन के पक्षधर बने रहना चाहते हैं।
(घ) प्रकृति से अविदूर रहने का प्रयास करते हैं।
उत्तर :
(घ) प्रकृति से अविदूर रहने का प्रयास करते हैं।

3. सूक्म निरीक्षण और अनवरत चिंतन से तात्पर्य है –
(क) सौरमंडल को एक लोक और परलोक ठहराना
(ख) छोटी-छोटी-सी बावों पर चिंता करना
(ग) बारीकी से सोचना व निरंतर देखना
(घ) बारीकी से देखना और निरंतर सोचना
उत्तर :
(घ) बारीकी से देखना और निरंतर सोचना

4. कौन अनवरत चिंतन करता है?
(क) सूक्ष्माचारी
(ख) विज्ञानोपासक
(ग) ध्यानविलीन योगी
(घ) अवसादग्रस्त व्यक्ति
उत्तर :
(ख) विज्ञानोपासक

5. कौन वास्तविकता का पुजारी होता है?
(क) यथाध्धंवादी
(ख) काव्यवादी
(ग) प्रकृतिवादी
(घ) विन्ञानवादी
उत्तर :
(घ) विन्ञानवादी

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6. कवि की कविता किससे प्रस्युटित होती है?
(क) विचारों के मंथन से
(ख) प्रकृति के साक्षात दर्शन से
(ग) भावनाओं की ऊहापोह से
(घ) प्रेम की तीव्र इच्छा से
उत्तर :
(ख) प्रकृति के साक्षात दर्शन से

7. कवि के संबंध में इनमें से सही तथ्य है –
(क) ज्वालमुखी के रहस्य जानता है।
(ख) जीवधारियों की खोज करता है।
(ग) सत्य का उपासक नहीं होता।
(घ) प्रफुल्लित पुष्प का अध्ययनकर्ता।
उत्तर :
(घ) प्रफुल्लित पुष्प का अध्ययनकर्ता।

8. उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है –
(क) कवि की सोच और वैज्ञानिकता
(ख) प्रकृति के उपासक-कवि और वैज्ञानिक
(ग) वैज्ञानिक उन्नति और काव्य-जगत
(घ) वैज्ञानिक दृष्टिकोण-अतुलनीय
उत्तर :
(ख) प्रकृति के उपासक-कवि और वैज्ञानिक

9. प्रकृति का मानखीकरण वर्शांता है कि –
(क) कल्पना प्रधान व भावोन्मेषयुक्त कविता रची जा रही है।
(ख) मानवीकरण अलंकार का दुरुपयोग हो रहा है।
(ग) प्रकृति व मानव के सामंजस्य से उदित दीप्ति फैल्ल रही है।
(घ) मानव द्वारा प्रकृति का संरक्षण हो रहा है।
उत्तर :
(क) कल्पना प्रधान व भावोन्मेषयुक्त कविता रची जा रही है।

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10. लहलहाते पौधे का चित्रण न कर झूमते बच्चे का चित्रण करना वर्शाता है कि –
(क) कवि भावावेश में विषय से भटक गए हैं।
(ख) प्रकृति के तत्वों को मानव माना है।
(ग) कवि वैज्ञानिक विचारधारा के पक्ष में है।
(घ) कवि विकास स्तर पर ही है।
उत्तर :
(ख) प्रकृति के तत्वों को मानव माना है।

7. विचार, धर्म, मूल्य सब एक ही सीध के शब्द हैं। इनकी मौलिक रचना में नैतिकता सर्वोपरि है। यह और बात है कि कई बार यह विरोधाभास उभरता है कि विचार और धर्म की मौजूदा समझ और व्यवहार में नैतिकता का पक्ष गौण है। दिलचस्प यह है कि नैतिकता, मनुष्यता से जुड़ा विषय है। इसलिए सभ्यता और संस्कृति के विकास में भी नैविकता को स्वाभाषिक अहमियत मिली है।

पर जब से मनुष्य के विकास के समस्त रास्तो और अवधारणाओं के साथ आधुनिकता का आग्रह जुड़ा है, नैतिक व्यवहारों पर बात कम होती है। यह समस्या विचार और बुदधध के नए मेल से सामने आई है। जबकि विचार का स्वाभाविक उत्स और उसके निमाणण की प्रक्रिया हुदय से जुड़ी है। युदधि का हस्तक्षेप साहित्य पर हावी हुआ है। यही कारण है कि वहाँ भी नैतिकता को तिलांजालि देकर कई तरह की बात आज कही और लिखी जा रही है।

नैतिकता की आवश्यकता और मौजूदा जीवन-मूल्य में उसकी कमज़ोर पड़ती स्थिति चिंताजनक है। आचार्य तुलसी ने इस चिंता की तरफ खासतौर पर ध्यान दिलाया है। वे इस संदर्भ में अपनी बात काफ़ी सरल तरीके से रखते हैं। इस तरह की बात को कहने के लिए तीखे तर्क की शरण में न जाना पड़े, वे इसका पूरा ध्यान रखते हैं। इस चर्ची का आरंभ वे यह कहकर करते हैं कि नैतिकता एक शाश्वत मूल्य है। इसकी अपेक्षा हर युग में रहती है। सवयुग में कृि-मुनि होते थे। ये धर्म और नैतिकता की चर्चा किया करते थे।

उस समय भी धर्म के उपदेशक थे। जिस युग में धर्म और नीति के पाँव लड़खड़ाने लगे हों, सांप्रदायिकता, धार्मिक असहिष्युता, जातिवाद, हुआछूत, बेरोजगारी, कालाबानारी आदि बीमारियाँ सिर उठाए खड़ी हो, उस समय तो नैतिकता की आवाज़ उठाना और इसकी जरूरत को रेखांकित करना और अधिक ज्ञरूरी हो गया है। आज सब कुछ है, ट्रेन है, प्लेन हैं, कारखाने हैं, स्कूल है, भोगोपभोग की तमाम सामंत्रियाँ हैं। पर अच्छा आदमी नहीं है। इस एक कमी के कारण तमाम उपलब्धियाँ बेकार हो रही है। सब कुछ हैं, पर जब तक आदमी सही अर्थ में आदमी नहीं है, तब तक कुछ भी नहीं है। तुलसी की इस बात को अपने एक रेडियो साक्षात्कार में महादेवी वर्मा ने भी सुंदर तरीके से कहा है।

आचार्य तुलसी नैतिकता पर अपनी बात कहते हुए एक कथा-प्रसंग की मद्य लेते है। एक साधारण व्यक्ति किसी सेठ के पास गया। उसके घर में लड़की की शादी थी। बारात का आतिथ्य करने के लिए उसे किसी चीज़ की ज्ररूरत हुई। सेठ जी का नाम उसने बहुत सुना था। मन में बड़ी आशा सँजोकर वह सेठ जी के घर पहुँचा और बोला, मुझ्रे दो-चार दिन के लिए अमुक चीज़ की ज्ररूरत है। आप दे सकें तो बड़ी कृपा होगी। सेठ जी मसनद के सहारे बड़े आराम से बैठे थे। उन्होंने इधर-उधर देखा और कहा, आप कुछ समय बाद आना।

कुछ समय बाद आने पर भी उसे वही बात सुनने को मिली। जब वह तीसरी बार आया और सेठ ने फिर टालमटोल किया तो आगंतुक अधीर हो उठा। वह अपनी अथीरता ज्ञाहिर करते हुए बोला, भाई साहब । बाच क्या है? मुझे और भी कई काम करने हैं। आप मेरी दुविधा को समाप्त कीजिए। सेठ जी सुनकर गंभीर हो गए और अपनी कठिनाई बताते हुए बोले, भाई। तुम अन्यथा मत समझो। मैं क्या करू०? यहाँ कोई आदमी नहीं है। आगंतुक व्यक्ति ने चूटते ही कहा, मैं तो आपको आदमी समझकर ही आया था। सेठ जी के पास सबकुछ था। एक आदमी नहीं था, इसलिए कुछ भी नहीं था।

सामान्य तौर पर देखें-समझें तो देश आजाद हुआ और इसके साथ ही देश में अनेक समस्याओं का जन्म हुआ। इनका समाधान बरुरी है। इसके लिए हमें प्रयास करना होगा। कई बार मन में आता है कि कितना प्रयास करें। हम तो कब से कोशिश कर रहे है, लेकिन लोग हैं कि समझते ही नही। ऐसे में सूर्य को देखो। सूर्य से मत पूहो कि आज तक उसने कितना अंधकार मिटाया, उसका काम अंधकार मिटाने का है। रात को फिर अंधकार घिर आता है। इसकी वह चिंता नहीं करता, अगली सुबह फिर अपना दायित्व निभाने आ जाता है।

1. विचार, धर्म और मूल्य की मौलिक रचना में सबसे ऊपर क्या है?
(क) विचार
(ख) धर्म
(ग) मूल्य
(घ) नैतिकता
उत्तर :
(घ) नैतिकता

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2. आचार्य तुलसी नैतिकता से संबंधित अपनी घात प्रभावी बुंग से कहने के लिए क्या करते हैं?
(क) उपदेश देते हैं
(ख) व्याख्यान देते है
(ग) कथा सुनाते हैं
(घ) प्रसंगों से जोड़ते हैं
उत्तर :
(घ) प्रसंगों से जोड़ते हैं

3. लेखक ने सूर्य का उदाहरण क्यों दिया?
(क) प्रकाश को समझाने के लिए
(ख) अपना दायित्व निभाने के लिए
(ग) अंधकार मिटाने के लिए
(घ) चिंतामुक्त रहने के लिए
उत्तर :
(ख) अपना दायित्व निभाने के लिए

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4. सभ्यता और संस्कृति के विकास में चैतिकता को महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?
(क) स्वाभाविक प्रक्रिया होने के कारण
(ख) विचार और धर्म से जुड़े होने के कारण
(ग) मनुष्यता से जुड़े होने के कारण
(घ) जीवन को संयम में रखने के कारण
उत्तर :
(ख) विचार और धर्म से जुड़े होने के कारण

5. आधुनिक समय में नैतिकता में आने वाली गिरावट के लिए क्या कारण हो सकता है?
(क) विचार और बुद्धि के मेल को
(ख) सभ्यता के विकास को
(ग) बद्लती संस्कृति को
(घ) मनुष्य की इच्डा को
उत्तर :
(क) विचार और बुद्धि के मेल को

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6. समाज में मैतिकता की आवश्यकता क्यों बड़ रही है?
(क) बढ़ते सामाजिक पतन के कारण
(ख) भौतिकता की ओर रुझान के कारण
(ग) विचार और बुद्धि की प्रधानता के कारण
(घ) धर्म के प्रति दिखावे की प्रवृत्ति के कारण
उत्तर :
(घ) धर्म के प्रति दिखावे की प्रवृत्ति के कारण

7. आज सब- कुछ है, अच्छा आदमी नहीं है। – इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि-
(क) आज सिद्धांतवादी आदमी नहीं है।
(ख) आज ईमानदार आदमी का अभाव है।
(ग) आज धार्मिक व्यक्ति नहीं है।
(घ) आज नैतिक व्यक्ति नहीं है।
उत्तर :
(घ) आज नैतिक व्यक्ति नहीं है।

8. तुलसी की बात को रेडियो साक्षात्कार में महावेवी बर्मा को पुनः कहने की आवश्यकता क्यों पड़ी होगी?
(क) सामाजिक गिरावट को देखकर
(ख) तुलसी की बात के महत्व को समझकर
(ग) समाज को संदेश देने के कारण
(घ) उनकी बात से सहमति जताने के लिए
उत्तर :
(ग) समाज को संदेश देने के कारण

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9. गद्यांश के अनुसार आवमी होने के लक्षण क्या हो सकते हैं?
(क) संयमी होना
(ख) ईमानदार होना
(ग) नैतिक होना
(घ) अमीर होना
उत्तर :
(ग) नैतिक होना

10. इस गद्यांश का उच्चित शीर्षक क्या हो सकता है?
(क) दायित्व का निर्वहन
(ख) विचार और धर्म
(ग) नैतिकता का महत्व
(घ) जीवन-मूल्य की अनिवार्यता
उत्तर :
(ग) नैतिकता का महत्व

8. इंग्लैंड की मौजूदा महारानी एलिज्ञाबेथ की दादी थी क्वीन मैरी। एलिज्ञाबेथ की शादी के मौके पर महात्मा गांधी ने एक तोहफ़ा भेजा। उसे देखकर क्वीन हैरान रह गई। तोहफ़े में महात्मा ने भेजा था एक कपड़ा। जिस सूत से वह कपड़ा तैयार किया गया, उसे उन्होंने खुद काता था। उस कपड़े के बीच में लिखा था, ‘जय हिंद’। जय हिंद लिखे होने से क्वीन मैरी को उतना झटका नहीं लगा, जितना उस बात से, जो बात उनके मन में यह कपड़ा देखकर उभरी। उन्हें लगा कि उसका उपयोग लँगोटी के रूप में किया जाता है। जाहिर है कि ऐसा तोहफ़ा ठन्हें अच्छा नहीं लगा होगा।

यह घटना बताती है कि गांधी की वेश-भूषा ने अंग्रेजों के मन पर कैसी छाप छोड़ी थी। वह कपड़ा देखते ही क्वीन मैरी ने मान लिया कि यह लँगोट है। और शायद उसके बारे में एक उलझन बनी रही क्योंकि ऐसा लगता है कि अंग्रेज्ञ कभी नहीं समझ सके कि उसका क्या करना है।

साल 1921 में सितंबर की 22 तारीख को महात्मा गांधी ने तय किया कि वह अब एक ही वस्त्र पहनेंगे। वहीं पर उसी दिन से उन्होने एक धोती को लँगोटी के रूप में पहनना शुरू किया। जगाह थी मदुरै। वहीं पर उसी दिन उन्होंने एक नाई से अपना मुंडन भी कराया। अंतिम संस्कार की हिंदु रीति से मुंडन, कमर से ऊपर कोई वस्त्र नहीं होने और बिना सिले कपड़े को जो प्रतीक है, वह सोच-समझकर अपनाया गया। गांधी ने कहा था, साल खत्म होने वाला है और स्वराज हमें अय भी नही मिल सका। इम सब शोक में हैं और यह बात हमें सता रही है।

गाधी के उस फ़ैसले की छाप खादी के बारे में उनके विचारों में दिखती है। और इस बात में भी उन्होंने किस तरह ख्रुद को गरीबों की पंक्ति में खड़ा कर दिया और अपनी पहचान उनके साथ जोड़ ली। गांधी को इस दिक्कत का अहसास भी हुआ कि लोगों को खादी को अपनाना महँगा था। विदेशी मिलों में बने कपड़े खादी से कम दाम पर बेचे जा सकते थे।

यह ऐसी परेशानी है, जिसका सामना हस्तशिल्प वाली हर चीज्ञ को करना ही पड़ता है, जब उसका मुकाबला मिलों में बनी चीज से होने लगता है। गांधी अगर इस समस्या से निजात नही दिला सकते थे, तो कम-से-कम यह तो दिखा ही सकते थे कि जर्ररत भर का कपड़ा इस्तेमाल कर, खर्च किस तरह कम रखा जा सकता है। यही उन्हौने किया हँगोटी पहनकर। लोगों को उन्होंने याद् दिलाया, हमारी जलवायु ऐसी है कि गरमी के महीनों में हमें ज़्यादा कपड़ों की ज़रूरत नहीं होती। कपड़ों के बारे में कोई दिखावा नही होना चाहिए। हमारी तहजीब में तो वैसे भी इस बात पर कभी सोर नहीं रहा कि पुरुष अपना पूरा शरीर बकें।

लेकिन इस आखिरी दरील को लेकर गांधी के मन में कुछ हिचक थी क्योंक खिलाफ़त आंदोलन के ज्ञरिए वह कोशिश कर रहे थे की हिंदुओं और मुसलमानों में एकता हो जाए। सुशीला नायर ने अपने भाई प्यारेलाल के साथ मिलकर गांधी की जीवनी लिखी। उसके पाँचर्वें खंड में उन्होंने लिखा, उन्हें इस बात का डर था की उनके लँगोटी पहनने पर कुछ लोग ऐतराज़ कर सकते थे। वह तो बी० अम्मा ने भरोसा दिलाया, तब जाकर गांधी जी की हिचक खत्म हुईं। बी० अम्मा का असल नाम आबादी बानो बेगम था। वह खिलाफ़त आंदोलन के नेताओं मौलाना मुहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली की मॉ थीं। बी० अम्मा असहयोग आंदोलन और खिलाफ़त आंदोलन में खुद भी शामिल हुई।

1. महात्मा गांधी ने एलिखाबेथ की शादी के मौके पर क्या उपहार भेजा था?
(क) तोहफ़ा
(ख) कपड़ा
(ग) लँगोटी
(घ) मज्ञाक
उत्तर :
(ख) कपड़ा

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2. गांधी ने एक ही वस्त्र में रहने का निर्णय क्यों लिया था?
(क) बिना सिले कपड़े पहनने के कारण
(ख) हिंदू रीति अपनाने के कारण
(ग) भारतीयों के समान दिखने के कारण
(घ) दुखी होने के कारण
उत्तर :
(ग) भारतीयों के समान दिखने के कारण

3. गाधी जी की जीवनी किसने लिखी थी?
(क) प्यारेलाल ने
(ख) महादेव ने
(ग) मुहम्पद अली ने
(घ) सुशीला नायर ने
उत्तर :
(घ) सुशीला नायर ने

4. लँगोट पहनने को लेकर गांधी के मन में हिखक क्यों थी?
(क) अपनी दलील के प्रति शंका के कारण
(ख) आधा शरीर नंगा रहने के कारण
(ग) कुछ लोगों के संभावित विरोध के कारण
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(क) अपनी दलील के प्रति शंका के कारण

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5. गांधी द्वारा भेजे गए तोहफ़े को वेखकर क्वीन के हैरान होने का क्या कारण रहा होगा?
(क) गांधी से इस प्रकार मज्ञाक की उम्नीद नहीं थी
(ख) तोहफ़े में कपड़े को देखकर
(ग) कपड़े पर जय हिंद लिखे होने से
(घ) लँगोट के लिए प्रयोग होने वाले कपड़े को देखकर
उत्तर :
(घ) लँगोट के लिए प्रयोग होने वाले कपड़े को देखकर

6. कपड़े को देखते ही क्वीन मैरी ने यह क्यों मान लिया कि यह लँगोट है?
(क) कपड़े का रंग देखकर
(ख) कपड़े का आकार देखकर
(ग) गांधी की वेश-भूषा देखकर
(घ) भारत की गरीबी को महसूस कर
उत्तर :
(ग) गांधी की वेश-भूषा देखकर

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7. ‘साल खत्म होने वाला है और स्वराज हमें अब भी नहीं मिल सका है’- इस कथन से गांधी के किस मनःस्थिति का पता चलता है?
(क) हताशा
(ख) निराशा
(ग) दुख
(घ) शोक
उत्तर :
(घ) शोक

8. मिल के कपड़ों से हस्तशिल्प के कपड़े महँगे होने के बाद भी गांधी ने किस आधार पर खादी अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित किया?
(क) जरूर्त भर कपड़ा इस्तेमाल कर
(ख) गरीबों के साथ हिल-मिल कर
(ग) इस समस्या को समझकर
(घ) लँगोट को तहज्जीब से जोड़कर
उत्तर :
(ख) गरीबों के साथ हिल-मिल कर

9. बी० अम्मा के भरोसे पर गांधी जी की हिचक खत्म होने के क्या कारण थे?
(क) बी० अम्मा पर गांधी को भरोसा था।
(ख) बी० अम्मा एक स्वतंत्रता सेनानी थी।
(ग) बी० अम्मा पर लोग भरोसा करते थे।
(घ) वह अली भाइयों की बहन थी।
उत्तर :
(ख) बी० अम्मा एक स्वतंत्रता सेनानी थी।

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10. गद्यांश के आधार पर बताइए कि लोगों के लिए खादी के वस्त्र अपनाना कठिन क्यों था?
(क) खादी के वस्तों में चमक नहीं थी।
(ख) खादी के वस्त्र महँगे थे।
(ग) खादी के वस्त्रों में आकर्षण नहीं था।
(घ) खादी के वस्त्र उपलब्ध नहीं थे।
उत्तर :
(ख) खादी के वस्त्र महँगे थे।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Summary – Devsena Ka Geet, Karneliya Ka Geet Summary Vyakhya

In this post, we have given Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Summary, Devsena Ka Geet, Karneliya Ka Geet Summary Vyakhya. This Hindi Antra Class 12 Summary is necessary for all those students who are in are studying class 12 Hindi subject.

देवसेना का गीत Summary – कार्नेलिया का गीत Summary – Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Summary

देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत – जयशंकर प्रसाद – कवि परिचय

कवि-परिचय :

जीवन-परिचय – श्री जयशंकर प्रसाद आधुनिक युग के श्रेष्ठ कलाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने काव्य को सौँदर्य एवं प्रेम से विभुषित कर आकर्षक बना दिया। प्रसाद जी का जन्म सन 1888 ई० में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम देवी प्रसाद था। वे सूँघनी साहु के नाम से प्रसिद्ध थे। उनमें कविता-प्रेम और रसिकता भी थी। इस प्रकार सरस्वती एवं लक्ष्मी के संयुक्त मंदिर में प्रसाद जी का शैशव व्यतीत हुआ।

प्रम्नाद जी की शिक्षा का प्रबंध घर पर ही किया गया। उन्होंने संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज्जी का विशद अध्ययन किया। वेदों और उपनिषदों में उनका विशेष चिंतन और मनन रहा। इस प्रकार उन्होंने अध्ययन के बल पर साहित्य जगत में खड़े होने के लिए एक दृढ़ आधार बना लिया। यही कारण है कि जब उन्होंने कलम उठाई तो सभी मंत्र-मुग्ध हो गए। संवत 1994 अर्थांत सन 1937 में साहित्य का यह देवता सदा के लिए निद्रा में लीन हो गया।

रचनाएँ – प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने साहित्य के प्रत्येक अंग को समृद्ध बनाया। वे कहानीकार, उपन्यास-प्रणेता, नाटककार और श्रेष्ठ कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
काव्य-संग्रह – चित्राधार, कानन कुसुम, प्रेम-पथिक, करुणालय, महाराणा का महत्व, झरना, आँसु, लहर, कामायनी।
नाटक – राज्यश्री, विशाख, सज्जन, प्रायश्चित, जनमेजय का नाम यज्ञ, अजातशत्रु, समुद्रगुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी।
उपन्यास – कंकाल, तित्ली, इरावती (अपूर्ण)।
कहानी-संग्रह – छाया, प्रतिध्वनि, आँधी, इंद्रजाल, आकाशदीप।
निबंध – काव्य-कला तथा अन्य निबंध।

कामायनी श्री जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कृति है और आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें आदिपुरुष मनु और आदिस्त्री श्रद्धा के माध्यम से मानव-विकास की कथा पर प्रकाश डाला गया है। इस कथा में रूपक की भी सुंदर योजना है। बुद्धिवाद और हददयवाद का समन्वय कामायनी का प्रमुख संदेश है। भाव पक्ष एवं कला पक्ष दोनों दृष्टियों से यह एक सुंदर रचना है। छायावादी काव्य-सरोवर में कामायनी सरोज के समान शोभायमान है जिसपर रसिक भ्रमरी की गुंजार सुनाई देती रहती है।

काव्यगत विशेषताएँ – प्रसाद जी का काव्य विविध विशेषताओं का पुंज है जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) प्राकृतिक सौँदर्य का चित्रण – छायावादी कवि प्रकृति के अनन्य उपासक रहे हैं और प्रकृति के प्रति उनका अगाध आकर्षण शतशः गीतों में फूटा है। प्रसाद जी का प्रकृति-चित्रण भाव संचालित होता रहा है। प्रसाद का काव्य प्रकृति के मनोरम दृश्यों एवं पदार्थों की रंगीन चित्रशाला है। प्रकृति के कोमल तथा कठोर रूपों का अंकन समान रूप से उन्होंने किया है। ‘कामायनी’ में प्राकृतिक सँदयर्य के शतशः चित्र अंकित किए गए हैं। ‘ऊषा’ का साँदर्य द्रष्ठव्य है-

ऊषा सुनहले तीर बरसती जल लक्ष्मी-सी उदित हुई।

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(ii) मानव प्रेम – प्रसाद जी उदार विचारों के आध्यात्मिक व्यक्ति थे। मानवमात्र से प्रेम उनके काव्य का गुण है। प्रेम के आदर्श रूप को आँसू, कामायनी तथा प्रेम-पथिक में देखा जा सकता है। कवि का कोमल हुदय किसी भी दुखी मनुष्य को देखकर पिघल जाता है। आप लिखते हैं कि –

जल उठा स्नेह दीपक-सा नवनीत हइदय था मेरा
अवशेष धूम रेखा-सा, चित्रित कर रहा अँधेरा।

(iii) ईश्वर-प्रेम – छायावादी कवि रहस्यवादी भी हैं और प्रकृति में प्रभु के दर्शन करते हैं। प्रसाद जी के काव्य में रहस्यवादी तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। जिज्ञासा, प्रेम, विरह तथा मिलन के सोपानों से गुज्जरने वाली ईश्वर प्रेम की भावना का कवि ने वर्णन किया है। कवि, ईश्वर के अस्तित्व के विषय में जिज्ञासा व्यक्त करता हुआ कहता है-

हे अनंत रमणीय ! कौन तुम ? यह मैं कैसे कह सकता।
कैसे हो? क्या हो ? इसका तो भार विच्चार न सह सकता।

(iv) देश-प्रेम – प्रसाद जी का उत्कृष्ट देश-प्रेम उनकी देश-भक्तिपूर्ण रचनाओं में झलकता है। देश की परंपराओं, इतिहसस एवं संस्कृति में अटूट आस्था होने के कारण उन्होंने देश-प्रेम के अनेक गीत लिखे। उनका अमर गीत है-

अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

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(v) मानव-साँदर्य – छायावादी कवियों की अदम्य सँददर्य लालसा केवल प्रकृति और राष्ट्र के साँदर्य को अंकित करके ही समाप्त नहीं हो गई बल्कि मनुष्यों के शारीरिक साँदर्य के साथ-साथ उनके कर्म तथा भाव-सँददर्य का चित्रण भी उन्होंने विस्तारपूर्वक किया है। ‘आँसू’ खंडकाव्य में अपनी प्रेयसी के सौँदर्य का चित्रण करते हुए कविवर लिखते हैं कि-

चंचला स्नान कर आवे चंड्रिका पर्व में जैसी,
उस पावन तन की शोभा आलोक मधुर थी ऐसी।

प्रेम और साँदर्य के साथ-साथ प्रसाद जी के काव्य में विश्व-बंधुत्व, सर्वजन हिताय तथा व्यापक मानवतावाद से ओत-प्रोत रचनाएँ भी हैं। प्रसाद जी मूलत: आंतरिक अनुभूतियों के कवि हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उनका काव्य समकालीन हलचलों को अनदेखा करता है। प्रसाद औ की कविता मानव में ईश्वर और ईश्वर में मानव को देखती है।

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(vi) भाषा-शैली – प्रसाद जी की भाषा-शैली परिष्कृत, स्वाभाविक, तत्सम शब्दावली प्रधान एवं सरस है। छोटे-छोटे पदों में गंभीर भाव भर देना और उनमें संगीत लय का विधान करना उनकी शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

देश-प्रेम की रचनाओं में ओज-गुण प्रधान शब्दावली, भृंगार रस प्रधान रचनाओं में माधुर्य-गुण से युक्त शब्दावली तथा प्रसाद-गुणयुक्त शब्दावली का प्रयोग किया गया है। शब्द-चित्रों की सुंदर योजना प्रसाद जी की रचनाओं में रहती है। रसवादी होने के कारण उनकी रचनाओं में सभी रसों का पूर्ण परिपाक देखा जा सकता है। प्रसाद जी की रचनाओं में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।

Devsena Ka Geet Class 12 Hindi Summary

देवसेना का गीत :

‘देवसेना का गीत’ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक ‘स्कंदगुप्त’ से लिया गया है। देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन थी। हूर्णों के आक्रमण से बंधु वर्मा का सारा परिवार मारा गया था। देवसेना बच गई थी। वह राष्ट्र की सेवा में लगी हुई थी। वह स्कंदगुप्त से प्रेम करती थी परंतु स्कंदगुप्त विजया को चाहता था। जीवन के अंतिम दिनों में स्कंदगुप्त देवसेना से विवाह करना चाहता है। देवसेना मना कर देती है। वह अपनी समस्त कोमल भावनाओं को दबाकर यह गीत गाती है-‘आह।

वेदना मिली विदाई !’ अपने जीवन की इस संध्याबेला पर अपने यौवन को देवसेना भ्रमवश किए गए क्रियाकलापों की श्रेणी में रखती है। उन दिनों की नादानियों को याद करके उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकलती है। उसे लगता है मानो परिश्रम करके थक कर सोए हुए पथिक को स्वप्न लोक में ही किसी ने विरह की रागिनी सुना दी हो। उसे लगता है जैसे वह अपनी बचाई हुई समस्त पूँजी लुटा चुकी है। वह जीवन संघर्षों से निरंतर जूझती रही है। वह चाहती है कि संसार के लोगों ने उसे जो इतनी करुणा दी है उसे वह वापस ले ले क्योंकि वह इसे और नहीं सँभाल सकती।

Karneliya Ka Geet Class 12 Hindi Summary

कार्नेलिया का गीत :

प्रस्तुत कविता जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक ‘ चंद्रगुप्त’ से अवतरित है। इस गीत में यूनान के सम्राट सिकंदर महान के उत्तराधिकारी सैल्यूकस की पुत्री कानेंलिया भारत-भूमि के साँदर्य को देखकर मुग्ध हो जाती है और उसके मुख से यह गीत प्रस्युटित हो जाता है। वह भारत देश की प्रशंसा करते हुए कहती है कि वास्तव में यह देश मधुमय है। हमारा देश राग एवं प्रेम की भूमि है। भारत वह देश है जहाँ अपरिचित व्यक्ति को भी आश्रय मिलता है। हमारा देश वह स्थान है जहाँ पर तरु-शिखाएँ नाचती हुई प्रतीत होती हैं। कमल की पीली-पीली पंखुडियों के समान पक्षी वृक्ष की सुंदर शाखाओं पर नृत्य करते हैं।

छोटे-से इंद्रधनुष के समान रंग-बिरंगे पंखोंवाले पक्षी अपने पंखों को फैलाकर शीतल-मंद वायु के सहारे उड़ते हुए इस देश को अपना रैनबसेरा समझकर यही आकर विश्राम करते हैं। यहाँ के लोगों में करुणा का भाव भरा रहता है। प्रातःकाल के समय रातभर जागने के कारण जब तारे ऊँघने लगते हैं तो उषा रूपी सुंदरी सूर्य रूपी स्वर्ण कलश से यहाँ के जन जीवन पर सुख और साँदर्य की वर्षा करती है।

देवसेना का गीत सप्रसंग व्याख्या

1 आहा! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।
छलछल थे संध्या के श्रमकण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थी-
नीरवता अनंत अँगड़ाई।

शब्दार्थ : विदाई – बिछड़ने या जुदा होने की अवस्था। वेदना – व्यथा, पीड़ा, दुख। संचित – एकत्र करना। श्रमकण – परिश्रम की बूँदें, आँसू। नीरवता – खामोशी।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक ‘स्कंदगुप्त’ के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाए गए गीत ‘अाह। वेदना मिली विदाई!’ से ली गई हैं। देवसेना अपनी समस्त साधना के फल को अपने प्रिय के चरणों में समर्पित कर जीवन के भावी सुखों, आशाओं और आकाक्षाओं सबसे विदा लेते हुए यह गीत गाती है।

व्याख्या – देवसेना अपने हुदय की वेदना के गीत को वाणी देते हुए कहती है कि यह मेरा कैसा दुर्भाग्य है कि मुझे विदा के समय भी वेदना मिली है। मैं जीवनभर जिन भावनाओं को श्रमवश अपने हुदय में सँजोए रही अंत में उन्हीं को भीख में लुटा रही हूँ। विदा के इस समय संध्या भी दिनभर श्रम करने के बहाने से आसूू बहा रही है। विदाई की इस वेला में जुदाई के कारण संध्या भी मानो आँसू बहा रही है। मेरी इस यात्रा के समय चारों ओर केवल खामोशी ही खामोशी थी। एक विचित्र-सी शांति थी, जिसका कहीं कोई अंत नहीं था। ऐसा लगता था जैसे नीरवता अंगड़ाइयाँ ले रही थी।

विशेष :

  1. देवसेना के हूदय की वेदना सजीव बनकर शब्दों के माध्यम से व्यक्त हुई है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान एवं लाक्षणिकता से युक्त है।
  3. उपमा, अनुप्रास और मानवीकरण अलंकार हैं।
  4. छायावादी काव्य के दुखवाद और निराशा के साक्षात दर्शन होते हैं।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Summary - Devsena Ka Geet, Karneliya Ka Geet Summary Vyakhya

2 श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,
गहन-विपिन की तरु-छाया में,
पथिक उनीदी श्रुति में किसने-
यह विछाग की तान उठाई।
लगी सतुष्ण दीठ थी सबकी,
रही बचाए फिरती कबकी।
मेरी आशा आह! बावली,
तूने खो दी सकल कमाई।

शब्दार्थ : श्रमित – परिश्रम करके थका हुआ। मधुमाया – मधुर मोह। गहन – घने, बहुत। विपिन – जंगल, वन। तर – वृक्ष। पधिक – मुसाफ़िर, यात्री। उर्नीदी – ऊँचती हुई। श्रुति – सुनने की क्रिया। विहाग – विदा का गीत, विरह का गीत। सतृष्ण – प्यासी, अतृप्त। दीठ – दृष्टि, निगाह।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Summary - Devsena Ka Geet, Karneliya Ka Geet Summary Vyakhya

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रंचित नाटक ‘स्कंदगुप्त’ के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाए गीत आह। बेदना मिली विदाई !’ से ली गई हैं। इस गीत में देवसेना अपनी साधना के फल को प्रिय के चरणों में समर्पित कर अपने भावी जीवन के सभी सुखों से विदा लेते हुए अपनी भावनाओं को व्यक्त करती है।

व्याखया – देवसेना अपने हुद्य की तीव्र वेदना को स्वर प्रदान करते हुए कहती है कि स्वप्न थक गए परंतु मोह की मधुरता अभी भी बनी हुई है। आसक्ति नहीं मिट रही। इस समय भी न जाने किस पथिक ने ऊनींदी अलसाई-सी वाणी में घने वन-क्षेत्र में वृक्षों की छाया के नीचे विदा का मधुर गीत गाया है। मेरी साधना के फल की ओर न जाने कितने लोगों की प्यासी नजरें लगी हुई थी। मे सबकी दुष्टियों से उस फल को न जाने कब से बचाती फिर रही थी। फिर भी मेरी आशा पूरी नहीं हुई थी। इस प्रकार मैने जीवन में जो कुछ भी कमाया था, वह सब भी खो दिया है।

विशेष :

  1. देवसेना अपने जीवन में प्राप्त सब कुछ खो बैठी है। अतीत के क्षणों की स्मृति भी उसके लिए दुखद बन गई है।
  2. भाषा तत्सम-प्रधान और लाक्षणिक है।
  3. छायावादी दुखवाद मुखरित हुआ है।

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3 चळकर मेरे जीवन-रथ पर,
प्रलय चल रहा अपने पथ पर।
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,
उससे हारी-होड़ लगाई।

लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे

शब्दार्थ : प्रलय – विनाश, मृत्यु। दुर्बल – कमज़ोर। पद – पैर। होड़ – शर्त, बाजी। थाती – अमानत।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘देवसेना का गीत’ नामक कविता से ली गई है। यह गीत कवि द्वारा रचित नाटक स्कंदगुप्त’ के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना गाती है। इस गीत में देवसेना के हुदय की समस्त वेदना मुखरित हो उठी है।

व्याख्या – देवसेना अपने मन की व्यथा को स्वर प्रदान करते हुए कहती है कि अब तो मेरे जीवन में केवल प्रलय ही शेष रह गई है। मेरे जीवन रूपी रथ पर प्रलय ही मेरे साथ चल रहा है। फिर भी मैं अपने दुर्बल पैरों से चलकर उसके साथ होड़ लगाकर चल रही हैं। देवसेना इस संसार के लोगों को संबोधित करते हुए कहती है कि हे निष्ठुर संसार के लोगो । अब मेंरे हुय की करुण रागिनी हाहाकार कर रही है। तुमने मुझे जो कुछ दिया है अपनी वह अमानत मुझसे वापस ले लो। इसे मैं नहीं सँभाल सकती। इसी के कारण मैं अपने मन की लग्जा की रक्षा भी न कर सकी और सबके सामने उसे खो बैठी।

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विशेष :

  1. देवसेना इस विदाई की वेला में अत्यधिक संतृष्त हो उठती है और संसार से उसे जो कुछ मिला है वह उसे ही लौटा देना चाहती है।
  2. भाषा तत्सम-प्रधान एवं लाक्षणिक है।
  3. रूपक, अनुप्रास, पुनरक्तिप्रकाश अलंकार दर्शनीय हैं।
  4. छायावादी दुखवाद का सजीव अंकन है।
  5. गेयता का गुण विद्यमान है।

कार्नेलिया का गीत सप्रसंग व्याख्या

1 अरुण ! यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कु कुम सारा ॥
लघु सुरधनु-से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँढ किए, समझ नीड़, निज प्यारा।

शब्दार्थ : अरुण – लालिमा से युक्त। मधुमय – प्रेममय, रसमय। क्षितिज – जहाँ पृथ्वी एवं आकाश मिलते दिखाई देते हैं। तामरस – कमल। गर्भ विभा – भीतर की आभा (कांति)। लघु – छोटे। सुरधनु – इंद्रधनुष। समीर – वायु। खग – पक्षी। नीड्ड – घोंसला।

प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाद्य-पुस्तक की ‘कार्नेलिया का गीत’ शीर्षक कविता से अवतरित है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। यह पद्यावतरण उनके सुप्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’ का एक गीत है। यूनान के सम्राट सिकंदर महान के उत्तराधिकारी सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया भारत-भूमि के सॉँद्य को देखकर मुण्ध हो जाती है और उसके मुख से बरबस यह गीत निकल पड़ता है। इस गीत में भारत की प्राकृतिक सुंदरता एवं सांस्कृतिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है।

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व्याख्या – भारत देश की प्रशंसा करते हुए कार्नेलिया कहती है कि हमारा देश लालिमा से युक्त तथा प्रेममय है। यह प्रेम एवं माधुर्य से परिपूर्ण है। भारतवर्ष में पहुँचकर सर्वथा अज्ञात एवं अपरिचित व्यक्ति को भी आश्रय मिलता है। यहाँ रस से युक्त कमल के फूलों के पराग कणों पर पेड़ों की सुंदर चोटियों से सूर्य किरणें नीचे आकर नाचती हुई दिखाई पड़ती हैं। प्रातःकाल सर्वत्र सूर्य की किरणें छा जाने से वृक्षों की सुंदर शाखाएँ लहलहाती दिखाई पड़ती है और कमल के फूलों के पराग-कोश प्रकाश की किरणों के कारण रस से परिपूर्ण दिखाई देने लगते हैं।

हरे-भरे वृक्षों पर गिरती हुई सूर्य की किरणें ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे चारों तरफ़ मंगलमय कुमकुम विखरा हुआ है जिसमें जीवन का संचार दिखाई देता है। समस्त प्रकृति सचेतन दिखाई पड़ती है। यहाँ के पक्षी इंद्रधनुष की भाँति रंग-बिरंगे पंखों को पसारे हुए शीतल पवन के सहारे इसे अपना प्यारा नीड़ समझकर इसी ओर मुख करके ठंडी-ठंडी हवा में रंग-बिंगे पक्षी उड़ते रहते हैं।

विशेष :

  1. भारत की प्रकृति असीम सँदूर्य से परिपूर्ण है। प्रकृति माधुर्य भाव से परिपूर्ण है।
  2. कवि की राष्ट्रीयता की भावना और सास्कृतिक गौरव की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।
  3. ‘लघु सुरधनु-से’ में उपमा अलंकार है।
  4. संपूर्ण छंद संगीतात्मकता से परिपूर्ण है। प्रत्येक पद से संगीत की स्वर लहरी फूटती-सी दिखाई देती है।
  5. गीत में प्रतीकात्मकता है।’अरुणोदय’ ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है तथा पक्षियों का इस ओर उड़ने से पश्चिमी देशों के लोगों का भारत में आने का पता लगता है।
  6. लाभ्क्षणिकता का प्रयोग किया गया है।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Summary - Devsena Ka Geet, Karneliya Ka Geet Summary Vyakhya

2 बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकराती अनंत की-पाकर जहाँ किनारा।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती टुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा॥

शब्दार्थ : हेम-कुंभ – सोने का घड़ा। मदिर – मस्त। रजनी – रात्रि।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘कार्नेलिया का गीत’ से ली गई हैं। यह गीत कवि द्वारा रचित नाटक ‘ चंद्रगुप्त’ से लिया गया है। जिसमें कार्नेलिया ने भारत देश की महिमा का गुणगान किया है।

व्याख्या – इन पंक्तियों में कार्नेलिया भारत की प्राकृतिक सुषमा का गुणगान करते हुए कहती है कि यहाँ के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की तरह करुणा का जल भरा रहता है अर्थात यहाँ के जन-जन के नेत्रों में दूसरे के प्रति करुणा और स्नेह के भाव रहते हैं। जहाँ पर असीम आकाश में बहती हुई वायु की तरंगें किनारा पाकर टकराती हैं। जहाँ पर चारों ओर शीतल वायु बहती रहती है। प्रात:काल के समय रातभर जागते रहने के कारण तारे जब कुछ खुमारी में मस्त हुए से ऊँघने लगते हैं तो यह उषा रूपी सुंदरी स्वर्ण-घट से जन-जीवन पर सुख-साँदर्य और उत्साह बरसाने लगती है। तात्पर्य यह है कि उषा देवी प्रातःकाल सूर्य रूपी स्वर्णिम घट लेकर पश्चिमी सागर में से भरकर उड़ेलती है और चारों ओर सुख एवं प्रकाश का प्रसार करती है।

विशेष :

  1. भारतवर्ष के प्राकृतिक साँदर्य का वर्णन किया गया है।
  2. उषा और तारों का मानवीकरण किया गया है। वह हेम-कुंभ के माध्यम से सुख उड़ेलती है तथा ढुलकाती है।
  3. हेम-कुंभ में रूपक अलंकार है।
  4. भाषा, सहज, सरल, प्रवाहमय तथा नाटकीयता से पूर्ण है।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Question Answer देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

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NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 1 देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

Class 12 Hindi Chapter 1 Question Answer Antra देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

(क) देवसेना का गीत :

प्रश्न 1.
“मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई ” – पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इस पंक्ति के माध्यम से देवसेना अपने अतीत पर दृष्टिपात करते हुए कह रही है कि वह आजीवन अपने हृदय में कोमल भावनाओं को सँजोती रही है। उसका यह कार्य भ्रमवश किया हुआ ही था क्योंकि जिसे उसने अपने द्वार पर आने पर ही लौटा दिया था उसके लिए कोमल कल्पनाएँ करना व्यर्थ ही है। इसलिए उसे अंत में उन संचित भावनाओं को भीख में ही लुटाना पड़ रहा है। वह अपनी जीवनभर संचित कोमल भावनाओं की पूँजी को सुरक्षित नहीं रख सकी।

प्रश्न 2.
कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?
उत्तर :
कवि ने आशा को बावली इसलिए कहा है क्योंकि मनुष्य जीवन में अनेक प्रकार की आशाएँ लगाए रहता है कि वह यह करेगा, ऐसा करेगा, वैसा करेगा परंतु उससे कुछ हो नहीं पाता। उसकी अधिकांश आशाएँ अधूरी रह जाती हैं अथवा पूरी हो नहीं हो पातीं। वह बार-बार आशाएँ पूरी न होने पर भी आशा लगाकर बैठा रहता है कि अब नहीं तो कल तो उसकी आशा पूरी हो ही जाएगी। इस प्रकार निरंतर आशा के सहारे जीना देखकर ही कवि ने आशा को बावली कहा है। देवसेना ने भी अनेक आशाएँ लगाई थीं परंतु उसकी भी कोई आशा पूरी नहीं हुई थी।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Question Answer देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

प्रश्न 3.
“मैंने निज दुर्बल ‘मैंने निज दुर्बल ……. होड़ लगाई” इन पंक्तियों में ‘दुर्बल पद बल’ और ‘हारी होड़’ में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए।
अथवा
इस गीत पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
देवसेना जीवनभर अनेक विसंगतियों का सामना करती रही है। उसके भाई का सारा परिवार हूणों द्वारा मार दिया गया। वह अकेली ही राष्ट्र सेवा में लगी रही। इसके लिए उसने अपने प्यार को भी त्याग दिया। उसका सांसारिक विपत्तियों का अकेले सामना करना ऐसा है जैसे वह प्रलयकालीन स्थितियों का अपने दुर्बल पैरों से मुकाबला कर रही हो। उसने प्रलयकालीन परिस्थितियों में जूझने की जो शर्त लगाई उसे पूरा करने का उसने पूरा प्रयत्न किया परंतु इस शर्त में उसे पराजित ही होना पड़ा। वह संसार की कुटिल चालों का सामना नहीं कर सकी।

प्रश्न 4.
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया ………. तान उठाई।
(ख) लौटा लो ………… लाज गँवाई।
उत्तर :
(क) देवसेना मानती है कि स्वप्न थक गए हैं परंतु आसक्ति अभी भी मिटी नहीं है। उसके कानों में विहाग का गीत गूँजता रहता है। तत्सम-प्रधान शब्दावली है। ‘श्रमित स्वप्न’ उनींदी श्रुति में लाक्षणिक सौंदर्य दृष्टव्य है। अनुप्रास अलंकार है। शृंगार रस के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण किया गया है। माधुर्यगुण तथा गेयता विद्यमान है। स्थिति विशेष का चित्रात्मक निरूपण किया गया है।

(ख) देवसेना को लगता है कि वह अब और अधिक संताप सहन नहीं कर सकेगी। इसलिए वह निष्ठुर संसार को कहती है कि उसने उसे जो कुछ दिया है उसे वह लौटा ले। वह तो अपने मन की लज्जा की भी रक्षा न कर सकने के कारण उसे भी खो बैठी है। तत्सम- प्रधान लाक्षणिक शब्दावली है। देवसेना के हृदय की वेदना व्यक्त हुई है। शृंगार के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण किया गया है। मानवीकरण अलंकार के द्वारा भावों का मानवीकरण किया गया है।

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प्रश्न 5.
देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?
उत्तर :
देवसेना के भाई बंधुवर्मा और उसके सारे परिवार को हूणों ने मार दिया था। भाई की मृत्यु के बाद देवसेना अकेली ही भाई के स्वप्नों को पूरा करने के लिए राष्ट्र सेवा में लग जाती है। वह स्कंदगुप्त को प्रेम करती है परंतु स्कंदगुप्त विजया की ओर आकर्षित है। इसलिए उसे प्रेम में निराशा ही मिलती है। बाद में स्कंदगुप्त उससे प्रणय निवेदन करता है तो वह उसे स्वीकार नहीं करती। इस प्रकार दोनों ही बार वह प्रेम में निराश ही रहती है। राष्ट्र की सेवा करने में भी वह आक्रमणकारियों का सामना नहीं कर पाती। वह आजीवन विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते-करते हार जाती है। उसके दुर्बल पग प्रलय को पराजित नहीं कर पाते।

(ख) कार्नेलिया का गीत :

प्रश्न 1.
‘कार्नेलिया का गीत ‘ कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर :
‘कार्नेलिया का गीत’ कविता जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से अवतरित है। इस गीत में यूनान के सम्राट सिकंदर के महान उत्तराधिकारी सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया भारत-भूमि के सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो जाती है और उसके मुख से यह गीत प्रस्फुटित हो जाता है। वास्तव में यह देश मधुमय है। हमारा देश राग एवं प्रेम की भूमि है। भारत वह देश है जहाँ अपरिचित व्यक्ति को भी आश्रय मिलता है।

भारत देश के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करते हुए कार्नेलिया कहती है कि हमारा देश वह स्थान है जहाँ लालिमामयी आभा से सुंदर तरु शिखाएँ नाचती हुई दिखाई पड़ती हैं। प्रातः काल सर्वत्र सूर्य की किरणें छा जाने से वृक्षों की सुंदर शाखाएँ लहलहाती दिखाई पड़ती हैं। कमल के फूलों के परागकोश सूर्य की किरणों के कारण जगमगा उठते हैं। हरियाली पर मंगलमय कुमकुम बिखरा हुआ है जिसमें जीवन का संचार दिखाई देता है। समस्त प्रकृति सचेतन दिखाई पड़ती है। यहाँ के पक्षी इंद्रधनुष की भाँति रंग-बिरंगे पंखों को पसारे हुए शीतल पवन के सहारे इसे अपना प्यारा नीड़ समझकर इसी ओर मुख करके उड़ते हैं अर्थात ठंडी-ठंडी हवा में अपना प्रिय नीड़ समझकर रंग-बिरंगे पक्षी उड़ते हैं।

कार्नेलिया आगे कहती है कि यहाँ के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की तरह करुणा का जल भरा रहता है अर्थात यहाँ के जन-जन के नेत्रों में दूसरे के प्रति करुणा और स्नेह के भाव रहते हैं। यहाँ पर असीम आकाश में बहती हुई वायु की तरंगें किनारा पाकर टकराती हैं अर्थात जहाँ चारों ओर शीतल वायु बहती रहती है। प्रातः काल के समय रातभर जागते रहने के कारण तारे जब कुछ खुमारी में मस्त हुए से ऊँघने लगते हैं तो यह उषा सुंदरी सूर्य रूपी स्वर्ण से जन-जीवन पर सुख-सौंदर्य और उत्साह बरसाने लगती है। तात्पर्य यह है कि उषा देवी प्रातःकाल सूर्य रूपी स्वर्णिम घट लेकर पश्चिमी सागर में से भरकर उड़ेलती है और चारों ओर सुख एवं प्रकाश का प्रसार करती है।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Question Answer देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

प्रश्न 2.
‘उड़ते खग’ और ‘बरसाती आँखों के बादल’ में क्या विशेष अर्थ व्यंजित होता है ?
उत्तर :
‘उड़ते खग’ के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि भारतवर्ष में सबको विचरण करने की स्वतंत्रता है। इसलिए यहाँ प्रत्येक प्राणी को अपने घर जैसी सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। सब आनंद और सुख से रहते हैं।
‘बरसाती आँखों के बादल’ के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करता है कि यहाँ के प्रत्येक व्यक्ति के नेत्रों में दूसरे के प्रति करुणा और स्नेह के भाव भरे रहते हैं। इसलिए यहाँ के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की तरह करुणा का जल भरा रहता है।

प्रश्न 3.
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
‘हेम कुंभ ले उषा सवेरे – भरती दुलकाती सुख मेरे
मंदिर ऊँघते रहते जब – जगकर रजनी भर तारे।’ में निहित प्राकृतिक सौंदर्य को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
इन पंक्तियों में कवि ने प्रभातकालीन प्राकृतिक वातावरण का आकर्षक वर्णन किया है। कवि को ऐसा लगता है मानो उषा रूपी सुंदरी स्वर्णिम कलश से सुबह – सुबह मेरे समस्त सुख उड़ेल देती है जबकि सारी रात जागने के कारण तारे मस्ती में ऊँघने लगते हैं। उषा और तारों का मानवीकरण किया गया है। रूपक, अनुप्रास अलंकार है। भाषा तत्सम प्रधान, लाक्षणिक तथा प्रतीकात्मक है। संगीतात्मक का गुण विद्यमान है। प्रभातकालीन वातावरण का आलंकारिक एवं आकर्षक वर्णन अत्यंत सजीवता के साथ चित्रित किया गया है। उषा स्वर्णिम घट प्रभातकालीन लालिमा से बिखेर रही है।

प्रश्न 4.
‘जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ – पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि भारतवर्ष राग, माधुर्य और प्रेम से युक्त देश है। यहाँ आने पर सर्वथा अनजान एवं अपरिचित व्यक्ति को भी यहाँ के लोगों से पूर्ण स्नेह और आश्रय प्राप्त होता है। यहाँ के लोग सेवाभाव से युक्त हैं तथा अपरिचितों को भी पूरा आदर, सम्मान तथा प्रेम देते हैं।

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प्रश्न 5.
प्रसाद शब्दों के प्रयोग से भावाभिव्यक्ति को मार्मिक बनाने में कैसे कुशल हैं? कविता से उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए।
उत्तर :
प्रसाद शब्दों के प्रयोग से भावाभिव्यक्ति को मार्मिक बनाने में बहुत कुशल हैं। ‘कार्नेलिया का गीत’ कविता में कवि के इस रूप के सर्वत्र दर्शन होते हैं। कवि ने भारतवर्ष को ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ कहकर भारतवर्ष को प्रेम से परिपूर्ण देश बताया है। ‘अनजान क्षितिज’ को सहारा मिलने के माध्यम से कवि यह कह रहा है कि इस देश में अपरिचितों को भी आश्रय प्राप्त हो जाता है। यहाँ के लोगों के मन में जो सबके प्रति करुणा का भाव है उसे कवि ने ‘बरसाती आँखों के बादल’ कहकर व्यक्त किया है। इसी प्रकार से प्रभातकालीन सौंदर्य की लालिमा कवि इन शब्दों के द्वारा व्यक्त करता है ‘हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे।’ इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रसाद जी अपने शब्द चयन से भावाभिव्यक्ति को मार्मिक बनाने में कुशल हैं।

प्रश्न 6.
कार्नेलिया के गीत कविता में वर्णित भारत के प्राकृतिक दृश्यों को अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर :
कवि के अनुसार भारत असीम प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। कवि ने इस कविता में प्रकृति का मानवीकरण किया है। उषा सुंदरी सूर्य रूपी कुंभ से धरती पर नवजीवन का संचार कर देती है। इस प्रकार प्राकृतिक दृष्टि से भारतवर्ष अत्यंत ही समृद्ध देश है। यहाँ का सूर्योदय सर्वत्र आनंद का संचार कर देता है। इसलिए कवि कहता है कि – ‘छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुमकुम सारा।’ यहाँ सदा शीतल वायु बहती रहती है। वर्षा ऋतु में बरसते हुए बादल यहाँ के लोगों के मन में निहित स्नेह भाव के प्रतीक हैं। इस देश की प्राकृतिक सुषमा से प्रभावित होकर सागर भी इसके चरणों को पखारता है। ‘लहरें टकराती अनंत की पाकर जहाँ किनारा।’ कवि ने रूपक, उपमा, अनुप्रास, मानवीकरण आदि अलंकारों के माध्यम से भारत की प्राकृतिक सुंदरता का आकर्षक वर्णन किया है।

योग्यता – विस्तार –

प्रश्न 1.
कविता में आए प्रकृति-चित्रों वाले अंश छाँटिए और अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
उत्तर के लिए ‘कार्नेलिया का गीत’ के प्रश्न संख्या 6 का उत्तर देखिए।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Question Answer देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

प्रश्न 2.
भोर के दृश्य को देखकर अपने अनुभव काव्यात्मक शैली में लिखिए।
उत्तर :
भोर हुई
चिड़िया चहचहाई
उनींदी-सी जागी मैं
अरुण-विभा से स्नात
कक्ष था सुवासित
पुष्प – परागों से
मैं भी उठकर चली
मंथर-मंथर गति से

प्रश्न 3.
जयशंकर की काव्य-रचना ‘आँसू’ पढ़िए।
उत्तर :
अपने स्कूल के पुस्तकालय से इस रचना को लेकर पढ़िए।

Class 12 Hindi Antra Chapter 1 Question Answer देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

प्रश्न 4.
जयशंकर की कविता ‘हमारा प्यारा भारतवर्ष’ तथा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘हिमालय के प्रति’ का कक्षा में वाचन कीजिए।
उत्तर :
‘हिमालय के प्रति’ (रामधारी सिंह ‘ दिनकर’)
मेरे नगपति मेरे विशाल।
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद,
रे तपी ! आज तप का न काल।
कितनी मणियाँ लुट गई ? मिटा
कितना मेरे वैभव अशेष!
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर
वीर हुआ प्यारा स्वदेश।
× × ×
किन द्रौपदियों के बाल खुले ?
किन-किन कलियों का अंत हुआ ?
कह हृदय खोल चित्तोर! यहाँ
कितने दिल ज्वाल वसंत हुआ ?
पूछे सिकताकण से हिमपति!
तेरा वह राजस्थान कहाँ ?
वन-वन स्वतंत्रता दीप लिए
फिरने वाला बलवान कहाँ ?
तू पूछ अवध से, राम कहाँ ?
वंदा ! बोलो, घनश्याम कहाँ ?
औ मगध ! कहाँ मेरे अशोक?
वह चंद्रगुप्त बलधान कहाँ ?

हमारा प्यारा भारतवर्ष (जयशंकर प्रसाद)

हिमालय के आँगन में उसे प्रथम किरणों का दे उपहार। उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक हार। जगे हम, लगे जगाने विश्व लोक में फैला फिर आलोक। व्योम, तम-पुंज तब नष्ट, अखिल संसृति हो विमल वाणी ने वीणा ली कमल कोमल कर में सप्रीत। सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम- संगीत। बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत। अरुण केतन लेकर निज हाथ वरुण पथ में हम बढ़े सुना है दधीचि का वह त्याग हमारी जातीयता विकास।

पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरे इतिहास। सिंधु- सा विस्तृत और अथाह एक निर्वासित का उत्साह। दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकार में वह राह ॥ धर्म का ले-लेकर जो नाम हुआ करती बलि, कर दी बंद हमीं ने दिया शांति संदेश, सुखी होते देकर आनंद। विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम। भिक्षु होकर रहते सम्राट दया दिखलाते घर-घर घूम। जातियों का उत्थान पतन, आँधियाँ, झड़ी प्रचंड समीर। खड़े देखा, फैला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर। चरित के पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न। हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न।

Class 12 Hindi NCERT Book Solutions Antra Chapter 1 देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

कथ्य पर आधारित प्रश्न-

प्रश्न 1.
‘देवसेना का गीत’ कविता का मूलभाव अथवा प्रतिपादय स्पष्ट कीजिए।
अथवा
देवसेना की वेदना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
देवसेना का गीत जयशंकर प्रसाद के स्कंदगुप्त नाटक से अवतरित है। देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है। हूणों के आक्रमण से बंधुवर्मा का सारा परिवार मारा गया था किंतु देवसेना बच गई थी। इस कविता में देवसेना अपने जीवन के वेदनामय क्षणों को याद कर रही है। जीवन संध्या की बेला में वह अपने यौवन के क्रियाकलापों को याद कर रही है।

वह अपने यौवन में नादानी तथा भ्रम में किए गए कार्यों के लिए पश्चात्ताप की ग्लानि में जल रही है और उसकी आँखों में निरंतर आँसू बह रहे हैं। वह अपने जीवन की पूँजी को बचा नहीं सकी। यही उसके जीवन की विडंबना है। प्रलय स्वयं देवसेना के जीवन रथ पर सवार है। देवसेना अपनी दुर्बलताओं और पराजय के बावजूद प्रलय से लोहा लेती रही। यह कविता वेदना के क्षणों में मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को भी अभिव्यक्त करती है।

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प्रश्न 2.
देवसेना किसकी बहन थी ? वह किससे प्रेम करती थी ?
उत्तर :
देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन थी। वह स्कंदगुप्त से प्रेम करती थी।

प्रश्न 3.
देवसेना ने किसका व्रत लिया था ?
उत्तर :
जब हूणों ने मालवा पर आक्रमण किया तो उस आक्रमण में राजा सहित उसके सभी परिवारवाले वीरगति को प्राप्त हो गए। केवल देवसेना ही बची। उस समय आर्यावर्त संकट में था। तब देवसेना ने अपने भाइयों के सपनों को साकार करने के लिए राष्ट्र-सेवा का व्रत लिया।

प्रश्न 4.
सेल्यूकस किससे प्रभावित हुआ और क्यों ?
उत्तर :
सेल्यूकस चंद्रगुप्त सम्राट से प्रभावित हुआ क्योंकि चंद्रगुप्त अत्यंत प्रतापी और बलशाली राजा था। वह अत्यंत शक्तिशाली था। वह श्रेष्ठ युद्धवीर और युद्ध में निपुण राजा था।

प्रश्न 5.
अरुण यह मधुमय देश हमारा’ गीत में किस देश की ओर संकेत है ?
उत्तर :
इस गीत में भारतवर्ष की ओर संकेत है। इसमें भारतवर्ष की गौरवगाथा तथा प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत चित्रण है।

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प्रश्न 6.
भारतवर्ष की अनूठी पहचान क्या है ?
उत्तर :
भारतवर्ष वह देश है जहाँ पक्षी भी अपने प्यारे घोंसले की कल्पना करके उसकी ओर उड़ते हैं। जहाँ पहुँचकर अनजान को भी सहारा मिलता है। जहाँ लहरों को भी किनारा मिलता है। भारतवर्ष की यही अनूठी पहचान है।

प्रश्न 7.
‘जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ पंक्ति के माध्यम से भारतवर्ष की किस अनूठी विशेषता का बोध होता है?
उत्तर :
इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने भारतवर्ष की विशेषता का बोध कराते हुए कहा है कि भारतवर्ष वह देश है जहाँ अनजान व्यक्ति को भी आदर एवं सम्मान मिलता है। भारतीय संस्कृति में ‘अतिथि देवोभव, अतिथि को देवता के समान पूजा जाता है। यहाँ विश्व के कोने से कोई भी आए उसे भारतीय संस्कृति सादर ग्रहण कर उसका आतिथ्य सत्कार करती है।

प्रश्न 8.
भारतीयों की आँखों में करुणा का जल भरा रहता है। क्यों ?
उत्तर :
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ अर्थात संपूर्ण विश्व एक परिवार के समान है। यह भारतीय संस्कृति की अनूठी विशेषता है। विश्व के अन्य लोगों की अपेक्षा भारतीय अधिक भावुक, संवेदनशील, सहृदयी होते हैं। वे अपने हृदय में दूसरों के प्रति गहन संवेदनाएँ एवं भावनाएँ रखते हैं। दूसरों के दुखों में भागीदार बनकर आंतरिक सहानुभूति व्यक्त करते हैं। दूसरों की पीड़ा, वेदना को देखकर भारतीय भावुक होकर रोने लगते हैं। उनकी आँखों में करुणा के भाव निहित हैं इसलिए भारतीयों की आँखों में करुणा का जल भरा रहता है।

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प्रश्न 9.
‘हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती दुलकाती सुख मेरे’ पंक्ति का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति में प्रसाद जी उषा का मानवीकरण करते हुए कह रहे हैं कि उषा रूप सुंदरी स्वर्ण-कुंभ से जनजीवन पर सुख, सौंदर्य और उत्साह बरसाने लगती है। तत्सम-प्रधान शब्दावली से भाषा का प्रयोग हुआ है। लाक्षणिकता का समवेश है। मानवीकरण, अनुप्रास, पदमैत्री अंलकारों का प्रयोग हुआ है। शृंगारिकता का समावेश है। हेम कुंभ में रूपक अलंकार की छटा है।

काव्य-सौंदर्य पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न 1.
देवसेना का परिचय दीजिए।
उत्तर :
देवसेना जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक ‘स्कंदगुप्त’ की प्रमुख पात्र है। वह मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है, जिसे हूणों ने मार दिया था। देवसेना भाई के स्वप्नों को पूरा करने के लिए राष्ट्र-सेवा का व्रत ले लेती है। वह स्कंदगुप्त से प्रेम भी करती है परंतु उससे विवाह नहीं करती। वह अपनी साधना का फल अपने प्रियतम के चरणों में समर्पित कर जीवन के भावी सुखों, आशाओं, आकांक्षाओं आदि से विदा लेकर विरहासंतप्त होकर ही सबसे विदा लेती है। वह वीरता, धीरता, त्याग, संयम आदि गुणों से युक्त है। देश-सेवा के लिए उसे भिक्षावृत्ति अपनाने में भी संकोच नहीं है।

प्रश्न 2.
कवि ने मधुमय देश किसे कहा है और क्यों ?
उत्तर :
कविवर प्रसाद ने भारत-भूमि को ‘मधुमय देश’ कहा है। वास्तव में यह देश मधुमय है क्योंकि यह राग, प्रेम एवं माधुर्य से परिपूर्ण है। भारत वह देश है जहाँ पहुँचकर अनजान क्षितिज अर्थात सर्वथा अज्ञात एवं अपरिचित व्यक्ति को भी आश्रय मिलता है। यह देश वह स्थान है, जहाँ सरल एवं लालिमामयी आभा पर सुंदर तरु शिखाएँ नाचती हुई दिखाई पड़ती हैं। अपने रंग-बिरंगे पंखों को पसार कर पक्षी भी इस देश को प्यारा नीड़ समझकर इसी ओर मुख करके उड़ते हैं। यहाँ के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की तरह करुणा का जल भरा रहता है।

यहाँ उषा देवी प्रातः काल सूर्य रूपी स्वर्णिम घट के सागर में से भरकर निकाल कर उड़ेलती है तो चारों ओर सुख एवं प्रकाश का प्रसार करती है। तात्पर्य यह है कि भारत वह देश है जहाँ प्रकृति का असीम सौंदर्य फैला हुआ है तथा यहाँ के रहने वाले लोगों की आँखों में सदैव करुणा जल भरा रहता है। इस देश में हर समय प्रकृति देवी का निखरा हुआ सौंदर्य दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः यहां के निवासियों में करुणा एवं प्रेम की सांस्कृतिक भावनाएँ अपने उत्कृष्ट रूप में विद्यमान हैं।

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प्रश्न 3.
‘कार्नेलिया का गीत’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रस्तुत कविता जयशंकर प्रसाद के सुप्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से अवतरित है। यह कविता देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावनाओं से ओत- प्रोत है। यूनान के सम्राट सिकंदर महान के उत्तराधिकारी सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया भारत-भूमि के सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो जाती है तथा उसके मुख से बरबस यह गीत निकल पड़ता है। यह देश (भारत) सचमुच मधुमय है। यह भारत-भूमि आश्रयदायिनी है।

इसमें क्षितिज को भी मानो ठहरने के लिए एक आधार मिल जाता है। यह देश रंगीन कल्पनाओं से भरपूर है। पीली-पीली केसर की पंखुड़ियों के समान पक्षी वृक्ष की सुंदर शाखाओं पर नृत्य करते रहते हैं। समस्त पक्षी इंद्रधनुषी रंग-बिरंगे पंख पसारे चहचहाते हुए शीतल-मंद-सुगंध समीर के सहारे उड़ते हुए इस देश को अपना प्यारा ‘रैन बसेरा’ जानकर इसी ओर चले आते हैं।

प्रस्तुत कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य एवं उसके सांस्कृतिक पक्ष का बड़ा सुंदर एवं स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस देश पर प्रकृति देवी की सदैव असीम कृपा रहती है। प्रातःकाल सूर्योदय के समय ऐसा लगता है कि मानो उषा देवी से अपने घट को भरकर उसे भूतल पर उड़ेलकर समस्त भूमंडल को प्रकाश के जल से आप्लावित कर देती है।

यहाँ के निवासी अपने प्रेम और करुणा की परंपरागत सांस्कृतिक भावनाओं को भी क्रियात्मक रूप देने की यथाशक्ति चेष्टा करते हैं। उनके नेत्रों में दूसरों के लिए करुणा का जल छलकता रहता है। कवि ने भारतीय जीवन के इस पहलू को निम्नलिखित पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत किया है –

बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।’

संक्षेप में कहा जा सकता है कि देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत इस गीत में हमारे देश के प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं भावनात्मक सौंदर्य का मार्मिक अंकन हुआ है।

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प्रश्न 4.
जयशंकर प्रसाद की भाषा-शैली पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
प्रसाद जी की भाषा – शैली परिष्कृत, स्वाभाविक, तत्सम शब्दावली प्रधान एवं सरल है। छोटे-छोटे पदों में गंभीर भाव भर देना और उनमें संगीत लय का विधान करना उनकी शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। देश-प्रेम की रचनाओं में ओज गुण प्रधान शब्दावली, शृंगार रस प्रधान रचनाओं में माधुर्य-गुण से युक्त शब्दावली तथा सामान्यतः प्रसाद गुणयुक्त शब्दावली का प्रयोग किया गया है। शब्द – चित्रों की सुंदर योजना प्रसाद जी की रचनाओं में रहती है।

रसवादी होने के कारण उनकी रचनाओं में सभी रसों का पूर्ण परिपाक देखा जा सकता है। प्रसाद जी की रचनाओं में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रामाणिक रूप उनकी कविता में मिलता है। उनकी काव्य-भाषा कहीं पर सरल तथा कहीं पर क्लिष्ट, तत्सम शब्दावली प्रधान है। स्वाभाविकता एवं प्रवाह उनकी भाषा की विशेषता है। भाषा भावानुकूल है इसलिए तत्सम शब्द भी स्वाभाविक लगते हैं।

उनकी भाषा में गूढ़ वाक्य प्राय: सूत्रों के समान प्रतीत होते हैं। मुहावरे उनकी रचनाओं में बहुत कम हैं। प्रसाद जी की रचनाओं में एक अद्भुत, उन्माद, तल्लीनता एवं मस्ती है। प्रसाद जी निश्चय ही आधुनिक हिंदी कविता के श्रेष्ठ कवि हैं।

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