CBSE Class 12 Hindi Elective रचना प्रिंट माध्यम, संपादकीय, रिपोर्ट, आलेख पर आधारित अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

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CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana प्रिंट माध्यम, संपादकीय, रिपोर्ट, आलेख पर आधारित अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए –

प्रश्न 1.
मुद्रण माध्यम के अंतर्गत कौन-कौन से माध्यम आते हैं ?
उत्तर :
मुद्रण माध्यम के अंतर्गत समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें आदि आते हैं।

प्रश्न 2.
फ्लैश या ब्रेकिंग न्यूज़ का क्या आशय है ?
उत्तर :
जब कोई विशेष समाचार सबसे पहले दर्शकों तक पहुँचाया जाता है तो उसे फ्लैश अथवा ब्रेकिंग न्यूज़ कहते हैं। प्रश्न 3. ड्राई एंकर क्या है ?
उत्तर :
ड्राई एंकर वह होता है जो समाचार के दृश्य नज़र नहीं आने तक दर्शकों को रिपोर्टर से मिली जानकारी के आधार पर समाचार से संबंधित सूचना देता है।

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प्रश्न 4.
फोन-इन से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
एंकर का घटनास्थल पर उपस्थित रिपोर्टर से फ़ोन के माध्यम से घटित घटनाओं की जानकारी दर्शकों तक पहुँचाना फ़ोन-इन कहलाता है।

प्रश्न 5.
लाइव से क्या आशय है ?
उत्तर :
किसी समाचार का घटनास्थल से दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण लाइव कहलाता है।

प्रश्न 6.
जनसंचार के प्रमुख माध्यम कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
जनसंचार के प्रमुख माध्यम समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, रेडियो, दूरदर्शन तथा इंटरनेट हैं।

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प्रश्न 7.
इंटरनेट पर समाचार से संबंधित क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं ?
उत्तर :
इंटरनेट पर समाचार पढ़ने, सुनने और देखने की तीनों सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

प्रश्न 8.
मुद्रित माध्यमों की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर :
मुद्रित माध्यमों को सुरक्षित रख सकते हैं। इन्हें जब चाहे और जैसे चाहे पढ़ा जा सकता है। इनसे लिखित भाषा का विस्तार होता है। इसमें गूढ़ और गंभीर विषयों पर लिखा जा सकता है।

प्रश्न 9.
रेडियो कैसा जनसंचार माध्यम है ? इसमें किसका मेल होता है ?
उत्तर :
रेडियो श्रव्य माध्यम है। इसमें ध्वनि, स्वर और शब्दों का मेल होता है।

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प्रश्न 10.
रेडियो समाचार – लेखन के लिए आवश्यक बिंदु क्या हैं?
उत्तर :
रेडियो समाचार की समाचार कॉपी साफ़-सुथरी और टंकित होनी चाहिए।

प्रश्न 11.
दूरदर्शन जनसंचार का कैसा माध्यम है ?
उत्तर :
दूरदर्शन जनसंचार माध्यमों में देखने और सुनने का माध्यम है।

प्रश्न 12.
रेडियो और दूरदर्शन समाचार की भाषा-शैली कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर :
भाषा अत्यंत सरल होनी चाहिए। वाक्य छोटे, सीधे और स्पष्ट हों। भाषा प्रवाहमयी तथा भ्रामक शब्दों से रहित हो। एक वाक्य में एक बात कही जाए। मुहावरों, सामाजिक भाषा, अप्रचलित शब्दों, आलंकारिक शब्दावली आदि प्रयोगों से बचना चाहिए।

प्रश्न 13.
इंटरनेट पत्रकारिता को अन्य किन नामों से जाना जाता है ?
उत्तर :
इंटरनेट पत्रकारिता को ऑनलाइन पत्रकारिता, साइबर पत्रकारिता तथा वेब पत्रकारिता के नाम से जाना जाता है।

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प्रश्न 14.
इंटरनेट पत्रकारिता क्या है ?
उत्तर :
इंटरनेट पर समाचार-पत्रों को प्रकाशित करना तथा समाचारों का आदान-प्रदान करना इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है।

प्रश्न 15.
इंटरनेट पत्रकारिता के कितने दौर हुए हैं ?
उत्तर :
इंटरनेट पत्रकारिता के तीन दौर हुए हैं। पहला दौर 1982 से 1992 तक, दूसरा दौर 1993 से 2001 तक और तीसरा और 2002 से शुरू हुआ है।

प्रश्न 16.
भारत में इंटरनेट का आरंभ कब हुआ था ?
उत्तर :
भारत में इंटरनेट का आरंभ सन 1993 में हुआ था।

प्रश्न 17.
वेबसाइट पर विशुद्ध इंटरनेट पत्रकारिता आरंभ करने का श्रेय भारत में किसे दिया जाता है ?
उत्तर :
भारत में इंटरनेट पर विशुद्ध पत्रकारिता आरंभ करने का श्रेय ‘तहलका डॉट काम’ को दिया जाता है।

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प्रश्न 18.
इंटरनेट पत्रकारिता आजकल बहुत लोकप्रिय क्यों है ?
उत्तर :
इंटरनेट पत्रकारिता से न केवल समाचारों का संप्रेषण, पुष्टि, सत्यापन होता है बल्कि समाचारों के बैकग्राउंडर तैयार करने में तत्काल सहायता मिलती है। इसलिए यह आजकल बहुत लोकप्रिय है।

प्रश्न 19.
पत्रकारीय लेखन में किस बात का सबसे अधिक ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
पत्रकारीय लेखन आम लोगों को ध्यान में रखकर सीधी-सादी आम बोलचाल की भाषा में होना चाहिए।

प्रश्न 20.
उलटा पिरामिड शैली क्या है?
उत्तर :
इसमें सबसे पहले महत्वपूर्ण तथ्य तथा जानकारियाँ दी जाती हैं तथा बाद में कम महत्वपूर्ण बातें देकर समाप्त कर दिया जाता है। इसकी सूरत उलटे पिरामिड जैसी होने के कारण इसे उलटा पिरामिड-शैली कहते हैं।

प्रश्न 21.
पूर्णकालिक पत्रकार किसे कहते हैं?
उत्तर :
पूर्णकालिक पत्रकार किसी समाचार-संगठन में काम करने वाला नियमित वेतन भोगी कर्मचारी होता है।

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प्रश्न 22.
अंशकालिक पत्रकार कौन होता है?
उत्तर :
अंशकालिक पत्रकार वह होता है जो किसी समाचार-संगठन के लिए एक निश्चित मानदेय के आधार पर काम करता है।

प्रश्न 23.
फ्रीलांसर पत्रकार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
फ्रीलांसर पत्रकार किसी समाचार-पत्र से संबंधित नहीं होता। वह समाचार-पत्रों में लेख भुगतान के आधार पर लिखता है।

प्रश्न 24.
समाचार-लेखन के कितने ककार हैं? उनके नाम लिखिए?
उत्तर :
समाचार-लेखन के छह ककार हैं। ये हैं-क्या, कौन, कब, कहाँ, कैसे और क्यों।

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प्रश्न 25.
विचारपरक लेखन में क्या-क्या आता है ?
उत्तर :
विचारपरक लेखन में लेख, टिप्पणियाँ, संपादकीय तथा स्तंभ लेखन आते हैं।

प्रश्न 26.
उलटा पिरामिड में समाचार का ढाँचा कैसा होता है ?
उत्तर :
इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य अथवा सूचना को सबसे पहले लिखा जाता है और इसके बाद घटते हुए महत्वक्रम में लिखा जाता है।

प्रश्न 27.
‘क्लाइमेक्स’ का क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
समाचार के अंतर्गत किसी घटना का नवीनतम और महत्वपूर्ण पक्ष क्लाइमेक्स कहलाता है।

प्रश्न 28.
फ़ीचर किसे कहते हैं?
उत्तर :
किसी सुव्यवस्थित, सृजनात्मक और आत्मनिष्ठ लेखन को फ़ीचर कहते हैं, जिसके माध्यम से सूचनाओं के साथ-साथ मनोरंजन पर भी ध्यान दिया जाता है।

प्रश्न 29
विशेष रिपोर्ट क्या होती है?
उत्तर :
किसी घटना, समस्या या मुद्दे की गहन छानबीन और विश्लेषण को विशेष रिपोर्ट कहते हैं।

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प्रश्न 30.
संपादकीय क्या है ?
उत्तर :
वह लेख जिसमें किसी मुद्दे के प्रति समाचार पत्र की अपनी राय प्रकट होती है, संपादकीय कहलाता है।

प्रश्न 31.
विशेष लेखन क्या है ?
उत्तर :
किसी विशेष विषय पर सामान्य लेखन से डटकर लिखा गया लेख विशेष लेखन कहलाता है।

प्रश्न 32.
बीट रिपोर्टिंग क्या होती है ?
उत्तर :
जो संवाददाता केवल अपने क्षेत्र विशेष से संबंधित रिपोर्टों को भेजता है, वह बीट रिपोर्टिंग कहलाती है।

प्रश्न 33.
व्यापार- कारोबार की रिपोर्टिंग की भाषा कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर :
व्यापार – कारोबार से संबंधित रिपोर्टिंग में व्यापार जगत में प्रचलित शब्दावली का प्रयोग होना चाहिए।

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प्रश्न 34.
समाचार-पत्रों में विशेष लेखन के क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
समाचार-पत्रों में विशेष लेखन के क्षेत्र व्यापार जगत, खेल, विज्ञान, कृषि, मनोरंजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध, कानून आदि हैं।

प्रश्न 35.
समाचार-पत्रों के लिए सूचनाएँ प्राप्त करने के स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
समाचार-पत्रों के लिए सूचनाएँ विभिन्न मंत्रालयों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों, विज्ञप्तियों, साक्षात्कारों, सर्वेक्षण, जाँच समितियों, संबंधित विभागों, इंटरनेट, विशिष्ट व्यक्तियों, संस्थाओं आदि से प्राप्त की जाती हैं।

प्रश्न 36.
भारत में विज्ञान के क्षेत्र में कौन-सी संस्थाएँ कार्य कर रही हैं ?
उत्तर :
भारत में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भाभा परमाणु संस्थान, राष्ट्रीय भौतिकी शोध संस्थान आदि संस्थाएँ विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रही हैं।

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प्रश्न 37.
पर्यावरण से संबंधित पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :
पर्यावरण एबस्ट्रेक्ट, डाउन टू अर्थ, नेशनल ज्योग्रॉफ़ी।

प्रश्न 38.
खोजी पत्रकारिता से क्या आशय है ?
उत्तर :
खोजी पत्रकारिता में पत्रकार मौलिक शोध और छानबीन के द्वारा ऐसी सूचनाएँ तथा तथ्य उजागर करता है जो सार्वजनिक रूप से पहले उपलब्ध नहीं थे।

प्रश्न 39.
भारत में पहला छापाखाना कहाँ और कब खुला था ?
उत्तर :
भारत में पहला छापाखाना गोवा में सन 1556 ई० में खुला था।

प्रश्न 40.
पत्रकारीय लेखन में पत्रकार को किन दो बातों से बचना चाहिए?
उत्तर :
पत्रकारीय लेखन में पत्रकार को कभी भी लंबे-लंबे वाक्य नहीं लिखने चाहिए। उसे किसी भी अवस्था में अनावश्यक विशेषणों और उपमाओं का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 41.
मुद्रण का प्रारंभ कहाँ से माना जाता है ?
उत्तर :
मुद्रण का प्रारंभ चीन से माना जाता है।

प्रश्न 42
वर्तमान छापेखाने के आविष्कार का श्रेय किसे है?
उत्तर :
वर्तमान छापेखाने का श्रेय जर्मनी के गुटेनबर्ग को है।

प्रश्न 43.
जनसंचार का मुद्रित माध्यम किनके लिए किसी काम का नहीं है ?
उत्तर :
निरक्षरों के लिए जनसंचार का मुद्रित माध्यम किसी काम का नहीं है।

प्रश्न 44.
साप्ताहिक पत्रिका सप्ताह में कितनी बार प्रकाशित होती है ?
उत्तर :
साप्ताहिक पत्रिका सप्ताह में एक बार प्रकाशित होती है।

प्रश्न 45.
रेडियो में क्या सुविधा नहीं है ?
उत्तर :
रेडियो में अखबार की तरह पीछे लौटकर सुनने की सुविधा नहीं है।

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प्रश्न 46.
आजकल टेलीप्रिंटर पर एक सेकेंड में कितने शब्द भेजे जा सकते हैं ?
उत्तर :
आजकल टेलीप्रिंटर पर एक सेकेंड में 56 किलोबाइट अर्थात लगभग 70 हज़ार शब्द भेजे जा सकते हैं।

प्रश्न 47.
नई वेब भाषा को क्या कहते हैं ?
उत्तर :
नई वेब भाषा को ‘एच.टी. एम. एल. ‘, हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज कहते हैं।

प्रश्न 48.
भारत की प्रमुख वेबसाइटें कौन-सी हैं ?
उत्तर :
भारत की प्रमुख वेबसाइटें रीडिफ डॉटकॉम, इंडिया इन्फोलाइन, सीफ़ी, हिंदू तहलका डॉटकॉम आदि हैं।

प्रश्न 49.
हिंदी की सर्वश्रेष्ठ इंटरनेट पत्रकारिता की साइट कौन-सी है ?
उत्तर :
पत्रकारिता के लिहाज़ से हिंदी की सर्वश्रेष्ठ इंटरनेट साइट बी. बी. सी. है

प्रश्न 50.
इंटरनेट पर उपलब्ध हिंदी का वह कौन-सा समाचार-पत्र है जो प्रिंट रूप में नहीं है ?
उत्तर :
‘प्रभासाक्षी’ नामक समाचार-पत्र केवल इंटरनेट पर उपलब्ध है

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प्रश्न 51.
उलटा पिरामिड में समाचार का ढाँचा कैसा होता है ?
उत्तर :
उलटे पिरामिड ढाँचे में सबसे पहले इंट्रो या मुखड़ा, फिर बाडी और अंत में समापन होता है।

प्रश्न 52.
उलटा पिरामिड शैली का प्रयोग कब से शुरू हुआ था ?
उत्तर :
उलटा पिरामिड – शैली का प्रयोग उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरू हुआ था।

प्रश्न 53.
समाचार-पत्रों में छपने वाले फ़ीचरों की शब्द- संख्या कितनी होती है ?
उत्तर :
समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में छपने वाले फ़ीचरों की शब्द – संख्या 250 शब्दों से लेकर 2000 होती है।

प्रश्न 54.
एक अच्छे और रोचक फ़ीचर के साथ क्या होना आवश्यक है ?
उत्तर :
एक अच्छे और रोचक फ़ीचर के साथ फोटो, रेखांकन, ग्राफ़िक्स आदि का होना आवश्यक है।

प्रश्न 55.
समाचार-पत्र कैसा माध्यम है ?
उत्तर :
समाचार-पत्र केवल छपे हुए शब्दों का माध्यम है।

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प्रश्न 56.
जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम कौन-सा है ?
उत्तर :
मुद्रित माध्यम जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम है।

प्रश्न 57.
यूरोप में छापेखाने की महत्वपूर्ण भूमिका कब रही ?
उत्तर :
यूरोप में पुनर्जागरण के ‘रेनसां’ के आरंभ में छापेखाने की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी।

प्रश्न 58.
मुद्रित माध्यमों की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर :
मुद्रित माध्यमों की सबसे बड़ी विशेषता उसमें छपे हुए शब्दों के स्थायीपन की है। इन्हें जब जैसे चाहे पढ़ सकते हैं।

प्रश्न 59.
मुद्रित माध्यम के अंतर्गत समाचार-पत्र में क्या कमियाँ हैं ?
उत्तर :
इसे निरक्षर नहीं पढ़ सकते। इसमें तुरंत घटी हुई घटनाएँ प्रस्तुत नहीं की जा सकतीं।

प्रश्न 60.
रेडियो प्रसारण की क्या कमियाँ हैं ?
उत्तर :
रेडियो पर प्रसारण के समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कार्यक्रम आरंभ से सुनना पड़ता है। कार्यक्रम के दौरान कहीं जा नहीं सकते। उसी कार्यक्रम को फिर से नहीं सुन सकते।

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प्रश्न 61.
समाचार-पत्रों की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर :
समाचार-पत्र जनता को समाचार देकर उन्हें जागरूक, शिक्षित और सचेत करते हैं। इनसे पाठकों का मनोरंजन भी होता है। ये लोकतंत्र के पहरेदार माने जाते हैं। ये जनमत जगाने का कार्य भी करते हैं।

प्रश्न 62.
पत्रकारीय लेखन का संबंध किनसे होता है ?
उत्तर :
पत्रकारीय लेखन का संबंध देश-विदेश में घटित विभिन्न घटनाओं, समस्याओं और मुद्दों से होता है।

प्रश्न 63.
संपादक के नाम पत्र कौन लिखता है ?
उत्तर :
संपादक के नाम पत्र समाचार-पत्र को पढ़ने वाले पाठक लिखते हैं। वे इन पत्रों में विभिन्न मुद्दों और समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 64.
समाचार-पत्र में साक्षात्कार का क्या महत्व है ?
उत्तर :
समाचार-पत्र में साक्षात्कार का बहुत महत्व है। साक्षात्कार के माध्यम से ही पत्रकार अपने समाचार-पत्र के लिए समाचार, फ़ीचर, लेख, विशेष रिपोर्ट आदि तैयार कर सकता है।

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प्रश्न 65.
स्तंभ-लेखन क्या है ?
उत्तर :
स्तंभ लेखन विचारपरक लेखन होता है। स्तंभकार समसामयिक विषयों पर नियमित रूप से अपने समाचार-पत्र के लिए लिखते हैं।

प्रश्न 66.
बीट किसे कहते हैं ?
उत्तर :
समाचार-पत्र में राजनीति, आर्थिक, खेल, अपराध, फ़िल्म, कृषि आदि से संबंधित समाचार होते हैं। जो पत्रकार जिस क्षेत्र से संबंधित समाचार लिखता है, वह उसकी बीट होती है।

प्रश्न 67.
‘डेस्क’ किसे कहते हैं ?
उत्तर :
समाचार-पत्रों में किसी विशेष लेखन के लिए कार्य करने वाले पत्रकारों के समूह के निश्चित समय को डेस्क कहते हैं, जैसे खेल डेस्क।

प्रश्न 68.
व्यापार से जुड़ी खबरों की शब्दावली कैसी होती है ?
उत्तर :
व्यापार से जुड़ी खबरों में व्यापार जगत से संबंधित तेजड़िए, घाटा, गिरावट, धड़ाम आदि शब्द होते हैं।

प्रश्न 69.
कारोबारी जगत की खबरें किस शैली में लिखी जाती हैं ?
उत्तर :
कारोबारी जगत की खबरें उलटा पिरामिड शैली में लिखी जाती हैं।

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प्रश्न 70.
भारत के लोकप्रिय हिंदी दैनिक समाचार-पत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, दैनिक ट्रिब्यून, पंजाब केसरी, नई दुनिया, नवभारत टाइम्स आदि।

प्रश्न 71.
बीट से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
समाचार-पत्र या अन्य समाचार माध्यमों द्वारा अपने संवाददाता को किसी क्षेत्र या विषय यानी बीट की दैनिक रिपोर्टिंग की ज़िम्मेदारी दी जाती है। यह एक तरह के रिपोर्टर का कार्यक्षेत्र निश्चित करना है।

प्रश्न 72.
सीधा प्रसारण (लाइव) कैसा होता है ?
उत्तर :
रेडियो और टेलीविज़न में जब किसी घटना या कार्यक्रम को सीधा होते हुए दिखाया या सुनाया जाता है तो उस प्रसारण को सीधा प्रसारण (लाइव) कहते हैं। रेडियो में इसे आँखों देखा हाल भी कहते हैं जबकि टेलीविज़न के परदे पर सीधे प्रसारण के समय लाइव लिख दिया जाता है। इसका अर्थ यह है कि उस समय आप जो भी देख रहे हैं, वह बिना किसी संपादकीय काट-छाँट के सीधे आप तक पहुँच रहा है।

प्रश्न 73.
स्टिंग आपरेशन किसे कहते हैं ?
उत्तर :
जब किसी टेलीविजन चैनल का पत्रकार छुपे टेलीविज़न कैमरे के ज़रिए किसी ग़ैर-कानूनी, अवैध और असामाजिक गतिविधियों को फ़िल्माता है और फिर उसे अपने चैनल पर दिखाता है तो इसे स्टिंग ऑपरेशन कहते हैं। कई बार चैनल ऐसे आपरेशनों को गोपनीय कोड दे देते हैं। जैसे आपरेशन दुर्योधन या चक्रव्यूह। हाल के वर्षों में समाचार चैनलों पर सरकारी कार्यालयों आदि में भ्रष्टाचार के खुलासे के लिए स्टिंग आपरेशनों के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ी है।

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प्रश्न 74.
सूचनाओं के विभिन्न स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर :

  1. मंत्रालय के सूत्र
  2. प्रेस कॉफ्रेंस और विज्ञप्तियाँ
  3. साक्षात्कार
  4. सर्वे
  5. जाँच समितियों की रिपोर्ट्स
  6. क्षेत्र विशेष में सक्रिय संस्थाएँ और व्यक्ति
  7. संबंधित विभागों और संगठनों से जुड़े व्यक्ति
  8. इंटरनेट और दूसरे संचार के माध्यम
  9. स्थायी अध्ययन प्रक्रिया

प्रश्न 75.
विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रही भारत की पाँच संस्थाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
  2. मिनरल्स एंड मेटल्स कॉपरेरिशन (MMTC)
  3. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO)
  4. नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कॉपंरेशन (NRDC)
  5. केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (CEL)

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प्रश्न 76.
पर्यावरण पर छपने वाली पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. पर्यावरण एबस्ट्रेक्ट
  2. एन्वायरो न्यूज
  3. डाउन टू अर्थ
  4. जू प्रिंट
  5. सैकुचरी
  6. नेशनल ज्योग्रॉफ़ी

प्रश्न 77.
व्यावसायिक शिक्षा के दस विभिन्न संस्थानों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान
  2. भारतीय प्रबंधन संस्थान
  3. भारतीय विज्ञान संस्थान
  4. भारतीय सूचना प्रौद्योगिक एवं प्रबंधन संस्थान
  5. भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान
  6. राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान
  7. मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी
  8. राष्ट्रीय फ़ैशन टेक्नॉलॉजी संस्थान
  9. राष्ट्रीय डिफेंस अकादमी
  10. अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान

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प्रश्न 78.
अपडेटिंग से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
विभिन्न वेबसाइटों पर उपलब्ध सामग्री को समय-समय पर संशोधित और परिवर्धित किया जाता है। इसे ही अपडेटिंग कहते हैं।

प्रश्न 79.
ऑडियंस किसे कहते हैं?
उत्तर :
जनसंचार माध्यमों के साथ जुड़ा एक विशेष शब्द, जिसका प्रयोग जनसंचार माध्यमों के दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों के लिए सामूहिक रूप से होता है।

प्रश्न 80.
समाचार-पत्रों में ऑप – एड क्या होता है ?
उत्तर :
यह समाचार-पत्रों में संपादकीय पृष्ठ के सामने प्रकाशित होने वाला वह पन्ना है जिसमें विश्लेषण, फ़ीचर, स्तंभ, साक्षात्कार, विचारपूर्ण टिप्पणियाँ आदि प्रकाशित की जाती हैं। हिंदी के बहुत कम समाचार-पत्रों में ऑप – एड पृष्ठ प्रकाशित होता है, लेकिन अंग्रेज़ी के हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों में ऑप – एड पृष्ठ देखा जा सकता है।

प्रश्न 81.
डेडलाइन किसे कहते हैं ?
उत्तर :
किसी समाचार को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए उसके समाचार माध्यमों तक पहुँचने की आखिरी समय सीमा को डेडलाइन कहते हैं। अगर कोई समाचार डेडलाइन निकलने के बाद मिलता है, तो आमतौर पर उसके प्रकाशित या प्रसारित होने की संभावना कम हो जाती है।

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प्रश्न 82.
न्यूज़पेग क्या होता है ?
उत्तर :
न्यूज़पेग का अर्थ है ‘किसी मुद्दे पर लिखे जा रहे लेख या फ़ीचर में उस ताज़ा घटना का उल्लेख, जिसके कारण वह मुद्दा चर्चा में आ गया है’। जैसे अगर आप माध्यमिक बोर्ड की परीक्षाओं में सरकारी स्कूलों के बेहतर हो रहे प्रदर्शन पर एक रिपोर्ट लिख रहे हैं तो उसका न्यूज़पेग सीबीएसई का ताज़ा परीक्षा परिणाम होगा। इसी तरह शहर में महिलाओं के खिलाफ़ बढ़ रहे अपराध पर फ़ीचर का न्यूज़पेग सबसे ताज़ी वह घटना होगी जिसमें किसी महिला के खिलाफ़ अपराध हुआ हो।

प्रश्न 83.
‘पीत पत्रकारिता’ किसे कहते हैं ?
उत्तर :
इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल उन्नीसवीं सदी के उत्तरर्द्ध में अमेरिका में कुछ प्रमुख समाचार-पत्रों के बीच पाठकों को आकर्षित करने के लिए छिड़े संघर्ष के लिए किया गया था। उस समय के प्रमुख समाचारों ने पाठकों को लुभाने के लिए झूठी अफ़वाहों, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों, प्रेम-संबंधों, भंडाफोड़ और फ़िल्मी गपशप को समाचार की तरह प्रकाशित किया। उसमें सनसनी फैलाने का तत्व अहम था।

प्रश्न 84.
‘पेज – थ्री पत्रकारिता’ कैसी पत्रकारिता है ?
उत्तर :
पेज – थ्री पत्रकारिता का तात्पर्य ऐसी पत्रकारिता से है जिसमें फ़ैशन, अमीरों की पार्टियों, महफ़िलों और जाने-माने लोगों के निजी जीवन के बारे में बताया जाता है। ऐसे समाचार आमतौर पर समाचार-पत्रों के पृष्ठ तीन पर प्रकाशित होते रहे हैं, इसलिए इसे ‘पेज थ्री पत्रकारिता ‘ कहते हैं। हालाँकि अब यह ज़रूरी नहीं है कि यह पृष्ठ तीन पर ही प्रकाशित होती हो लेकिन इस पत्रकारिता के तहत अब भी ज़ोर उन्हीं विषयों पर होता है।

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प्रश्न 85.
फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन’ तकनीक क्या है ?
उत्तर :
यह रेडियो प्रसारण की एक विशेष तकनीक है जिसमें फ्रीक्वेंसी को मॉड्यूलेट किया जाता है। रेडियो का प्रसारण दो तकनीकों के ज़रिए होता है जिसमें एक तकनीक एमप्ली – यूड मॉड्यूलेशन (ए०एम०) है और दूसरा फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन (एफ०एम० )। एफ०एम० तकनीक अपेक्षाकृत नई है और इसकी प्रसारण की गुणवत्ता बहुत अच्छी मानी जाती है। लेकिन ए. एम. रेडियो की तुलना में एफ०एम० के प्रसारण का दायरा सीमित होता है।

कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न

निम्नलिखित पत्रकारीय लेखन पर आधारित प्रश्नों के उचित उत्तर वाले विकल्प चुनकर दीजिए –

1. हिंदी में नेट-पत्रकारिता की शुरुआत मानी जाती है –
(क) प्रभासाक्षी से
(ख) वेब दुनिया से
(ग) वेब पोर्टल से
(घ) भास्कर से
उत्तर :
(ख) वेब दुनिया से

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2. ब्रेकिंग न्यूज़ से आप क्या समझते हैं?
(क) संपादकों के लिए विशेष समाचार लिखना
(ख) अखबार-कर्मियों के लिए विशेष समाचार पढ़ाना
(ग) संवाददाताओं के लिए आम समाचार उपलब्ध कराना
(घ) दर्शकों के लिए विशेष समाचार उपलब्ध कराना
उत्तर :
(ख) दृश्य नजर न आने तक दर्शकों को रिपोर्टर के माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराना।

3. कौन-सा माध्यम जनसंचार का माध्यम नहीं है?
(क) समाचार पत्र
(ख) रेडियो
(ग) स्मार्ट बोर्ड
(घ) दूरदर्शन
उत्तर :
(ग) स्मार्ट-बोर्ड

4. रेडियो किस प्रकार का जनसंचार माध्यम है?
(क) श्रव्य माध्यम
(ख) दृश्य माध्यम
(ग) मूक माध्यम
(घ) अद्भुत माध्यम
उत्तर :
(क) श्रव्य माध्यम

5. मिशनरियों द्वारा किस उद्वेश्य से भारत में पहला छापाखाना खोला गया?
(क) धार्मिक पुस्तकें छपने के लिए
(ख) धर्म का प्रचार करने के लिए
(ग) धर्म प्रचार की पुस्तकें छापने के लिए
(घ) मिशनरी का काम करने के लिए
उत्तर :
(ग) धर्म प्रचार की पुस्तके छापने के लिए

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6. दूरदर्शन जनसंचार का कैसा माध्यम है?
(क) श्रव्य माध्यम
(ख) दृश्य माध्यम
(ग) दृश्य-श्रव्य माध्यम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) दृश्य-श्रव्य माध्यम

7. इंटरनेट पत्रकारिता को किस नाम से जाना जाता है?
(क) वेब पत्रकारिता
(ख) ऑनलाइन पत्रकारिता
(ग) साइबर पत्रकारिता
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं

8. भारत में इंटरनेट की शुरुआत कब हुई?
(क) सन 1990 में
(ख) सन 1993 में
(ग) सन 1992 में
(घ) सन 1994 में
उत्तर :
(ख) सन 1993 में

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9. पत्रकारीय लेखन में किस बात का ध्यान रखना आवश्यक होता है?
(क) सीधी-सादी आम बोलचाल की भाषा का
(ख) अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा का
(ग) मुहावरेदार भाषा का
(घ) लाक्षणिक भाषा का
उत्तर :
(क) सीधी-सादी आम बोलचाल की भाषा

10. अंशकालिक पत्रकार किसे कहते हैं?
(क) समाचार-संगठन का नियमित गैरवेतनभोगी
(ख) समाचार-संगठन का नियमित वेतनभोगी
(ग) समाचार-संगठन का अनियमित वेतनभोगी
(घ) समाचार-संगठन का अनियमित गैरवेतनभोगी
उत्तर :
(ग) समाचार-संगठन का अनियमित वेतनभोगी

11. फ्रीलांसर पत्रकार किसे कहते हैं?
(क) समाचार-संगठन का स्वतंत्र वेतनभोगी
(ख) समाचार-संगठन का नियमित वेतनभोगी
(ग) समाचार-संगठन का निश्चित मानदेय वेतनभोगी
(घ) समाचार-संगठन का अनियमित गैरवेतनभोगी
उत्तर :
(क) समाचार-संगठन का स्वतंत्र वेतनभोगी

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12. क्लाइमेक्स का क्या आशय है?
(क) घटना का नवीनतम एवं आवश्यक पक्ष
(ख) घटना का छ्छिपा पक्ष
(ग) समाचार-पत्र का दूसरा पृष्ठ
(घ) समाचार-पत्र का पहला पृष्ठ
उत्तर :
(क) घटना का नवीनतम एवं आवश्यक पक्ष

13. समाचार लेखन में कितने ककार हैं?
(क) दस
(ख) पॉँच
(ग) आठ
(घ) छह
उत्तर :
(घ) छा

14. एंकर रिपोर्टर से फ्रोन पर बात करके सूचनाएँ वर्शकों तक पहुँचाता है, उस प्रक्रिया को कहते हैं-
(क) फ़ोन इन
(ख) लाइव
(ग) वॉयस
(घ) बाइट
उत्तर :
(क) फ़ोन-इन

15. विचारपरक लेखन में क्या नहीं आता?
(क) संपादकीय
(ख) टिप्पणी
(ग) स्तंभ लेखन
(घ) विज्ञापन
उत्तर :
(घ) विज्ञापन

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16. संपादकीय किसे कहते हैं?
(क) मुद्दे से हटकर जनमानस की अपनी राय
(ख) मुद्दे के प्रति सामूहिक राय
(ग) मुद्दे के प्रति समाचार पत्र की अपनी राय
(घ) मुद्दे के प्रति स्वतंत्र विचारकों की एक राय
उत्तर :
(ग) मुद्दे के प्रति समाचार पत्र की अपनी राय

17. बीट रिपोर्टिग किसे कहते है?
(क) सभी क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट भेजना
(ख) बदल-बदलकर विशेष रिपोर्ट भेजना
(ग) किसी भी क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट भेजना
(घ) अपने क्षेत्र विशेष से रिपोर्ट भेजना
उत्तर :
(ग) किसी भी क्षेत्र से विशेष रिपोर्ट भेजना

18. भारत में पहला छापाखाना कब और कहाँ खुला था?
(क) हिमाचल, 1559 में
(ख) गोआ, 1556 में
(ग) सिक्किम, 1557 में
(घ) केरल, 1558 में
उत्तर :
(घ) केरल, 1558 में

19. आज्वावी से पूर्व कौन-कौन प्रमुख पत्रकार हुए हैं?
(क) महात्मा गंधी, लोकमान्य तिलक
(ख) मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी,
(ग) माखनलाल चतुर्वदी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं।
उत्तर :
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं

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20. इंटरनेट पर उपलब्ध कौन-सा हिंबी समाचार पत्र प्रिंट सूप में नही है?
(क) राजस्थान पत्रिका
(ख) नई दुनिया
(ग) प्रभासाक्षी
(घ) दैनिक भास्कर
उत्तर :
(ग) प्रभासाक्षी

21. कविता की दुनिया से जुड़ने के लिए यह आवश्यक है कि हम-
(क) इंटरनेट से जुड़ें
(ख) पत्रिकाओं से जुईें
(ग) शब्दों से जुड़ें
(घ) अपने परिवेश से जुड़ें
उत्तर :
(ग) शब्दों से जुड़ें

22. बच्यों की रचनात्मकता तब आकार लेती है जब उन्हें-
(क) कविता लिखवाएँ
(ख) कविता सुनाएँ
(ग) परिवेश से जोड़े
(घ) तुकबंदी कराएँ
उत्तर :
(घ) तुकबंदी कराएँ

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23. हिंदी का संपूर्ण पोर्टल कौन-सा है?
(क) नई दुनिया (इंदौर)
(ख) दैनिक भास्कर (इंदौर)
(ग) हिंदुस्तान (दिल्ली)
(घ) अमर उजाला (मेरठ)
उत्तर :
(क) नई दुनिया (इंदौर)

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24. पेज-श्री पत्रकारिता क्या है?
(क) फ़ैशन, अमीरों की पार्टियों, महफ़िलों और जाने-माने लोगों के निजी जीवन के बारे में बताया जाता है।
(ख) यह आमतौर पर समाचार-पत्रों के पृष्ठ तीन पर प्रकाशित होती है।
(ग) आजकल इसकी पृष्ठ संख्या कोई भी हो सकती है, परंतु इनके विषय वही हैं।
(घ) ये सभी विकल्प सही हैं।
उत्तर :
(क) फ़ैशन, अमीरों की पार्टियों, महफिलों और जाने-माने लोगों के निजी जीवन के बारे में बताया जाता है।

25. मुद्रण की शुरुआत कहॉं से हुई?
(क) रूस
(ख) भारत
(ग) चीन
(घ) अमेरिका
उत्तर :
(ग) चीन।

26. टीन्वी० में किसकी प्रमुखता होती है?
(क) दृश्य की
(ख) आवाज़ की
(ग) गुणवत्ता की
(घ) (क) और (ख) दोनों
उत्तर :
(घ) (क) और (ख) दोनों

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27. एंकर पैकेज से क्या आशय है?
(क) किसी भी खबर को संपूर्णता के साथ पेश करने का माध्यम
(ख) इसमें ग्राफिक के जरिए ज्रूूरी सूचनाएँ
(ग) शीघ्रता से पेश करने की युक्ति
(घ) संदिश्ध तरीके से समाचार पेश करने की योजना
उत्तर :
(क) किसी भी खबर को संपूर्णता के साथ पेश करने का माध्यम।

28. टी॰्वी० खखर की प्रस्तुति के कौन-से तरीके हैं?
(क) फ्लैै या ब्रेकिंग न्यूज्ज, ड्राइ एंकर
(ख) फ़ोन-इन, एंकर-विजुअल
(ग) एंकर बाइट, लाइव
(घ) ये सभी विकल्प
उत्तर :
(घ) खे सभी विकल्प

29. वेबसाइड पर विशुद्थ पत्रकारिता की शुरुआत किस वेबसाइट किसने की?
(क) तहलका डॉट कॉम ने
(ख) रीडिफ ने
(ग) रक्षा डॉट कॉम ने
(घ) जीमेल डॉट कॉम ने
उत्तर :
(क) तहलका डॉट कॉम ने

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30. उलटा पिरामिड शैली का प्रयोग कब हुआ?
(क) 17 वी सदी के अंत में
(ख) 16 वीं सदी के मध्य में
(ग) 19 वीं सदी के मध्य में
(घ) 20 वीं सदी के अंत में
उत्तर :
(ग) 19 वीं सदी के मध्य में

बोर्ड परीधाओं में पूछे गए प्रश्नोत्तर –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो वाक्यों में दीजिए –
(क) उलटा पिरामिड्ड-शैली से क्या तात्पर्य है?
(ख) भारत में प्रथम छापाखाना कय और कहों खुला था ?
(ग) विशेष लेखन क्या होता है?
(घ) इंटरनेट पत्रकारिता आजकल बहुत लोकप्रिय क्यों है?
(ङ) समाचार लेखन के छह ‘ककार’ कौन-कौन से हैं?
उत्तर
(क) इसमें सबसे पहले महत्वपूर्ण तथ्य तथा जानकारियाँ दी जाती हैं तथा बाद में कम महत्वपूर्ण बातें देकर इसे समाप्त कर दिया जाता है। इसकी सूरत उलटे पिरामिड जैसी होने के कारण इसे उलटा पिरामिड-शैली कहते हैं।
(ख) भारत में प्रथम छापाखाना गोवा में सन 1556 ई० में खुला था।
(ग) किसी विशेष विषय पर सामान्य लेखन से हटकर लिखा गया लेख विशेष लेखन होता है।
(घ) इंटरनेट पत्रकारिता से समाचारों का संप्रेषण, पुष्टि व सत्यापन होता है तथा समाचारों के बैक ग्राउंडर भी तैयार करने में सहायता मिलती है, इसलिए यह लोकप्रिय है।
(ङ) समाचार लेखन के ये छह ककार हैं-क्या, कौन, कब, कहाँ, क्यों और कैसे।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो वाक्यों में दीजिए :
(क) समाचार किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए।
(ख) स्तंभ-लेखन क्या होता है ? समझाइए।
(ग) वेबसाइट पर विशुद्ध पत्रकारिता शुरू करने का श्रेय किसे दिया जाता है?
(घ) उल्टा पिरामिड-शौली से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
(क) किसी विशिष्ट घटना की प्रमुखता से सूचना जो सामान्य जन की रुचि के अनुसार हो, उसे समाचार कहते हैं।
(ख) स्तंभ-लेखन विचारपरक लेखन होता है, जिसमें स्तंभाकार समसामयिक विष्यों पर समाचार-पत्र के लिए लिखते हैं।
(ग) वेबसाइट पर विशुद्ध पत्रकारिता शुरू करने का श्रेय ‘तहलका डॉटकॉम’ को दिया जाता है।
(घ) इस शैली में महत्वपूर्ण तथ्य अथवा सूचना को पहले लिखा जाता है और फिर घटते हुए महत्वक्रम में तथ्य लिखे जाते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(क) इंटरनेट पत्रकारिता आजकल वहहुत लोकप्रिय क्यों है?
(ख) भारत में पहला छापाखाना कब और किस उद्देश्य से खोला गया था ?
(ग) मुद्रित माध्यम से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
(क) इंटरनेट पत्रकारिता से न केवल समाचारों का संप्रेषण, पुष्टि व सत्यापन होता है बल्कि समाचारों के बैकग्राउंडर तैयार करने में तत्काल सहायता भी मिलती है। इसलिए यह आजकल बहुत लोकप्रिय है।
(ख) भारत में पहला छापाखाना गोवा में सन 1556 ई० में विशेष धार्मिक साहित्य को छापने के लिए खोला गया था।
(ग) मुद्रित माध्यम छपी हुई सामग्री को कहते हैं। समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ आदि मुद्रित माध्यम हैं।

प्रश्न 4.
(क) स्टिंग ऑपरेशन क्या है?
(ख) समाचार लेखन की पिरामिड-शैली को संक्षेप में समझाइए।
(ग) टी०वी० की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
(क) किसी तथ्य का पता लगाने के लिए गुप्त कैमरे के द्वारा किसी संस्थान अथवा व्यक्ति से बातचीत करते हुए उसे रिकॉर्ड कर लेना स्टिंग ओपरेशन कहलाता है।
(ख) इस शैली में महत्वपूर्ण तथ्य तथा सूचनाएँ पहले लिखी जाती हैं और फिर घटते हुए क्रम में अन्य सूचनाएँ लिखते हैं।
(ग) टी० वी० भाषा अत्यंत सरल तथा प्रवाहमय होनी चाहिए।

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प्रश्न 5.
(क) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की लोकप्रियता के दो कारण लिखिए।
(ख) ‘एंकर बाइट’ से आप क्या समझते हैं?
(ग) ‘ब्रेकिंग-न्यूज्ञ’ किसे कहा जाता है?
(घ) ‘पीत-पश्रकारिता’ क्या है?
(ङ) समाचार-लेखन के ककारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(क) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की लोकप्रियता के कारण हैं-देखने-सुनने की सुविधा, खबर सीधी दर्शक तक पहुँचती है तथा खबर की पुष्टि दिखाई जाती है।
(ख) दूरदर्शन में किसी समाचार को पुष्ट करने के लिए उससे संबंधित दृश्य, व्यक्तियों और उनके कथनों अदि को दिखा-सुनाकर प्रमाणित करना ‘एंकर बाइट’ कहलाता है।
(ग) अन्य कार्यक्रम रोककर किसी प्रमुख समाचार को दर्शकों तक पहुँचाना क्रेकिंग न्यूज़ कहलाता है।
(घ) सनसनीखेज समाचार पीत-पत्रकारिता कहलाते हैं, जिसके अंतर्गत किसी को बैैमेल भी किया जा सकता है।
(ङ) समाचार-लेखन के छह ककार हैं-क्या, कौन, कब, कहाँ, कैसे और क्यों।

प्रश्न 6.
(क) संपादकीय किसे का जाता है?
(ख) पीत पत्रकारिता का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) स्टिंग ऑपरेशन क्या है ? यह क्यों किया जाता है?
(घ) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की लोकप्रियता के दो कारण लिखिए।
(ङ) आपके विचार से संचार-माध्यमों में कैसी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए?
उत्तर :
(क) वह लेख जिसमें किसी मुद्दे के प्रति समाचार-पत्र की अपनी राय प्रकट होती है, उसे संपादकीय कहते हैं।
(ख) सनसनीखेज पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहते हैं।
(ग) किसी राजनीतिक, व्यापारिक, सरकारी, गैर-सरकारी कार्य पद्धतियों, रिश्वतखोरी, प्रष्टाचार आदि को गुप्त रूप से प्रमाण सहित जानकारी को प्राप्त करने की प्रक्रिया को स्टिग ऑपरेशन कहते हैं। यह सच्चाई को सामने लाने के लिए किए जाते हैं।
(घ) (i) इसमें घटनाक्रम को सुनने के साथ-साथ देख भी सकते हैं।
(ii) इसके द्वारा घटनाक्रम को साफ़ स्पष्ट समझ सकते हैं।
(ङ) हमारे विचार से संचार माध्यमों में सहज सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-
(क) समाचार किसे कहा जाता हैं?
(ख) समाचार प्रस्तुति की प्रमुख शैली को पिरामिड शैली क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
(क) कोई भी ऐसी घटना, विचार अथवा समस्या की रिपोर्ट जिसमें अनेक लोगों की रुचि हो तथा लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता हो, उसे समाचार कहते हैं।
(ख) इसे पिरामिड शैली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें पहले इंट्रो उसके बाद बाडी और अंत में समापन सूचना होती है, जिसकी आकृति पिरामिड के आकार की होती है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर संक्षेप में लिखिए-
(क) संचार किसे कहते हैं?
(ख) चौथा खंभा किसे कहा जाता है? क्यों?
(ग) समाचार के किन्हीं दो तत्यों का उल्लेख कीजिए।
(घ) पत्रकार की बैसासिखियों से आप क्या समझते हैं?
(ङ) खोजपरक पत्रकारिता से आप क्या समझते है ?
उत्तर :
(क) एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचना भेजने का माध्यम संचार कहलाता है।
(ख) चौथा खंभा पत्रकारिता को कहा जाता है क्योंकि इसका न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधानपालिका के पश्चात चौथा स्थान है।
(ग) (i) फोन इन-फ़ोन के माध्यम से सूचना लेना।
(ii) लाइव-सीधा प्रसारण।
(घ) पत्रकार के गुणों को पत्रकार की वैशाखियाँ कहते हैं।
(ङ) ऐसी पत्रकारिता जिससे पत्रकार गहन छानबीन कर सूचनाएँ पृथक करता है उसे खोजी पत्रकारिता कहते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए –
(क) मुत्रित माध्यम की किन्ठी दो खुखियों का उल्लेख कीजिए।
(ख) फ्रीलांसर किसे कहा जाता है ?
(ग) संपादन के सिद्धांत के सूप में ‘निष्पक्ष्ता’ के सिद्धांत से क्या तात्पर्य है?
(घ) भारत में दूरदर्शन के किन्हीं दो उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
(ङ) खोजी रिपोर्ट की आवश्यकता कब पड़ती है ?
उत्तर :
(क) (i) मुद्रित माध्यम एक स्थायी माध्यम है।
(ii) इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है।
(ख) जो पत्रकार किसी समाचार पत्र के लिए स्वतंत्र रूप से भुगतान के आधार पर लिखते हैं उन्हें फ्रीलांसर अथवा स्वतंत्र पत्रकार कहते है।
(ग) निष्पक्षता के सिद्धांत से तात्पर्य है कि संपादन निष्पक्ष होकर करना चाहिए। उसमें किसी के प्रति कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए।
(घ) (i) जनसामान्य तक खबरें पहुँचाना
(ii) खबरों की प्रामाणिकता सिद्ध करना
(iii) जनकल्याण हेतु कार्य करना
(iv) देश हित के लिए तत्पर रहना
(ङ) जब किसी गहन मुद्द्र की छानबीन की जाती है तब खोजी रिपोर्ट की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए :
(क) प्रेंट मीडिया से आप क्या समझते हैं?
(खा) दूरदर्शन वैज्ञानिक चेतना का विकास कैसे कर सकता है?
(ग) समाचार शब्द को परिभाषित कीजिए।
(घ) समाचार संकलन में ‘स्रोत’ का महत्व लिखिए।
(ङ) संचार को ‘दुधारी अस्र्र’ क्यों कहा जाता है ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
(क) प्रिंट मीडिया से तात्पर्य मुद्रित माध्यम से है। पत्रकारिता के क्षेत्र में मुद्रित माध्यम को प्रिंट मीडिया कहा जाता है।
(ख) दूरदर्शन समय-समय पर वैज्जानिक शोध, अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित कार्यक्रम दिखाकर जनसामान्य को प्रेरित करके वैज्ञानिक चेतना का विकास कर सकता है।
(ग) समाचार से तात्पर्य सूचना से है। जिससे कोई सूचना या खबर मिलती है उसे समाचार कहते हैं।
(घ) समाचार संकलन में सोत का बहुत महत्व है। सोत के माध्यम से ही समाचार प्राप्त होते हैं। जैसे पी॰्टी०आई० एक महत्वपूर्ण सोत है।
(ङ) संचार को दुधारी अस्त्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह दोनों तरफ से वार करता है। यह जनमानस को दोनों तरफ से प्रभावित करता है।

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प्रश्न 11.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-
(क) एंकर-पैकेज क्या होता है?
(ख) स्तंभ लेखन से क्या अभिप्राय है?
(ग) विशेष-लेखन किसे कहते हैं?
(घ) मुद्रित माध्यम की किसी एक विशेषता का उल्लेख कीजिए।
(ङ) पत्रकारिता की वैशाखियों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
(क) एक एंकर को किसी भी समाचार को संपूर्णता के साथ प्रस्तुत करने हेतु जो पैकेज दिया जाता है उसे उसका एंकर-पैकेज कहते हैं।
(ख) स्तंभ-लेखक द्वारा किसी भी समाचार-पत्र में नियमित रूप से लिखे गए विचारपरक लेखन को स्तंभ लेखन कहा जाता है।
(ग) सामान्य लेखन से हटकर विशेष-विषयों पर किए गए लेखन को विशेष-लेखन कहते हैं।
(घ) मुद्रित माध्यम एक स्थली माध्यम है।
(ङ) जिनके सहारे पत्रकारिता फल-फूल रही है उन्हें पत्रकारित की वैशाखियाँ कहा जाता है। पत्रकारिता में संपादक, उपसंपादक, पत्रकार आदि सब उसकी वैशाखियाँ है।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में लिखिए-
(क) एंकर-बाइड से क्या तात्पर्य है?
(ख) इंटरनेट का प्रचलन आजकल क्यों अधिक हो रहा है?
(ग) पीत पश्रकारिता से क्या तात्पर्य है?
(घ) रेडियो-समाचार की भाषा कैसी होनी चाहिए?
(ङ) पत्रकारीय लेखन क्या होता है?
उत्तर :
(क) किसी भी समाचार को प्रमाणित करने के लिए उससे संबंधित बाइट दिखाए जाते हैं। जिसे एंकर बाइट कहा जाता है।
(ख) सूचना प्रौद्यौगिकी आधुनिकता एवं युवा वर्ग की सोच के कारण इंटरनेट का प्रचलन अधिक हो रहा है। दूसरे इससे समाचारों का संप्रेषण, पुष्ट एवं सत्यापन होता है।
(ग) सनसनीखेज पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहते है।
(घ) रेडियो समाचार की भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
(ङ) विधिन्न समाचार-पत्रों में लेखकों द्वारा किए गए लेखन को पत्रकारीय लेखन कहते हैं।

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प्रश्न 13.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-
(क) समाचार-लेखन के छह ककार कौन-कौन से हैं?
(ख) उलटा पिरामिड शैली किसे कहते हैं?
(ग) खोजी रिपोर्ट क्या होती है?
(घ) विशेष लेखन से क्या तात्पर्य है?
(ङ) रेडियो की भाषा की कोई दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
(क) कौन, कहाँ, कब, कैसे, किसने, क्यों।
(ख) जिस शैली में सबसे पहले महत्वपूर्ण तथ्य तथा बाद में कम महत्वपूर्ण तथ्य देकर समाप्त कर दिया जाए उसे उलटा पिरामिड शैली कहते हैं।
(ग) जिस रिपोट्ट में किसी विषय की गहन खोजबीन की जाए उसे खोजी रिपोर्ट कहते हैं।
(घ) सामान्य विषयों की अपेक्षा विशेष विषयों पर किए गए लेखन को विशेष लेखन कहते हैं।
(ङ) (i) रेडियो की भाषा सरल एवं सहज होती है।
(ii) रेडियो की भाषा जन सामान्य के अनुकूल होनी चाहिए।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-
(क) समाचार किसे कहते हैं?
(ख) पत्रकारीय-लेखन किसे कहते हैं?
(ग) फ्रीलांसर पत्रकार से आप क्या समझते हैं?
(घ) फ्रैश या ब्रेकिंग न्यूज्त से क्या तात्पर्य है?
(ङ) मुद्रण माध्यम की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
(क) किसी घटना की सूचना जो हाल ही में पारित हुई हो समाचार कहलाती है। ऐसी सूचना जो जनसामान्य की रुचि के अनुसार हो।
(ख) विभिन्न समाचार-पत्रों में पत्रकार के द्वारा किए गए लेखन को पत्रकारीय लेखन कहते हैं।
(ग) वह पत्रकार जो किसी भी समाचार-पत्र में स्वतंत्र रूप से भुगतान के आधार पर लिखता है उसे फ्रीलांसर पत्रकार कहते हैं।
(घ) जो विशेष समाचार सर्वप्रथम दर्शकों तक पहुँचाया जाता है उसे फ्रैश अथवा ब्रेकिंग न्यूज़ कहते हैं।
(ङ) (i) मुद्रण माध्यम स्थायी होता है। (ii) मुद्रण माध्यम में संशोधन संभव है।

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प्रश्न 15.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए –
(क) भारत में पहला छापाखाना कब और कहाँ खोला गया?
(ख) टेलीविजन पर समाचार वाचक की किन्ही दो विशेषताओं पर प्रकाश ज्ञालिए।
(ग) संपादकीय किसे कहते हैं?
(घ) भारत में वेब पत्रकारिता की शुरुआत करने का श्रेय किसे दिया जाता है?
(ङ) इन-डेप्य रिपोर्ट किसे कहा जाता है और उसकी क्या उपयोगिता होती है?
उत्तर :
(क) भारत में पहला छापाखाना सन 1556 ईं० में गोवा में खोला गया।
(ख) (i) समाचार वाचक की भाषा-शैली सरल एवं सहज होनी चाहिए। (ii) वाचक की शब्दावली स्पष्ट होनी चाहिए।
(ग) किसी ज्वलंत मुद्दे पर समाचार-पत्र की राय को संपादकीय कहते हैं।
(घ) नई दुनिया को।
(ङ) वह रिपोर्ट जिसमें पत्रकार गहराई में जाकर सूचना एकत्रित करता है उसे इन-डेफ्थ रिपोर्ट कहते हैं। इसकी यह उपयोगिता है कि इसमें गहन मुद्यों की गहनता से रिपोट्ट तैयार की जाती है।

प्रश्न 16.
खोजी रिपोर्ट किसे कहते हैं?
उत्तर :
जब किसी विषय की गहरी छानबीन करने के पश्चात विशेष तथ्यों और सूचनाओं को सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाता है तो उसे खोजी रिपोर्ट कहते हैं।

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प्रश्न 17.
प्रधान संपादक के दो कायाँ का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रधान संपादक पत्र की नीतियों को निर्धारित करता है। वह समाचारों की अशुद्धियों को दूर कर सकता है। उस के द्वारा संपादकीय डेस्क के सभी विभिन्न कायों का कार्य निर्धारित किया जाता है। उसी के द्वारा प्रमुख कार्यों का निरीक्षण किया जाता है। उसी के द्वारा समाचार संगठन में द्वारपाल की भूमिका भी निभाई जाती है।

CBSE Class 12 Hindi Elective रचना फ़ीचर लेखन

Refer to the 12th Class Hindi Book Antra Questions and Answers CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana फ़ीचर लेखन to develop Hindi language and skills among the students.

CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana फ़ीचर लेखन

फ़ीचर’ का संबंध खबरों से नहीं होता जबकि इन्हें छपने का स्थान अखबारों में ही प्राप्त होता है। ये निबंध से भिन्न होते हैं। किसी पुस्तक को पढ़कर, आँकड़े इकट्ठे करके लेख लिखे जा सकते हैं, पर ‘फ़ीचर’ लिखने के लिए अपने आँख, कान, भावों, अनुभूतियों, मनोवेगों और अन्वेषण का सहारा लेना पड़ता है। फ़ीचर बहुत लंबा नहीं होना चाहिए। लंबा, अरुचिकर और भारी फ़ीचर तो फ़ीचर की मौत है। फ़ीचर को मज़ेदार, दिलचस्प और दिल पकड़ होना चाहिए। लेख लिखना आसान है पर फ़ीचर लिखना उससे कठिन काम है।

‘फ़ीचर’ एक प्रकार का गद्यगीत है जो नीरस और गंभीर नहीं हो सकता। ‘फ़ीचर’ ऐसा होना चाहिए जिसे पढ़कर पाठक का हृदय प्रसन्न हो या पढ़कर दिल में दुख का दरिया बहे। फ़ीचर का महत्त्व इस बात में है कि वह किसी बात को थोड़े से शब्दों में रोचकता और असर से कहे। लेख हमें शिक्षा देता है, फ़ीचर हमारा मनोरंजन करता है। फ़ीचर में हमें अपनी मनोवृत्ति और अपनी समझ के अनुसार किसी विषय का या व्यक्ति का चित्रण करना पड़ता है।

इसमें हास्य और कल्पना का विशेष हाथ रहता है। ‘फ़ीचर’ ऐतिहासिक और पौराणिक भी हो सकते हैं। हर वर्ष होली, दीवाली, दशहरा, मेलों, राखी आदि के अवसर पर पुरानी बातों को दुहराकर फ़ीचर लिखे जाते हैं। इनमें विचारों की एक बँधी हुई परंपरा का निर्वाह किया जाता है। फ़ीचर तो धोबी, माली, खानसामा, घरेलू नौकर, चौकीदार, रिक्शावाला, रेहड़ी वाला, चपड़ासी आदि पर भी लिखे जा सकते हैं। ‘फ़ीचर’ चाहे कैसे हों, उन्हें लिखने के लिए दिल और दिमाग दोनों का प्रयोग होना चाहिए। अच्छा आरंभ और खूबसूरत अंत करने पर फ़ीचर की सफलता निर्भर करती है।

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फ़ीचर के महत्वपूर्ण उदाहरण –

1. गुम होती चहचहाहट

एक समय था जब सुबह-सवेरे नींद चिड़ियों की चहचहाहट से खुलती थी। घर के बाहर लगे शिरीष के घने पेड़ पर तथा दीवार के छेदों में चिड़िया के अनेक घोंसले थे। तरह-तरह के पक्षी रहते थे वहाँ। सुबह – सुबह उन की चहचहाहट से वातावरण संगीतमयी हो जाता था। बीच-बीच में कौवों की काँव-काँव भी सुनाई दे जाती थी पर अब तो बाहर आँगन में या छत पर भी जा कर कहीं नहीं दिखाई देते वे पक्षी जिनके मधुर कलरव को सुनते-सुनते हम बड़े हुए। मानव-सभ्यता जिन पक्षियों के साथ बढ़ रही थी उसे आज पश्चिमी सभ्यता ने हमसे दूर कर दिया। चौड़ी होती सड़कें दोनों ओर किनारे लगे पेड़ों को निगल गईं। वह प्यारी सी भूरी सफ़ेद काली चिड़िया, जिसे हम गौरैया कहा करते थे, जब अपने झुंड में एक साथ चीं-चीं किया करती थी तो हम उसे रोटी के टुकड़े फेंक- फेंक कर अपने नाश्ते में सहभागी बनाया करते थे और वे भी बेखटके उछल उछल कर हमारे पास तक आ जाती थी। पता नहीं अब कहाँ खो गई- दिन भर फुर्र – फुर्र इधर से उधर मुँडेरों पर उड़ने वाली चिड़िया।

वैज्ञानिकों का मनाना है कि जब से मोबाइल का चहुँदिश बोलबाला हुआ है तब से हमारी प्यारी गौरैया की चहचहाहट घुटकर रह गई है। मोबाइल फोन सिगनल की तरंगें वायुमंडल में यहाँ-वहाँ फैली रहती हैं जिस कारण ये नन्हें-नन्हें पक्षी स्वयं को उस वातावरण में ढाल नहीं पाते। इनकी प्रजनन क्षमता कम हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप ये धीरे-धीरे सदा के लिए हमारी आँखों से ओझल होती जा रही हैं।

मुझे आज भी याद है अपने बचपन के वे दिन जब हम अपने आँगन के एक कोने में मिट्टी के कटोरे में पानी भरकर रख दिया करते थे। ढेरों चहचहाती चिड़ियाँ चोंच में पानी भर-भर कर पिया करती थीं। कोई-कोई तो पानी में घुस कर पंखों को फड़फड़ा कर डुबकियाँ भी खाती थीं। हमें तो यह देख तब अलौकिक आनंद आ जाया करता था। कभी-कभी वे मिट्टी में उलटी-सीधी होकर, पंखों से मिट्टी उड़ा-उड़ा कर धूल स्नान किया करती थीं। बारिश के दिनों में वे आँगन में कपड़े सुखाने के लिए बाँधी प्लास्टिक की रस्सी पर दीवाली के दीयों की तरह सज कर बैठ जाया करती थीं। कभी- कभी उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे भी आया करते थे जिन्हें ये उड़ना सिखाया करती थीं। रात को हमारी माँ हमें सोने से पहले रोज़ वही कहानी सुनाया करती थी – ‘एक थी चिड़िया और एक था चिरैया, जिन में गहराआपसी प्यार था जो आपस में कभी नहीं लड़ते थे।’

अब तो वह मनोरंजक दृश्य आँखों से ओझल हो गया है। उनकी यादें ही रह गई हैं। नई पीढ़ी तो कभी-कभार चिड़िया – घर में उन्हें देख अपने साथ आए बड़ों से पूछा करेगी – ‘वह क्या है ?’ यह आज का बनावटी जीवन पता नहीं हमें अभी प्रकृति से कितना दूर ले जाएगा ? शायद आने वाली पीढ़ी इस चहचहाहट को केवल मोबाइल की रिंग-टोन पर ही सुन पाएगी या फ़िल्मों में ही चिड़िया को चीं-चीं करते देख पाएगी।

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2. क्यों न परहेज़ करें हम पॉलीथीन से

बहुत कुछ दिया है विज्ञान ने हमें सुख भी, दुख भी। सुविधा से भरा जीवन हमारे लिए अनिवार्यता – सी बन गई है। बाज़ार से सामान खरीदने के लिए हम घर से बाहर निकलते हैं। अपना पर्स तो जेब में डाल लेते हैं पर सामान घर लाने के लिए कोई थैला या टोकरी साथ लेने की सोचते भी नहीं। क्या करना है उसका ? फालतू का बोझ। लौटती बार तो सामान उठाकर लाना ही है तो जाती बार बेकार का बोझा क्यों ढोएँ। जो दुकानदार सामान देगा वह उसे किसी पॉलीथीन के थैले या लिफाफे में भी डाल देगा। हमें उसे लाने में आसानी – न तो रास्ते में फटेगा और न ही बारिश में गीला होने से गलेगा। घर आते ही हम सामान निकाल लेंगे और पॉलीथीन डस्टबिन में या घर से बाहर नाली में डाल देंगे।

किसी भी छोटे कस्बे या नगर के हर मुहल्ले से प्रतिदिन सौ- दो सौ पॉलीथीन के थैले या लिफ़ाफ़े तो घर से बाहर कूड़े के रूप में जाते ही हैं। वे नालियों में बहते हुए नालों में चले जाते हैं और फिर वे बिना बाढ़ के मुहल्लों में बाढ़ का दृश्य दिखा देते हैं। पानी में उन्हें गलना तो है नहीं। वे बहते पानी को रोक देते हैं। उनके पीछे कूड़ा इकट्ठा होता जाता है और फिर वह नालियों-नालों के किनारों से बाहर आना आरंभ हो जाता है।

गंदा पानी वातावरण को प्रदूषित करता है। वह मलेरिया फैलने का कारण बनता है। हम यह सब देखते हैं, लोगों को दोष देते हैं, जिस मुहल्ले में पानी भरता है उस में रहने वालों को गँवार की उपाधि से विभूषित करते हैं और अपने घर लौट आते हैं और फिर से पॉलीथीन की थैलियाँ नाली में बिना किसी संकोच बहा देते हैं। क्यों न बहाएँ – हमारे मुहल्ले में पानी थोड़े ही भरा है। पॉलीथीन ऐसे रसायनों से बनता है जो ज़मीन में 100 वर्ष के लिए गाड़ देने से भी नष्ट नहीं होते।

पूरी शताब्दी बीत जाने पर भी पॉलीथीन को मिट्टी से ज्यों-का-त्यों निकाला जा सकता है। ज़रा सोचिए, धरती माता दुनिया की हर चीज़ हज़म कर लेती है पर पॉलीथीन तो उसे भी हज़म नहीं होता। पॉलीथीन धरती के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। यह पानी की राह को अवरुद्ध करता है, खनिजों का रास्ता रोक लेता है। यह ऐसी बाधा है जो जीवन के सहज प्रवाह को रोक सकता है। यदि कोई छोटा बच्चा या मंद बुद्धि व्यक्ति अनजाने में पॉलीथीन की थैली को सिर से गरदन तक डाल ले फिर उसे बाहर न निकाल पाए तो उसकी मृत्यु निश्चित है।

हम धर्म के नाम पर पुण्य कमाने के लिए गायों तथा अन्य पशुओं को पॉलीथीन में लिपटी रोटी-सब्ज़ी के छिलके, फल आदि ही डाल देते हैं। वे निरीह पशु उन्हें ज्यों-का-त्यों निगल जाते हैं जिससे उनकी आँतों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है और वे तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। ऐसा करने से हमने पुण्य कमाया या पाप ? ज़रा सोचिए नदियों और नहरों में हम प्राय: पॉलीथीन अन्य सामग्रियों के साथ बहा देते हैं जो उचित नहीं है। सन 2005 में इसी पॉलीथीन और अवरुद्ध नालों के कारण वर्षा ऋतु में आधी मुंबई पानी में डूब गई थी। हमें पॉलीथीन से परहेज़ करना चाहिए। इसके स्थान पर कागज़ और कपड़े का इस्तेमाल करना अच्छा है। रंग-बिरंगे पॉलीथीन तो वैसे भी कैंसरजनक रसायनों से बनते हैं। काले रंग के पॉलीथीन में तो सबसे अधिक हानिकारक रसायन होते हैं जो बार-बार पुराने पॉलीथीन के चक्रण से बनते हैं। अभी भी समय है कि हम पॉलीथीन के भयावह रूप से परिचित हो जाएँ और इसका उपयोग नियंत्रित रूप में ही करें।

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3. वृक्षों की माता थिमाक्का

वृक्ष धरती के शृंगार हैं; जीवन के आधार हैं; हवा-पानी के साधन हैं और हमें तरह-तरह के फल-फूल उपहार में देते हैं। वे हमें देते सब कुछ हैं पर हम से लेते कुछ नहीं। प्रकृति ही उनकी माता है। उन्हें पालती – पोसती है; बड़ा करती है। परमात्मा के द्वारा दिए जाने वाले उपहारों को हम इन्हीं वृक्षों के माध्यम से प्राप्त करते हैं। परमात्मा के द्वारा किसी-न-किसी को प्रेरणा मिलती है और वह सद्कार्यों की ओर आगे बढ़ जाता है। पेड़-पौधों की आधुनिक माता के रूप में सेवा करने का कार्यभार सँभाला है – बैंगलुरु के मगदी तालुका के हुलिकल गाँव की 75 वर्षीय थिमाक्का ने। थिमाक्का घर-गृहस्थी वाली है। वह सम्मानीय वृद्धा है।

वह आयु से वृद्धा अवश्य हैं लेकिन लगन से नहीं। उत्साह का भाव तो कूट-कूटकर भरा हुआ है उसमें। उसे अपनी संतानों से अपार स्नेह है। उसकी संतानें दो-चार नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में हैं। उसकी संतानें हैं – हरे-भरे पेड़-पौधे। थिमाक्का पूरे ज़िले में वृक्षों की माता के नाम से प्रसिद्ध है। अपनी घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर उसने अपने पति से सलाह-मशवरा किया और दोनों ने निश्चय कर लिया कि अब वे पेड़-पौधों का पालन-पोषण करेंगे। लगातार बढ़ती आयु में भी उन दोनों ने अथक परिश्रम से 285 पेड़ लगाए हैं। चार किलोमीटर दूर से पानी ढोकर लाना और अपनी संतानों को सींचना उन्हें आत्मिक सुख देता है।

उनकी शारीरिक थकान लहलहाती अपनी हरी-भरी संतानों को देख पलभर में दूर हो जाती है। अपने गाँव से दूसरे गाँव की सड़क तक लगे हरे-भरे पेड़ उन्हीं की अनुपम देन हैं। आस-पास के सभी गाँव वाले उनकी सराहना करते हैं और अब उनकी सहायता भी करते हैं। वृक्षों की इस आधुनिक माता ने अपने क्षेत्र में जन-जागृति उत्पन्न कर दी है। उसने नेताओं के समान कोरे भाषण नहीं दिए बल्कि माँ की तरह पौधों रूपी बच्चों को पाल-पोस कर जवान वृक्ष बना दिया है। अब सरकार का ध्यान भी उसकी तरफ़ गया है।

आज उनकी झोंपड़ी के एक कोने में ढेरों पुरस्कार रखे हैं जो उन्हें विभिन्न संस्थाओं, समाज सेवी क्लबों और सरकारों ने दिए हैं। उन्हें नेशनल सिटीजन पुरस्कार और इंदिरा वृक्षमित्र सम्मान भी मिल चुका है पर कोई माँ अपने बच्चों का पालन-पोषण पुरस्कार पाने के लिए थोड़े ही करती है। थिमाक्का को भो कोई लगाव नहीं इन पुरस्कारों से। वह तो बस अपनी संतान की सुरक्षा चाहती है और अपनी इस उम्र में भी संतान वृद्धि में निरंतर जुटी हुई है। उसे न अपने बुढ़ापे की परवाह है और न निरंतर बढ़ती शारीरिक कमज़ोरी है। उसकी तो बस एक ही मंज़िल है-अपनी संतान को पालना और उनकी रक्षा करना।

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4. रिक्शा….. ओ रिक्शावाले

बड़ी जानी-पहचानी आवाज़ है यह – ‘रिक्शा….. ओ रिक्शावाले’। हर सड़क पर, हर गली-मुहल्ले में और छोटे-बड़े शहर में यह आवाज़ हमें प्रायः सुनाई दे जाती है। कुछ कम दूरी तय करने तथा छोटा-मोटा सामान ढोने के लिए सबसे उपयोगी साधन है रिक्शा – यदि हमारे अपने पास साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार आदि न हो तो रिक्शा ऐसा साधन है जो सस्ती की सस्ती और आराम का आराम। इसमें बस एक ही कष्टकारी पक्ष है कि आदमी को आदमी ढोने पड़ते हैं। रिक्शा चलाने वाले का शारीरिक कष्ट सवारियों के सुख का कारण बनता है।

भूख मनुष्य से क्या-क्या नहीं करवाती ? रिक्शा चलाने वालों से बोझा खिंचवाती है। दुबले-पतले, बेकारी की मार को झेलने वाले, अपने और अपने परिवार का पेट भरने के लिए रिक्शा चलाने वाले हर राज्य के हैं पर कुछ विशेष राज्यों के मेहनती लोग अपेक्षाकृत दूसरे संपन्न राज्यों में जाकर यह कार्य बड़ी संख्या में करते हैं। वे वहाँ रहते हैं; दिन-रात मेहनत करते हैं, धन कमाते हैं, कुछ स्वयं खाते हैं और अधिक अपने घरों में रहने वाले को भेज देते हैं ताकि वहाँ उनकी रोटी चल सके। बहुत कम रिक्शावाले अपने परिवारों को अपने साथ दूसरे राज्यों में लाते हैं और सपरिवार रहते हैं। वे कमर कसकर मेहनत करते हैं पर बहुत सीधा-सादा खाना खाते हैं। फटा – पुराना पहनते हैं और पैसा बचाते हैं ताकि अपनों के कष्ट दूर कर सकें। अधिकतर रिक्शा चालकों के पास अपन रिक्शा नहीं होता। वे किराये पर रिक्शा लेकर सवारियाँ ढोते हैं और उनसे पैसे लेते हैं।

हमारी एक मानसिकता बड़ी विचित्र है। घर में जब कोई भिखारी भीख माँगने आता है तो हम अपने परलोक को सुधारने के लिए बिना मोलभाव किए उन्हें कुछ पैसे देते हैं, रोटी-सब्ज़ी देते हैं और कभी-कभी तो पुराने कपड़े भी दे देते हैं। उन्होंने कोई परिश्रम नहीं किया था। वे समाज में निकम्मेपन के प्रतीक हैं। कई हट्टे-कट्टे भिखारी साधू बाबा का वेश धारण कर लोगों को डराते भी हैं और पैसे भी ऐंठते हैं पर किसी भी रिक्शा। में बैठने से पहले हम रिक्शा वाले से चार-पाँच कम कराने के लिए अवश्य बहस करते हैं। उस समय हम यह नहीं सोचते कि ये उन मुफ्तखोर भिखारियों से तो लाख गुना अच्छे हैं। ये परिश्रम करके खाते हैं। यदि उन परिश्रम न करने वालों को हमें दे सकते हैं तो इन परिश्रम करने वालों को क्यों नहीं दे सकते।

सुबह-सवेरे कुछ रिक्शा चालक छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते दिखाई देते हैं। वे बच्चों के साथ कभी बच्चे बने होते हैं और कभी उनके अध्यापक। बच्चे ऊँचे स्वर में गाते जाते हैं, साथ में रिक्शा चलाने वाले भी गाते हैं। वे रोते बच्चों को चुप कराते हैं और शरारती बच्चों को डाँटते-डपटते हुए स्कूल तक ले जाते हैं।

रिक्शा चलाने वालों का जीवन बड़ा कठोर है। कमज़ोर शरीर और शारीरिक श्रम का सख्त काम। बरसात के दिनों में ये स्वयं तो रिमझिम बारिश अपने ऊपर झेलते हैं पर सवारियों को सूखा रखने का पूरा प्रबंध करते हैं। कुछ रिक्शा चालकों का सौंदर्य बोध उनकी रिक्शा से ही दिखाई दे जाता है। तरह- तरह की देवी – देवताओं और फ़िल्मी हस्तियों की तस्वीरें, रंग-बिरंगे प्लास्टिक के रिबन, सुंदर रंग-रोगन आदि से वे अपनी रिक्शा को सजाते – सँवारते हैं और बार-बार उसे कपड़े से साफ़ करते रहते हैं।

कभी-कभार कुछ रिक्शावाले सवारियों से झगड़ा भी कर लेते हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे मानसिक शांति भंग होती है और कार्य में बाधा उत्पन्न होती है।

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5. मेरे स्कूल का माली

मेरे स्कूल का माली है श्रीपाल। लगभग 40-50 वर्ष का दुबला-पतला छोटे कद का श्रीपाल अपनी उम्र से कुछ बड़ा लगता है। अभावों में पला वह खानदानी माली है। कहते हैं कि उसके पिता भी हमारे स्कूल में माली थे और उनके पिता देश की स्वतंत्रता से पहले किसी राजा के राजमहल में यही कार्य करते थे। श्रीपाल पढ़ा-लिखा तो नहीं है पर उसे अपने काम की बहुत अच्छी समझ है। उसकी समझ का परिणाम ही तो मेरे स्कूल में चारों तरफ फैली हरियाली और फूलों की इंद्रधनुषी छटा है कोई भी ऐसा नहीं जो मेरे स्कूल में आया हो और उसने यहाँ उगे पेड़-पौधों और फूलों की प्रशंसा न की हो। श्रीपाल का सौंदर्य बोध तो बड़ी उच्च कोटि का है। उसे रंग- योजना की अच्छी समझ है।

वह फूलों की क्यारियाँ इस प्रकार तैयार करता है कि हरे-भरे घास के मैदानों में तरह-तरह के रंगों की अनूठी शोभा बरबस यह सोचने को विवश कर देती है कि कितना बड़ा खिलाड़ी है रंगों का हमारा माली जो ईश्वर के रंगों को इतनी सोच-समझ कर व्यवस्था प्रदान करता है। उसकी पेड़-पौधों की कलाकारिता स्कूल के प्रवेश-द्वार से ही अपने रंग दिखाना शुरू कर देती है। चार भिन्न-भिन्न रंगों की सदाबहार झाड़ियों से उसने स्कूल का पूरा नाम ऊँचाई से नीचे की ओर ढलान पर इतने सुंदर ढंग से तैयार किया हुआ है कि सड़क से गुज़रने वाले हर व्यक्ति की नज़र उस पर अवश्य जाती है और वह मन ही मन उस कला पर मुग्ध होता है।

प्रायः लोग मानते हैं कि कैक्टस तो काँटों का झुरमुट होते हैं पर श्रीपाल ने स्कूल में कंकर – पत्थरों से रॉकरी बनाकर उस पर कैक्टस इतने सुंदर ढंग से लगाए हैं कि बस उनका कँटीला सौंदर्य देखते ही बनता है। सौ-डेढ़ सौ से अधिक प्रकार के कैक्टस हैं उस रॉकरी में। कई तो फुटबॉल जितने गोल- मटोल और भारी-भरकम हैं। कई मोटे-मोटे तने वाले कैक्टस बड़े ही आकर्षक हैं।

हमारे स्कूल का परिसर बहुत बड़ा है और उस सारे में श्रीपाल की कला फूलों और पौधों के रूप में व्यवस्थित रूप से बिखरी हुई है। श्रीपाल की सहायता के लिए तीन माली और भी हैं पर वे सब वही करते हैं जो श्रीपाल उनसे करने के लिए कहता है। श्रीपाल बहुत मेहनती है। वह सरदी – गरमी, धूप-वर्षा, धुंध – आँधी आदि सब स्थितियों में खुरपा हाथ में लिए काम करता दिखाई देता है।

वह परिश्रमी होने के साथ-साथ स्वभाव का बहुत अच्छा है। उसने स्कूल के सारे विद्यार्थियों को इतने अच्छे ढंग से समझाया है कि वे स्कूल में लगे फूलों की सराहना तो करते हैं पर उन्हें तोड़ते नहीं हैं। वैसे स्कूल प्रशासन ने भी जगह-जगह ‘फूल न तोड़ने’, ‘पौधों की रक्षा करने’ आदि की पट्टिकाएँ जगह-जगह पर लगाई हुई हैं। श्रीपाल सदा स्कूल की ड्रेस पहनता है तथा सभी से नम्रतापूर्वक बोलता है। उसे ऊँची आवाज़ में बोलते, लड़ते-झगड़ते कभी नहीं देखा। वास्तव में ही उसके कारण हमारा स्कूल फूलों की सुगंध से महकता रहता है।

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6. कैसे पहुँचा आइना आप- हम तक

युगों पहले मानव ने जब पानी में पहली बार अपना प्रतिबिंब देखा होगा तो वह हैरान हुआ होगा। उसने अपने आपको भी नहीं पहचाना होगा। उस बिंब को कोई दूसरा मानव समझा होगा। पता नहीं वह उस पर झपटा था या स्नेह से मुसकराया था। धातुयुग के विकास में जब पहली बार उसने किसी धातु को चमकीला बनाया होगा तब उसे उसमें अपना अस्पष्ट-सा प्रतिबिंब दिखाई दिया होगा। यही आइने का पहला रूप रहा होगा। सबसे पहले मिस्रवासियों ने ईसा से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले सोना-चाँदी जैसी धातुओं को चमकाकर आइने की शक्ल बनाने में सफलता प्राप्त कर ली थी।

तब वे आइनों को सूर्य और माइसनीन देवता का रूप मान कर प्रतीक रूप में इनकी पूजा किया करते थे। ग्रीक-वासियों ने ताँबे और पीतल के सुंदर कलात्मक आइने बनाए। तब तक आइना बहुत मूल्यवान समझा जाता था और इनका उपयोग अति संपन्न लोग ही कर पाते थे। धातु के बने आइनों में कमी यह थी कि उनकी चमक बहुत जल्दी धूमिल हो जाती थी और धातुएँ काली पड़ जाती थीं। ईसा की दूसरी शताब्दी में काले किए गए शीशे का इस्तेमाल आरंभ हुआ पर इसे भी बहुत सफलता नहीं मिली थी।

पंद्रहवीं शताब्दी में धातु के बने आइनों को लकड़ी के फ्रेम में लगाकर दीवारों पर टाँगने का प्रचलन शुरू हुआ था। लेकिन दर्पण का वास्तविक और वर्तमान रूप तो तब सामने आया जब काँच का आविष्कार हुआ था। सोलहवीं शताब्दी में वीनस शहर के लोगों ने सबसे पहले काँच पर पॉलिश कर आइना बनाने में सफलता प्राप्त की थी। उस समय संसार में किसी भी दूसरे देश को आइना बनाने की कला नहीं आती थी।

वीनसवासियों ने सारी दुनिया से इस कला को छिपा कर रखने का पूरा प्रबंध किया था। उन्होंने इस हुनर में दक्ष लोगों को एक अलग टापू पर रखा जहाँ उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। इस द्वीप पर किसी भी विदेशी का प्रवेश पूरी तरह से प्रतिबंधित था। कारीगर यहाँ दिन-रात काँच पर एक विशेष प्रकार की पॉलिश और लेप से दर्पण बनाने में लगे रहते थे। इस टापू से बाहर जाने का प्रयास करने वालों को मौत दे दी जाती थी।

एकाधिकार होने के कारण वीनस द्वारा काफ़ी ऊँचे दामों पर आइनों का निर्यात किया जाता। तब विश्व के अनेक देश आइना बनाने का फॉर्मूला प्राप्त करने के प्रयास में थे। फ्रांस भी इन देशों में से एक था। उस समय फ्रांस का सम्राट इस दिशा में बहुत अधिक रुचि लेता था। उसने वीनस के उस टापू पर अपने कई जासूस भेजे थे पर वे बहुत प्रयासों और अपार धन-संपदा का लालच देने के बावजूद विफल रहे।

अंत में एक जासूस ने वीनस के नौजवान कारीगर साज गाबरीलों से मित्रता की और दोस्ती की आड़ में उससे आईना बनाने का फॉर्मूला प्राप्त कर लिया। इसके बाद वह भागकर फ्रांस पहुँच गया। जासूस द्वारा लाए गए फॉर्मूले के आधार पर फ्रांस में बड़े पैमाने पर आईने बनाने का काम होने लगा। फ्रांस ने इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर दिया। इसके साथ ही आइना बनाने की कला विश्व के अनेक देशों में पहुँच गई। अब तो दुनिया के लगभग सभी देशों में उच्च कोटि के आइने बनाए और बेचे जाते हैं। ये घरों की शोभा नहीं बल्कि अब तो दैनिक आवश्यकता बन चुके हैं और इन्हें उत्तल – अवतल आदि कई रूप भी दिए जा चुके हैं।

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7. चाँद-तारों को छूने की तमन्ना थी कल्पना चावला की

कौन नहीं चाहता चाँद-तारों को छूना ? माँ की गोद में मचलता नन्हा सा बच्चा भी चाँद को पाने की इच्छा करता है। बड़े-बूढ़ों को भगवान चाँद-तारों के उस पार प्रतीत होते हैं। पर चाँद-तारों को पाना आसान नहीं है, बस हम तो इनकी कल्पना ही कर सकते हैं पर करनाल की कल्पना ने इस कल्पना को साकार करने का प्रयत्न किया था। भले ही वह चाँद-तारे नहीं पा सकी पर उन्हें पाने की राह पर तो आगे अवश्य बढ़ी थी।

प्रायः जिस उम्र में लड़कियों की आँखों में गुड़ियों के सपने सितारों की तरह झिलमिलाते हैं, कल्पना ने आँखों में चाँद-सितारों के सपने सजाना शुरू कर दिया था। अमेरिकी एजेंसी नासा में अपने सहयोगियों के बीच केसी के नाम से प्रसिद्ध कल्पना चावला हरियाणा के करनाल नगर के ऐसे परिवार में जन्मीं जिसका कठिन परिश्रम में अटूट विश्वास था। आँखों में चाँद-सितारों पर जाने के सपने और विरासत में मिली श्रम पर आस्था के दुर्लभ संगम ने उन्हें अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की प्रथम महिला का खिताब दिला दिया।

हरियाणा के नगर करनाल से कोलंबिया का यह सफ़र न तो आसान था और न ही इसके लिए कोई छोटा रास्ता था। करनाल के टैगोर बाल निकेतन स्कूल से स्कूली शिक्षा, दयाल सिंह कॉलेज से उच्च शिक्षा, पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा, टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की मास्टर्स डिग्री और कोलराडो यूनिवर्सिटी से फिलॉसफी इन एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डॉक्टरेट की उपाधि के बीच कल्पना के कड़े संघर्ष की कल्पना की जा सकती है।

कल्पना का काम जितना चुनौती भरा था उसमें उनके पास काम के अतिरिक्त कुछ भी सोच पाने का अवसर बहुत कम था। शायद इसी कारण वह अपने हमपेशा ज्याँ पियरे हैरिसन की तरफ आकर्षित हुईं। विवाह के बाद जब कल्पना ने नासा में नौकरी की तो कैलिफोर्निया में फ्लाइंग प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रहे हैरिसन भी अपनी नौकरी छोड़कर उनके सपनों की खातिर उनके साथ चले आए। कल्पना के मित्र बताते हैं कि शादी के बीस वर्ष बाद भी यह युगल निहायत प्रेम भरा जीवन जी रहा था और दोनों को उड़ानों से वापसी के समय रनवे पर एक-दूसरे का बेसब्री से इंतज़ार करते देखा जा सकता था।

कल्पना को भारतीय और रॉक संगीत का बहुत शौक था। चाय पीना, पंछियों की ओर निहारना और पूर्णमासी की रातों में खुले आकाश के नीचे घूमना जैसे शौक उनकी उपलब्धियों के साथ मिलकर उन्हें असाधारण व्यक्तियों के दर्जे में ला खड़ा करते हैं। अंतरिक्ष को अपना घर कहने वाली कल्पना अंतरिक्ष में 376 घंटे व्यतीत कर चुकी थीं। उन्होंने पृथ्वी की कुल 252 परिक्रमाएँ की थीं। जिंदगी और मौत के मात्र 16 मिनट के फासले से विधाता ने अपनी यह अमूल्य धरोहर हमसे वापस ले ली जो उसने मात्र 41 सालों के लिए हमें दी थी। टैक्सास की ज़मीन से दो लाख फीट की ऊँचाई पर जब अंतरिक्ष यान की प्लेटें टूटकर गिरी थीं तो हमारा यह सितारा टूटा और सदा के लिए हमसे बिछुड़ गया।

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8. गायब होती रौनकें

पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में आर्थिक परिवर्तन बड़ी तेज़ी से हुए हैं। इसका प्रभाव जन-सामान्य पर पड़ा है। घरों के अंदर एक क्रांति आई है, जो सुख-सुविधाएँ पहले राजाओं को नसीब नहीं थीं, अब आम आदमी के बूते में हैं। औरतों के लिए तो नई तकनीक चमत्कार है क्योंकि जहाँ पुरुषों का बाहर का काम लगभग वैसा ही रहा है, औरतों का घर में काम बहुत सरल हो गया है। पर सुखों के बावजूद अब चेहरों पर से रौनक गायब हो गई है। शहर हो या गाँव उनका प्रबंध बिगड़ रहा है। बढ़ते मकानों, बढ़ती आबादी, बढ़ते वाहनों और घरों तक सेवाएँ पहुँचाने के चक्कर में शहरों का कबाड़ा होना शुरू हो गया है।

कल तक आपको अपने शहर की जो सड़क अच्छी लगती थी, जो नदी कलकल करती मोहक लगती थी, जो बाग महकता रहता था अब या तो रहा ही नहीं या खराब हो गया है। सड़कें चौड़ी होनी थीं इसलिए पटरियों और उन पर लगे पेड़ काट दिए गए। जहाँ पेड़ों की छाया और चिड़ियाँ होती थीं वहाँ बिजली, टेलीफ़ोन और तरह-तरह की तारों के गुच्छे नज़र आते हैं। बागों में घास की जगह पक्के फर्श बन गए। शहरों में मिट्टी तो ईंटों-पत्थरों के नीचे छिपती ही चली जा रही है। कंकरीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं।

प्रकृति के नाम पर कैक्टस के गमले रह गए अगर कोई सुंदर भवन थे तो वे विज्ञापन बोर्डों से ढक गए। गलियों तक में चलना दूभर हो गया क्योंकि वे स्कूटरों, साइकिलों से भरी रहती हैं। जिन शहरों में कूड़ा उठाने का सही प्रबंध नहीं वहाँ तो जीवन नर्क में रहने जैसा हो गया है। घर अच्छा तो क्या, बाहर तो गंद ही गंद। अमेरिकी आर्किटेक्ट क्रिस्टोफर चार्ल्स बेर्नीयर की तो शिकायत है कि अब मकानों को इस तरह दीवारों में बंद किया जा रहा है मानो हर कोई दूसरे से भयभीत हो। हम सब चूहे के बिलों की तरह अपने चारों ओर दीवारें खड़ी करते जा रहे हैं।

यह भय अब शहर की सड़क से घुसकर कमरों में पहुँचने लगा है। अच्छा घर भी बंद कमरों वाला होने लगा है। एअरकंडीशनर की दया से हर व्यक्ति अपने दरवाज़े बंद रखता है। सड़क पर गाड़ी, बंद दफ़्तर पर शीशे के दरवाज़े, दुकान में घुसने से पहले परिचय पत्र दिखाओ यानी हर व्यक्ति अपनी ही कैद में है।

इस कैद ने ही रौनक छीनी है। मानसिक तनाव, अकेलापन लगातार बढ़ रहा है। हर शहर में लाखों लोग बिलकुल अकेले हैं। शहर का आर्किटेक्चर, उसका प्रबंध, उसकी भागदौड़ ऐसी है कि हर कोई दूसरे से अकेले मिलने से भी कतरा रहा है। यह दुनिया को कहाँ ले जाएगा उसकी कल्पना आज नहीं की जा सकती है पर समझा जा सकता है।

इसका हल यही है कि हम बराबर चाले का हाल पूछें, उसके दुखदर्द में सम्मिलित हों। शहर के साथ होने वाले छल का विरोध करें, घर से आज़ादी पाएँ। शहर आपके लिए हो, आप शहर के लिए। चलिए बराबर वाले दरवाज़े को थपथपाइए शायद मुसकराता चेहरा मिल जाए। जब तक हम स्वयं पहल नहीं करेंगे तब तक पराए हमारे अपने नहीं हो सकते। किसी पराए को अपना बनाने के लिए हमें उन्हें अपना बनाना होगा। संवादहीनता अभिशाप है। सब से मिलो तभी गायब होती रौनकें फिर से लौटेंगी।

CBSE Class 12 Hindi Elective रचना आलेख लेखन

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CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana आलेख लेखन

आलेख का लेख से गहरा नाता है। इन दोनों में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। आलेख को निबंध का ही रूप स्वीकार किया जाना चाहिए। ‘लेख’ के आगे लगा ‘आ’ उपसर्ग लेख के सम्यक और सर्वांगपूर्ण होने का द्योतक है। आलेख मन की जिज्ञासा को तृप्त करने की क्षमता रखता है। यह ताज़गी से युक्त भावों से समाहित होता है जिसमें निम्नलिखित गुण विद्यमान होने चाहिए –

  1. आलेख की भाषा सरल, सरस और भावपूर्ण होनी चाहिए।
  2. इसमें पुरानी जिज्ञासाओं को तृप्त करने व नई जिज्ञासाएँ जागृत करने की क्षमता होनी चाहिए।
  3. इसमें विचारों की प्रधानता होनी चाहिए।
  4. इसमें विश्लेषणात्मकता होनी चाहिए।
  5. यह महत्वपूर्ण विषयों, अवसरों, चरित्रों और व्यक्तियों से संबंधित होना चाहिए।
  6. इसमें किसी बात को बार-बार दोहराना नहीं चाहिए।
  7. यह नवीनता और ताज़गी से युक्त होना चाहिए।
  8. इसका आकार बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए।

आलेख के महत्वपूर्ण उदाहरण –

1. क्या है तन-मन की थकान ?

आज के समय में हर उम्र और वर्ग के लोग यदि थके-हारे और दुखी हैं तो केवल अपनी इच्छाओं के कारण। इसी कारण वे ऊर्जा के नैसर्गिक स्रोत से दूर होते जा रहे हैं। खान-पान की बिगड़ी आदतें, आहार-विहार का असंयम, अव्यवस्थित कार्य-पद्धति और भावनात्मक जटिलताएँ उनकी जीवनी शक्ति को निचोड़कर उन्हें थकान की अधेरी खोह में धकेल रही हैं। हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से शक्ति सीमित मात्रा में ही होती है। इसी से हमारा जीवन चलता रहता है। हम तभी तक कार्य कर सकते हैं जब तक यह शक्ति विद्यमान रहती है। शक्ति की कमी के साथ हमारी कार्य कुशलता में गिरावट आने लगती है। इसी से हर कार्य में अरुचि होने लगती है। स्वभाव में चिड़चिड़ापन, खीझ उत्पन्न होते हैं और कभी-कभी सिरदर्द भी होने लगता है। ये सब थकान के लक्षण हैं। शारीरिक ऊर्जा का प्रमुख स्रोत आहार है और इसी से शरीर को प्रचुर मात्रा में ऊर्जा मिलती है।

थकान का शरीर से अधिक मन से गहरा संबंध होता है। कोई भी व्यक्ति काम की अधिकता से नहीं, बल्कि काम की नीरसता और उसे भार समझ कर करने से ज्यादा थकता है। साथ ही भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं से उत्पन्न तनाव शरीर को थका देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि तनाव, भय या उदासीनताजनक स्थिति में मस्तिष्क में ऐसे रसायनों का स्राव होता है, जो शरीर को दुर्बल बनाते हैं।

कोई भी व्यक्ति इस थकान को निम्नलिखित तरीके से दूर कर सकता है –

  1. उसे अपनी जीवन शैली को देखना चाहिए और तनाव के कारक तत्वों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। थकान का सबसे महत्वपूर्ण उपचार आराम है।
  2. कार्य को यदि हम अच्छे ढंग से करें तो तनाव एवं थकान से बच सकते हैं। रुचिकर काम करने से थकान कम महसूस होती है।
  3. कार्य करते समय बीच-बीच में थोड़ी-थोड़ी देर के लिए आराम कर लेना चाहिए।
  4. काम करते समय बीच-बीच में मनोरंजन की व्यवस्था भी थकान को कम कर देती है।
  5. कार्य की एकरसता को मिटाकर उसमें परिवर्तन करने से थकान दूर हो जाती है। शारीरिक कार्य के बाद मानसिक कार्य और मानसिक कार्य के बाद शारीरिक कार्य बदलते रहने से थकान दूर होती रहती है।
  6. छोटी-छोटी सफलताएँ मन को उत्साहित बनाए रखती हैं। कभी-कभी पिछली सफलताओं को याद करना भी थके-हारे मन को उत्साह से भरने का प्रभावशाली उपाय है।

थकान को मामूली समझ इसे नज़रअंदाज़ न करें। आराम और नींद के बाद भी यदि तन-मन का हल्कापन एवं ताज़गी आप महसूस नहीं कर रहे तो निश्चित है कि आप स्थाई थकान की गंभीर समस्या के शिकार हैं। सतर्क हो जाइए, क्योंकि यह थकान एनीमिया, थायरॉइड, मधुमेह, टी०बी० या अन्य किसी जीर्ण रोग का कारण बन सकता है। इनसे जीवनी-शक्ति का तेजी से ह्रास होता है। देर न करें और किसी डॉक्टर से उपचार कराएँ।

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2. प्राकृतिक सुंदरता से संपन्न पन्ना

मध्य प्रदेश का पन्ना नगर सारे भारतवर्ष में हीरे की खानों तथा मंदिरों के लिए जाना जाता है। विंध्याचल पर्वतों के प्राकृतिक सौंदर्य से संपन्न पन्ना, सतना रेलवे स्टेशन से लगभग साठ किलोमीटर और छतरपुर से भी लगभग षचास किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। मान्यता है कि पन्ना राज्य की नींव भगवान राम के पुत्र कुश के वंशजों ने रखी थी। महाराजा छत्रसाल ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। यह भारत में ‘प्रणामी संप्रदाय’ का एकमात्र तीर्थस्थल है। यहाँ के मंदिर बुंदेला शासकों की कलाप्रियता और सौंदर्य-प्रेम को प्रकट करते हैं।

पद्मावती देवी का मंदिर, बलदाऊजी मंदिर, जुगल किशोर मंदिर, राम-जानकी मंदिर, गोविंद देव मंदिर, गणेश मंदिर, जगदीश मंदिर एवं प्राणनाथ मंदिर इस नगर की शोभा एवं आस्था के आधार हैं। ये सभी मंदिर कला की दृष्टि से अति आकर्षक हैं। बलदाऊजी का मंदिर वृंदावन के रंगनाथ मंदिर और इंग्लैंड के कैथोलिक सेंट पॉल गिरजाघर का मिला-जुला रूप प्रकट करता है। कलापूर्ण मेहराबों तथा शीर्ष पर कमल एवं कलश से युक्त जगदीश स्वामी का मंदिर, रोमन तथा मुग़लकालीन स्थापत्य कला का संगम प्रतीत होता है।

पन्ना का तीर्थस्थल ‘प्रणामी मंदिर’ यहाँ के प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इसकी प्रदक्षिणा में चारों ओर राधाकृष्ण की रास लीलाएँ रंगों की आकर्षक छटा बिखेरती चित्रित हैं। यह मंदिर मुग़लकाल और राजपूताना लोककला संस्कृति को प्रदर्शित करता प्रतीत होता है। गोल गुंबद तथा पंचायतन शैली में बने मंदिर के ऊपर गुंबदों में बने गवाक्ष आदि आकर्षक लगते हैं। प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ पूरे भारत से ‘प्रणामी संप्रदाय’ के अनुयायी इकट्ठे होते हैं। गीत, संगीत, नृत्य के रंग से सराबोर इस मंदिर की सुंदरता पूर्णमासी की रात में और भी मोहक लगती है।

मंदिरों के अतिरिक्त इस नगर का आकर्षण यहाँ की विश्व प्रसिद्ध हीरा खदानें हैं। सत्रहवीं शताब्दी में यहाँ हीरा खनन का कार्य शुरू हुआ था। सागौन, शीशम, तेंदू, महुआ, चिरौंजी, बाँस जैसी प्राकृतिक वन-संपदा के धनी पन्ना की शोभा यहाँ के अनगिनत तालाबों से और बढ़ जाती है। पन्ना की ऐतिहासिक इमारत महेंद्र भवन, कलात्मक शिल्प का अद्भुत नमूना है। पन्ना का राजमहल, बृहस्पति कुंड, सुतीक्ष्ण आश्रम, केन अभयारण्य, पांडव फाल आदि यहाँ के उल्लेखनीय दर्शनीय स्थल हैं। विश्वप्रसिद्ध खजुराहो यहाँ से मात्र 50 किमी० की दूरी पर है। वास्तुकला, शिल्प कला, ऐतिहासिकता, पुरातत्व, प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिकता को अपने भीतर समेटे हुए पन्ना वास्तव में बेजोड़ है।

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3. भुला दो कड़वी यादों को

पिछले वर्ष पता नहीं किस बात पर नीरज और राजेश के बीच झगड़ा हो गया था। साल भर तक दोनों पड़ोसियों के बीच बोलचाल बंद थी। अभी कुछ दिनों पूर्व नीरज को हार्टअटैक आया और वे दर्द से तड़पने लगे। घर पर सिर्फ़ उनकी पत्नी थी। पति को बुरी तरह छटपटाते देख उसने पड़ोसी राजेश की घंटी बजाई और दरवाज़ा खोलते ही उनसे सहायता की पुकार की। एक पल तो राजेश को पुरानी कड़वी यादें ताज़ा हो आईं, जब दोनों में गाली-गलौच हुआ था। इस कारण तो किसी भी तरह की मदद करने का कोई प्रश्न भी नहीं था। उनका एक मन कह रहा था, ‘मरने दो उस घमंडी को।’ लेकिन तभी उनके भीतर छिपी इंसानियत जागी और उसने उन्हें धिक्कारा। वे शीघ्र पुरानी कड़वी यादें भुलाकर नीरज को अस्पताल ले गए। समय पर चिकित्सा मिल जाने से उनकी जान बच गई।

बहनों, मित्रों, सगे-संबंधियों आदि के बीच मतभेद होने स्वाभाविक हैं। इसी प्रकार पड़ोसियों के विचारों में भी भिन्नता हो सकती है। रिश्तेदारों, नातेदारों से भी विचारों का विरोधाभास हो सकता है। इस वजह से कभी-कभी कोई अप्रिय स्थिति बन सकती है। अब इन अप्रिय प्रसंगों की गाँठ बाँध लेना और सारी जिंदगी उन्हें न खोलने में कौन-सी बुद्धिमानी है ? पुरानी कड़वी बातों को भूलने में ही भलाई है। उन अच्छे प्रसंगों को याद क्यों नहीं करते, जो आपने सामने वाले के साथ कभी बिताए थे ? अच्छा सोचेंगे तो अच्छा ही होगा और गलत सोचेंगे, तो झगड़ा बढ़ता ही जाएगा।

समय सबसे बड़ी औषधि है, मरहम है, जो बड़े-से-बड़े घाव को भी भर देता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति उन यादों का क्लेश पालकर बैठ जाए, तो वह चाहे कितने ही जन्म क्यों न ले ले, उसे भुला नहीं पाएगा, इसलिए कड़वी यादों को जितनी जल्दी हो सके, भुला देना ही अच्छा है। कड़वी यादें व्यक्ति को सामान्य जीवन नहीं जीने देतीं। वे उसे तनावग्रस्त बना देती हैं और यही तनाव सभी रोगों की जड़ बनता है।

कड़वी यादों से चिपके रहने में कोई तुक नहीं है। अतीत की कड़वी यादों को संजोकर रखने वाले अपना वर्तमान और भविष्य दोनों ही नष्ट कर लेते हैं। गड़े मुर्दों को उखाड़ने से कोई लाभ नहीं। संबंधों को तोड़ना जितना आसान है, उन्हें जोड़ना उतना ही मुश्किल।

यदि कुछ याद ही रखना है, तो मधुर यादों को संजोकर रखें जो आपको सुखद अनुभूति देंगी। उन अच्छे पलों को याद कीजिए, जो आपने और सामने वाले ने मिलकर जिए हैं। आप पाएँगे कि जीवन वास्तव में बहुत सुंदर है जिसे हमने अपनी कुंठाओं से स्वयं ही बदसूरत बना रखा था। भुला दो पुरानी बातें और ले चलो स्वयं को सुंदर कल की ओर।

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4. आत्मविश्वास बढ़ाइए

हममें से अधिकांश लोग कुछ नया करने की इच्छा रखते हैं पर उसे कर नहीं पाते। तब मन में यही बात आती है कि कितना अच्छा होता कि दुनिया के सफल लोगों की तरह हम भी आत्मविश्वास से भरे हुए होते। अधिकतर लोगों को आत्मविश्वास उनके पारिवारिक और सामाजिक संबंधों से ही प्राप्त होता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हम अपने संबंधों को सकारात्मक बनाएँ।

हमारे जीवन में संबंधों की शुरुआत माता-पिता से होती है और हमारे संबंधों की असफलता और अपूर्णता की जड़ें भी वहीं से शुरू होती हैं। बड़े होकर हम सभी का यह दायित्व बनता है कि हम अपने व्यवहार का आकलन करें। यही नहीं, अपने आसपास के उन लोगों के जीवन और व्यवहार को भी परिपक्व दृष्टिकोण से देखें, जिनसे हमें बचपन में या बाद में भी समस्याएँ मिली हों। इससे न हमें सिर्फ़ दूसरों को समझने का मौका मिलेगा, बल्कि अपने आपको भी हम बचकानी भावुकता से उबार सकते हैं।

पारिवारिक समस्याओं से गुज़रना तो एक ऐसा कटु अनुभव है, जिसे कोई भी पसंद नहीं करता। पर इन समस्याओं से बाहर निकलने के बाद हर व्यक्ति स्वयं को अधिक मज़बूत और आत्मविश्वास से पूर्ण महसूस करता है। यह ज़रूरी है कि हम समस्याओं की अनदेखी न करें। अपना प्रतिरोध या गुस्सा ज़रूर व्यक्त करें।

अधिकांश लोग अपने सामाजिक संबंधों को महत्व नहीं देते। लेकिन हमारे सामाजिक संबंध न सिर्फ हमें सामाजिक सुरक्षा देकर हमारा आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, बल्कि हमें हमारी पहचान भी देते हैं और यह सामाजिक पहचान हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है। अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा करने के लिए अपनी सामाजिक भूमिका को पहचानिए।

हम जब अपनी परेशानियों में अकेले होते हैं, तो बुरी तरह टूट जाते हैं। क्योंकि तब हमें दुनिया में सिर्फ अपनी ही परेशानी दिखलाई देती है। लगता है, बाकी सारी दुनिया मज़े कर रही है। जब हम अपने ध्यान को बाहरी दुनिया पर जमा नहीं पाते, तो घूम-फिरकर हमारा ध्यान हमारी समस्या को कुरेदने लगता है। घर तक ही सीमित रहने वाली पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं की यह प्रमुख समस्या है। इससे उबरने के लिए ज़रूरी है कि वे अच्छे मित्र बनाएँ, जिनसे कि उन्हें अपनी समस्याओं से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया की व्यापक समस्याओं को देखने का भी मौका मिले। जब हम दुनिया की अपने से बड़ी समस्याओं को देखेंगे तो हमारे मन में व्यापकता के भाव उत्पन्न होंगे। इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा, जो हमें हर कठिन काम को भी करने के लिए प्रेरित करेगा।

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5. जिम कार्बेट नेशनल पार्क

हिमालय के पहाड़ और उससे जुड़े तराई के क्षेत्र जैव-विविधता के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। कोलाहल से दूर घने जंगलों में स्वतंत्र विचरण करते जंगली जानवरों को देखना सभी को अच्छा लगता है, लेकिन जानवरों को जंगली वातावरण में देखना मुश्किल और जोखिम भरा कार्य है। जानवरों की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण तथा उनकी संख्या को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ही हिमालय की तराई से लगे उत्तराखंड के पौढ़ी – गढ़वाल और नैनीताल जिले में भारतीय उपमहाद्वीप के पहले राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना की गई।

देश के लंबे-चौड़े क्षेत्र में फैले 18 राष्ट्रीय पार्कों में सबसे चर्चित और विस्तृत इतिहास इस अभयारण्य का रहा है। यद्यपि इसका क्षेत्रफल अन्य कई राष्ट्रीय पार्कों से कम है, परंतु जैव-विविधता तथा उसके संरक्षण में जिम कार्बेट नेशनल पार्क बेहतर ही सिद्ध होता है। यहाँ की विविधतापूर्ण सुंदरता हर आने वाले पर्यटक का मन मोह लेती है। साल वृक्ष से घिरे लंबे-लंबे वनपथ और हरे-भरे घास के विस्तृत मैदान इसके प्राकृतिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं।

समुद्र तल से 400 से 1100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस पार्क का क्षेत्रफल 521 वर्ग किमी० में फैला है। इस पार्क का दो तिहाई क्षेत्र पौड़ी गढ़वाल ज़िले में तथा एक तिहाई क्षेत्र नैनीताल जिले में है। यह पार्क उत्तर में कांडा, मैदावन, चिमटाखाल तक, दक्षिण में ढेला, लालढांग, धारा झरना तक, पूर्व में मोहान, गर्जिया, टिकाला, रामनगर तक तथा पश्चिम में कालगढ़, तुमड़िया और चिपलघाट तक फैला हुआ है। रिज़र्व का पुराना क्षेत्रफल वाला भू-भाग सम्मिलित कर सीमा को आगे तक बढ़ाया गया है। इस पार्क का प्रमुख स्थान ढिकाला मैदानी क्षेत्र है, जबकि सबसे ऊँचाई वाला स्थान कांडा है। गरमियों में जब पार्क क्षेत्र के मैदानी हिस्सों में गरमी का प्रकोप रहता है, तब कांडा में ठंड की सिरहन दौड़ती है।

इस पार्क का इतिहास बताता है कि अंग्रेज़ों ने इन जंगलों की खोज सन 1820 में की थी। इस खोज के साथ ही उन्होंने अपने देश में पाए जाने वाले साल के वृक्ष यहाँ लगाने शुरू किए। भारी मात्रा में यहाँ लगे विविध पेड़ों को काटकर साल के पेड़ लगाए गए। इन पेड़ों के लगने से यहाँ के प्राकृतिक वन्य-जीवन और जानवर बहुत ज्यादा प्रभावित हुए। पहले इसका नाम ‘द हैली नेशनल पार्क’ था, पर आज़ादी के पश्चात् इसका नाम यहाँ बहने वाली नदी के नाम पर ‘द रामगंगा नेशनल पार्क’ कर दिया गया।

इस पार्क की स्थापना में प्रसिद्ध अंग्रेज़ शिकारी जिम कार्बेट की विशेष भूमिका रही और पार्क की स्थापना में उन्होंने एक सलाहकार के रूप में योगदान दिया था। वह अचूक निशानेबाज और प्रकृति-प्रेमी थे, जिनकी शिकार-संबंधी कहानियाँ आज भी समूचे उत्तराखंड में दंतकथाओं की तरह प्रचलित हैं। सन् 1657 में जिम कार्बेट की मृत्यु के बाद इस पार्क का नाम उन्हीं की याद में ‘जिम कार्बेट नेशनल पार्क’ पड़ा और तब से यह इसी नाम से जाना जाता है। वर्षा प्रारंभ होते ही यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता अपने वास्तविक रूप में लौटने लगती है। यहाँ जंगली जीवन पर्याप्त मात्रा में है जिसे इस क्षेत्र की गोद में रहकर देखना अपने आप में ही रोमांचकारी है। प्रतिवर्ष लोग बड़ी संख्या में यहाँ आते हैं और कभी न भूलने वाले अनुभव प्राप्त करते हैं।

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6. प्रातः जागिए और स्वस्थ रहिए

मानव के जीवन में स्वस्थ रहना सबसे बड़ा सुख है। स्वस्थ रहने के लिए मानव को प्राकृतिक नियमों के साथ समन्वय बनाए रखना आवश्यक है। इन्हीं प्राकृतिक समन्वयों में से एक है प्रातः जागना। स्वस्थ रहने के लिए सुबह सवेरे जागना सबसे अच्छा उपाय है। प्रातः काल जगने के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि विश्व के जितने भी महापुरुष हुए हैं, वे सभी नियमित रूप प्रातः काल से जागते रहे हैं।

भारतीय सनातन संस्कृति में भी सूर्योदय से पूर्व उठने को श्रेष्ठ बताया गया है। सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व तक का समय ‘ब्रह्ममुहूर्त’ माना जाता है। यह वह समय होता है जब पूर्व दिशा में सूर्य की हल्की-हल्की लालिमा दिखाई देने लगती है और दो-चार ग्रह-नक्षत्र भी दिखाई देते रहते हैं। इस बेला को ही ‘अमृत बेला’ कहा गया है। इस अमृत बेला में जागने से वास्तव में यह बेला स्वास्थ्य के लिए अमृत का काम करती है।

इस अमृत बेला में ही पशु-पक्षी आदि संसार के समस्त जीव-जंतु जागकर इस अमृत बेला के वास्तविक आनंद का अनुभव करते हैं। ऐसी दशा में यदि इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव आलस्य एवं प्रमादवश सोता हुआ प्रकृति के इस अनमोल उपहार की अवहेलना कर दे तो उसके लिए इससे अधिक लज्जा की बात क्या हो सकती है। सूर्योदय के बाद तक जो लोग सोते रहते हैं, उनकी बुद्धि और इंद्रियाँ मंद पड़ जाती हैं। रोम-रोम में आलस्य भर जाता है एवं मुख की आभा क्षीण हो जाती है। प्रातः काल देर से जगने वाला प्राणी सदैव सुस्त ही बना रहता है।

कहानी में कहा गया है कि जिनके शरीर एवं वस्त्र मैले रहते हैं, दाँतों पर मैल जमा रहता है, बहुत अधिक भोजन करते हैं, सदा कठोर वचन बोलते हैं तथा जो सूर्य के उदय एवं अस्त के समय सोते हैं, वे महादरिद्र होते हैं, यहाँ तक कि चाहे विष्णु भगवान ही क्यों न हों, किंतु उनको भी लक्ष्मी छोड़ जाती हैं।

सूर्योदय तक सोते रहने की हानिकारक आदत का त्याग कर प्रातःकाल जागना चाहिए।

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म-अर्थ का चिंतन करना चाहिए। प्रथम धर्म का चिंतन करना चाहिए यानी अपने मन में ईश्वर का ध्यान करके यह निश्चय करना चाहिए कि हमारे साथ से दिनभर संपूर्ण कार्य धर्मपूर्वक हो। अर्थ के चिंतन से तात्पर्य यह है कि हम दिनभर उद्योग कर ईमानदारी के साथ धनोपार्जन करें, जिससे स्वयं सुखी रहें एवं परोपकार भी कर सकें। शरीर के कष्ट एवं उनके कारणों का चिंतन इसलिए करना चाहिए ताकि स्वस्थ रहा जा सके, क्योंकि आरोग्यता ही सब धर्मों का मूल है। हमें चाहिए कि तरीके के साथ समन्वय स्थापित कर उषाकाल में जागकर स्वास्थ्य लाभ उठाकर दिनभर निर्विघ्न रूप से अपने कार्यों को संपन्न करें।

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7. स्वास्थ्य जीवन

यदि किसी से पूछा जाए कि क्या वह जीवित है तो वह प्रश्न पूछने वाले को पागल समझेगा। आम धारणा है कि जब तक हाथ-पाँव चलते हैं, साँसें चलती हैं तब तक जीवन है। निश्चय ही जीवन तो है पर इस जीवन में वह आनंद कहाँ, जिसके लिए आप जी रहे हैं। एक-दो प्रतिशत लोग ही मान पाएँगे कि वे जीवन का आनंद और सच्चा सुख भोग रहे हैं।

मनुष्य विधाता की सर्वोत्तम रचना है, सभी जड़-चेतन का नियंत्रक है। जो सुख मानव जीवन में संभव है, वह किसी आम जीवन में कठिन है, इसीलिए ऋषि-मुनियों ने मानव जीव को मोक्ष प्राप्ति का साधन माना है। सामान्य मनुष्यों का जीवन में कम से कम कष्टों के साथ अधिकाधिक सुख प्राप्ति का लक्ष्य होता है। सुख की मृग मरीचिका ऐसा मायाजाल है, जिसमें मनुष्य निकल नहीं पाता। जैसे मकड़ी शिकार पकड़ने के लिए जाल बुनती है और वह जाल फैलते फैलते मकड़ी का जीवन ले लेता है।

वे करोड़ों लोग, जिन्हें जीवन उबाऊ और थकाने वाला लगता है, कस्तव में वे जीने योग्य नहीं हैं। वे तो मात्र डॉक्टरों / चिकित्सकों के भरोसे जी रहे हैं। गोलियों, टीकों और इंजेक्शनों के बीच स्वास्थ्य की प्रतिष्ठा भर देख रहे हैं। मनुष्य जब स्वस्थ होता है, तो उसे प्रातः जगने पर, खुली हवा में घूमने, चिड़ियों का कलरव सुनने और प्रकृति की विभिन्न रंगीनियों को देखने में एक रस मिलता है। एक सुखानुभूति होती है। ऐसे व्यक्ति ही वस्तुतः जीवन और जीवित रहने का मूल आनंद ले पाते हैं और अपने अस्तित्व के लिए ईश्वर के आभारी होते हैं।

जिसका मन और इंद्रियाँ अर्थात जिसके सभी शारीरिक मानसिक अंग सुचारु रूप से काम कर रहे हों, वही स्वस्थ है। जीवन का सुख, आनंद वही भोगता है। इनमें से किसी एक अंग में विकार आने पर चिंता उत्पन्न होती है, व्याकुलता बढ़ती है। व्याकुल व्यक्ति व्यथित हो सकता है, सुखी नहीं। आज बीसवीं सदी में औसत व्यक्ति डॉक्टरों के चक्कर लगाते हुए जी रहे हैं। शारीरिक रोग तो सामने से दिखाई देते हैं, मानसिक रोग अदृश्य रूप में जीवन का सत्यानाश करते हैं, किसी ने ठीक ही कहा है –

‘चिंता और चिता में बिंदु मात्र का अंतर है, चिता मरने के बाद जलाती है और चिंता जीवित रहते ही जलाती है।’
निश्चित जीवन जीने वाले अधिक सुखी रहते हैं और उनके जीवन में प्रसन्नता होती है। ऐसे लोग अन्यों की अपेक्षा अधिक कार्यक्षम होते हैं। ऐसे लोगों पर बुढ़ापे के लक्षण धीरे-धीरे आते हैं। हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें तो पाएँगे कि औसत मध्यमवर्गीय व्यक्ति जवानी में ही बूढ़ा दिखने लगता है। इसका कारण यह है कि जीवन की भाग-दौड़ में दिनचर्या इतनी असंतुलित हो जाती है कि शरीर की सभी क्रियाएँ बिगड़ जाती हैं और व्यक्ति क्रमशः रोगों से घिरता जाता है।

जैसे-जैसे स्वास्थ्य लाभ के लिए हम अधिकाधिक औषधियों की तरफ़ भागते हैं वैसे-वैसे ही रोगों के संजाल में फँसते जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे रेशम का कीड़ा अपनी सुरक्षा के लिए कोकून बुनता जाता है और उसी में बंद हो जाता है। प्राकृतिक जीवन-शैली रोगों को मिटाती नहीं है, बल्कि शरीर और मन को ऐसा विकसित करने में सहयोग देती है कि रोग स्वतः समाप्त हो जाते हैं और नए रोग उत्पन्न नहीं होते। प्रकृति की सहायता प्राप्त करने का एकमात्र उपाय प्राकृतिक जीवन शैली है और प्राकृतिक चिकित्सा इस तरफ़ हमको मोड़ती है।

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8. हरे-भरे वृक्ष

वृक्ष का एक नाम तरु भी है। आपदा एवं दुखों से छुटकारा दिलाने वाला होने के कारण वृक्ष को ‘तरु’ यानी तारने वाला कहा जाता है। वृक्ष से मनुष्य सिर्फ़ फल और छाया ही प्राप्त नहीं करता बल्कि जीवनदायिनी हवा भी प्राप्त करता है। फलों से पोषक तत्व प्राप्त करता है और अपने शरीर में सतोगुण की वृद्धि कर शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखता है या रख सकता है। आधुनिक सभ्यता में शहरीकरण के कारण बढ़ती हुई बहुमंजिली इमारतों और कल-कारखानों के निर्माण के कारण हरियाली कम होती जा रही है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से हरे-भरे जंगल कम होते जा रहे हैं और सीमेंट की इमारतों तथा कल-कारखानों के जंगल बढ़ रहे हैं।

इनसे जो प्रदूषण फैल रहा है और पर्यावरण की शुद्धता नष्ट हो रही है, इसे कैसे रोका जाए ? अब भारत में लगभग 19% भू-भाग में ही वृक्षों के वन शेष बचे हैं जिसके परिणामस्वरूप देश के पंद्रह हज़ार किस्म के पेड़-पौधों के विलुप्त होने की आशंका है। वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि हुई है क्योंकि इस विषाक्त गैस को नियंत्रित तथा संतुलित रखने वाले वृक्षों की कमी होती जा रही है। पर्यावरण को शुद्ध रखने, प्राण वायु देने और कार्बन डाइ ऑक्साइड में कमी करने का काम वृक्ष भली-भाँति करते हैं। पृथ्वी की सतह से लगभग 40 किलोमीटर ऊपर वायुमंडल में ओजोन गैस की मोटी परत रहती है जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से जीव-जंतु और वनस्पति के लिए रक्षा-कवच का काम करती है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्ड हटन के अनुसार, वनों के विनाश के कारण वायुमंडल में अतिरिक्त मात्रा में कार्बन डाइ – ऑक्साइड पहुँचकर ओजोन की परत को क्षति पहुँचा रही है। इस पद्धति को कम करने और रोकने के लिए यह ज़रूरी है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस की मात्रा कम की जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो सन 2050 तक ओज़ोन का एक बड़ा भाग नष्ट हो जाएगा जिससे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होगी और कई प्रकार की बीमारियाँ बढ़ने का खतरा पैदा हो जाएगा जिनका समाधान करना इनसान के बस की बात शायद न हो।

वृक्ष की एक उपयोगिता और भी है। आजकल ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते हुए वाहनों, लाउडस्पीकर, कल-कारखानों आदि कई कारणों से ध्वनि प्रदूषण दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है जिनसे व्यक्ति अनिद्रा, स्त्रावयिक दौर्बल्य, अस्थमा, हृदय रोग, उच्च रक्त चाप, अधीरता, चिड़चिड़ापन आदि व्याधियों का शिकार हो रहा है। वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि वृक्ष इस शोर का अवशोषण कर इसकी तीव्रता को उसी प्रकार कम करते हैं जैसे साइलेंसर आवाज़ को कम कर देता है। बढ़ते शोर से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए वृक्षों की संख्या लगातार बढ़ाई जानी चाहिए।

भवनों के निर्माण और कल-कारखानों की स्थापना में लकड़ी की ज़रूरत होती है और यह लकड़ी वृक्षों को काट कर ही प्राप्त की जाती है इसलिए भी वृक्षों की कटाई धड़ल्ले से की जा रही है। यही कारण है कि आज लकड़ी लोहे से महँगी हो गई है। यह बात ठीक है कि इमारती लकड़ी प्राप्त कैसे होगी, लेकिन यह भी आवश्यक है कि वृक्षों की संख्या कम न होने दी जाए। इसके लिए हम क्या कर रहे हैं? यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि हरे-भरे वृक्ष हमारे स्वास्थ्य और जीवन के रक्षक हैं। हम सबको चाहिए कि वृक्षों की रक्षा में तो हम हमेशा सतर्क और सक्रिय रहे हैं, साथ ही वृक्षारोपण करने में भी भरपूर सहयोग प्रदान करें ताकि वृक्षों की कमी न हो।

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9. एड्स का फैलता मकड़जाल

एड्स का प्रेत हमारे देश को ग्रसने को तैयार बैठा है। भारत एड्स पीड़ितों के लिहाज से पहले नंबर का देश बनने वाला है। फिलहाल यह पीड़ादायक अपमान दक्षिणी अफ्रीका के पास है जहाँ एड्स के 53 लाख रोगी हैं। भारत के 51 लाख रोगियों का हाल इस तरह बेहाल है कि वे दक्षिणी अफ्रीका को जल्द ही पछाड़ देंगे। भारत के 27 लाख पैदा होने वाले बच्चों में 27 हज़ार एड्स पीड़ित माताओं के होते हैं और वे जन्म से ही एड्स पाते हैं। एड्स का इलाज अभी तक ढूँढ़ा नहीं जा सका है। यह पक्का है कि ये सारे रोगी ठीक नहीं होंगे और शायद यौन संबंधों, ब्लड सफ्यूजन आदि के कारण औरों को भी बीमार कर जाएँगे।

हमारे देश में जहाँ गरीबी की मार और अंधविश्वासों की बीमारी एड्स से भी ज्यादा गंभीर है, वहाँ रोगियों की देखभाल करना तो दूर उन्हें रोग न फैलाने के लिए सावधान करना भी सरल नहीं है। यह महामारी केवल गरीबों में ही हो, कोई ज़रूरी नहीं। यह समाज के हर वर्ग में हो सकती है क्योंकि कितनी ही बार बाज़ार में पहले इस्तेमाल की हुई सिरिंजें पहुँच जाती हैं। अगर उनमें एड्स के विषाणु जीवित हों तो निर्दोष लोग भी काल के ग्रास बन सकते हैं।

एड्स के बारे में जनजागरण अभियान चलाने वाले ज़्यादातर पैसा अंग्रेज़ी के माध्यमों में प्रचार करने में फूँक रहे हैं जिसका असर लगभग नहीं होता है। समाज में एड्स को छूत का रोग मानकर रोगियों का बहिष्कार किया जाता है। एड्स के रोगियों को अब तिलतिल कर मरना पड़ता है क्योंकि कोई उनसे व्यवहार नहीं रखना चाहता। अस्पतालों ने भी दरवाज़े बंद करने शुरू कर दिए हैं क्योंकि अस्पताल में एड्स के रोगी होने की बात सुनकर दूसरे सब भाग जाते हैं।

हमारे देश में शिक्षित मध्यवर्गीय समाज अभी इस एड्स रूपी मकड़जाल से बचा हुआ है। निम्न वर्ग में जहाँ यह सामान्य होता जा रहा है, वहीं तरह- तरह की समस्याएँ भी पैदा कर रहा है। एड्स के विषाणु वर्षों शरीर में सुप्त पड़े रहते हैं। विवाह के समय माँग करना कि दोनों टेस्ट कराएँ अव्यावहारिक और मानसिक वेदना देने वाला होगा, फिर क्या किया जाए ? एड्स के इलाज पर काफ़ी खोज चल रही है पर इसका कोई सुराग नहीं मिल रहा। पति – पत्नी संबंधों को तो इसने सुदृढ़ कर दिया पर जो लोग जोखिम लेने के आदी हैं उनकी वजह से उनका पूरा परिवार झंझावात में आ सकता है। इस बीमारी के बारे में सतर्क रहना अब सबके लिए ज़रूरी हो गया है। यह अनैतिक संबंधों से ही नहीं, खून लेने पर भी हो सकती है क्योंकि पेशेवर खून दान करने वाले प्रायः एड्स के शिकार होते हैं।

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10. भारी बस्तों के बोझ से दबता बचपन

वर्तमान युग प्रतियोगिताओं एवं प्रतिस्पर्धाओं का युग है। इस युग में प्रत्येक मनुष्य प्रतिस्पर्धात्मक रूप से कर्म कर रहा है। इसी तरह आज की स्कूली शिक्षा भी प्रतिस्पर्धा से ओत-प्रोत है। इसी कारण आज नर्सरी से ही बच्चों पर भारी बस्तों का बोझ बढ़ जाता है। स्कूलों में भी इतनी प्रतिस्पर्धा है कि हर स्कूल अपने बच्चों के लिए भारी से भारी पुस्तकें लगवाना चाहता है। इसी कारण बच्चों के बस्तों का बोझ बढ़ जाता है और धीरे-धीरे इसी बोझ से बचपन भी दबता जा रहा है। जो बचपन हँसने, खेलने, मौज-मस्ती के लिए होता है। वह बचपन आज भारी बस्तों के बोझ से दबने के कारण हँसना, खेलना, कूदना भूल गया है। भारी बस्तों ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है। की नैसर्गिकता खत्म होती जा रही है। यदि ऐसा ही होता रहा तो एक दिन बचपन अवश्य ही दबकर रह जाएगा।

11. बाढ़ से जूझते गाँव

पर्यावरण-प्रदूषण, वन-कटाव, ग्लोबल वार्मिंग आदि के कारण पर्यावरण में नित्य परिवर्तन हो रहे हैं। इनमें से एक है बाढ़। बाढ़ प्रकृति की भयावहता एवं विकरालता का प्रतीक है जिससे हमारे देश के गाँव निरंतर जूझ रहे हैं। देश में प्रतिवर्ष ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि किसी राज्य में बाढ़ से सैकड़ों गाँव जूझ रहे हैं। हर वर्ष हज़ारों गाँव बाढ़ के पानी में डूब जाते हैं। जहाँ का जनमानस अनथक संघर्ष करता है। इन बाढ़-पीड़ित गाँवों में सबकुछ स्वाहा हो जाता है। जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। हज़ारों मवेशी बाढ़ की भेंट चढ़ जाते हैं। गाँव-के-गाँव पानी में डूब जाते हैं। ग्रामीण भूखे नंगे रहकर जूझते रहते हैं और एक-दूसरे का सहारा बनने का प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं बाढ़ के पश्चात जब गाँव में हैजा – प्लेग, टीबी, मलेरिया आदि भयानक बीमारियाँ फैल जाती हैं जब गाँव पहले की अपेक्षा कहीं ज़्यादा संघर्ष करता है। इस प्रकार बाढ़ से जन-जीवन जूझता रहता है।

CBSE Class 12 Hindi Elective रचना नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन

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CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन

प्रश्न 1.
रटंत से क्या अभिप्राय है ? इसे बुरी लत (कुटेव) क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
रटंत से अभिप्राय किसी दूसरे द्वारा तैयार की गई पठनीय सामग्री को ज्यों-का-त्यों दूसरों के सामने प्रस्तुत करना। यह एक बुरी लत (कुटेव) है क्योंकि जिस विद्यार्थी या व्यक्ति को यह लत लग जाती है तो उसके भावों की मौलिकता खत्म हो जाती है। वह किसी विषय को अपने तरीके से सोचने की क्षमता खो देता है। वह सदा दूसरों के लिखे पर ही आश्रित रहने लगता है। लिखना एक कला है और इस कला में निपुणता तभी हासिल की जा सकती है जब लेखक रटंत पर निर्भर न हो। रटंत (कुटेव) के शिकार व्यक्ति को असली अभ्यास का मौका नहीं मिलता। यह भी सर्वमान्य है कि कला को माँजने के लिए अभ्यास सबसे ज़रूरी होता है। इसलिए विद्यार्थी अथवा लेखक को रटंत की बुरी लत से बचना चाहिए।

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प्रश्न 2.
अभिव्यक्ति के अधिकार में निबंधों के नए विषय किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं ? विवेचना कीजिए।
उत्तर
निबंध एक विचार होता है। निबंधकार अपने विचारों को निबंध विधा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। विचार अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया निबंधों के पुराने विषयों के साथ पूर्णतः घटित नहीं होती। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पुराने विषयों पर तैयार शुद्ध सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहती है। लेखक कुछ नया सोचने की बजाए उसी सामग्री को उलट-पलट कर लिखता रहता है।

मौलिक प्रयास और अभ्यास को बाधितकरने वाली यह निर्भरता हमारे अंदर लिखित अभिव्यक्ति की क्षमता को विकसित नहीं होने देती। निबंधकार की सोच आगे नहीं बढ़ पाती। उसके विचार रुक से जाते हैं। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम निबंध के परंपरागत एवं बासी विषयों को छोड़कर नए-नए विषयों पर विचार प्रकट करें और लिखने का प्रयास करें। यही अभ्यास हमें अपने मौलिक अधिकार अभिव्यक्ति के अधिकार का सही प्रयोग कर पाने में सहायक सिद्ध होगा।

प्रश्न 3.
नए तथा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
किसी नए अथवा अप्रत्याशित विषय पर कम समय में अपने विचारों को संकलित कर उन्हें सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करना ही अप्रत्याशित विषयों पर लेखन कहलाता है। जिन विचारों को कह देना सरल होता है, उन्हें लिख डालना अत्यंत चुनौती भरा कार्य होता है। इसका कारण यह है कि सामान्य तौर पर व्यक्ति आत्मनिर्भर होकर अपने विचारों को लिखित रूप देने का अभ्यास नहीं करता है।

प्रायः सभी में दूसरों के द्वारा तैयार की गई सामग्री को याद करके ज्यों-का-त्यों पुनः प्रस्तुत करने की आदत होती है। कई बार अपने विचारों को मौखिक ढंग से व्यक्त करना बहुत सरल होता है किंतु उसे लिखित रूप देना बहुत मुश्किल होता है। उदाहरणस्वरूप किसी फ़िल्म को सिनेमाघर में देखने के बाद अपने मित्रों से उसकी चर्चा करना बहुत सरल होता है लेकिन यदि अपने विचारों को लिखने बैठा जाए तो बहुत मुश्किल लगता है।

इसी प्रकार सिनेमाघर में टिकट खिड़की पर टिकट लेना, उस समय होनेवाली धक्का-मुक्की और सिनेमाघर के पास लगे खाने-पीने की चीजों के सुंदर स्टॉल हमारी चर्चा का तो विषय बन जाते हैं परंतु अपने उन अनुभवों को काग़ज़ पर लिखना बहुत कठिनाई भरा होता है। इसी प्रकार के विषय नए और अप्रत्याशित विषयों के अंतर्गत आते हैं।

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प्रश्न 4.
नए तथा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में क्या बाधाएँ आती हैं ?
उत्तर :
भाषा के माध्यम से किसी विषय पर विचार करना और उस विचार को व्याकरणिक शुद्धता के साथ सुसंगठित रूप में अभिव्यक्त करना लेखन कहलाता है। सभी मनुष्यों को संविधान के द्वारा मौलिक अधिकारों के अंतर्गत अभिव्यक्ति का अधिकार दिया गया है किंतु अधिकतर लोग उसका प्रयोग अपनी लेखन क्षमता के अभाव के कारण नहीं कर पाते हैं। सामान्य तौर पर मनुष्य कुछ भी नया सोचने और लिखने का अभ्यास ही नहीं करता है।

वर्तमान में लगभग सभी विषयों पर तैयार सामग्री सरलता से उपलब्ध हो जाती है। व्यक्ति में मौलिक प्रयास एवं अभ्यास करने की प्रवृत्ति का निरंतर अभाव होता जा रहा है। यही कारण है कि जब किसी नए विषय पर कुछ लिखना पड़ जाए तो बड़ा कठिन लगता है। अप्रत्याशित विषय पर लेखन में आनेवाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए आवश्यक है कि परंपरागत विषयों को छोड़कर नए तरह के विषयों पर लिखने का निरंतर अभ्यास किया जाए।

प्रश्न 5.
नए तथा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन को किस प्रकार सरल बनाया जा सकता है ?
उत्तर :
नए तथा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन को सरल बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान करना चाहिए –

  1. किसी भी विषय पर लिखने से पूर्व अपने मन में उस विषय से संबंधित उठने वाले विचारों के आधार पर एक रूपरेखा तैयार करें। उसके पश्चात ही शानदार ढंग से अपने विषय की शुरुआत करें।
  2. विषय को आरंभ करने के साथ ही उस विषय को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाए, यह भी मस्तिष्क में पहले से होना आवश्यक है।
  3. जिस विषय पर लिखा जा रहा है, उस विषय से जुड़े अन्य तथ्यों की जानकारी होना भी बहुत आवश्यक है। सुसंबद्धता किसी भी लेखन का बुनियादी तत्व होता है।
  4. सुसंबद्धता के साथ-साथ विषय से जुड़ी जानकारियों का सुसंगत होना भी जरूरी होता है। अतः किसी भी विषय पर लिखते हुए दो बातों का आपस में जुड़े होने के साथ-साथ उनमें तालमेल होना भी आवश्यक होता है।
  5. नए तथा अप्रत्याशित विषयों के लेखन में आत्मपरक ‘मैं’ शैली का प्रयोग किया जा सकता है। यद्यपि निबंधों और अन्य आलेखों में ‘मैं’ शैली का प्रयोग लगभग वर्जित होता है किंतु नए विषय पर लेखन में ‘मैं’ शैली के प्रयोग से लेखक के विचारों और उसके व्यक्तित्व को झलक प्राप्त होती है।

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प्रश्न 6.
‘अक्ल बड़ी या भैंस’ विषय पर एक लेख लिखिए।
उत्तर :
दुनिया मानती है और जानती है कि महात्मा गांधी जैसे दुबले-पतले महापुरुष ने बिना अस्त्र-शस्त्रों के स्वतंत्रता संग्राम लड़ा था। उनके हथियार तो केवल सत्य और अहिंसा थे। जिस कार्य को शारीरिक बल न कर सका, उसे बुद्धि-बल ने कर दिखाया। इसी कारण यह कहावत प्रसिद्ध है कि अक्ल बड़ी या भैंस। केवल शारीरिक बल होने से कोई लाभ नहीं हुआ करता। महाभारत के युद्ध में भीम और उसके पुत्र घटोत्कच ने अपनी शारीरिक शक्ति के बल पर बहुत-से कौरवों को मार गिराया किंतु उनकी शक्ति को भी दिशा-निर्देश देने वाली श्रीकृष्ण की बुद्धि ही थी।

नेपोलियन, लेनिन तथा मुसोलिनी जैसे महान व्यक्तियों ने भी बुद्धि के बल पर ही सफलताएँ अर्जित की थीं। राजनीति, समाज, धर्म, दर्शन, विज्ञान और साहित्य – आज लगभग हर क्षेत्र में बुद्धि बल का ही महत्व है। पंचतंत्र की एक कहानी से भी इस कथन की पुष्टि हो जाती है कि शारीरिक बल से अधिक महत्व बुद्धि का होता है। इस कहानी में एक छोटा-सा खरगोश शक्तिशाली शेर को एक कुएँ के पास ले जाकर उससे कुएँ में छलाँग लगवाकर उसे मार डालता है। अपनी बुद्धि के बल पर ही उस नन्हे से खरगोश ने खूँखार शेर से केवल अपनी ही नहीं अपितु जंगल के अन्य प्राणियों की भी रक्षा की थी। अतः शारीरिक शक्ति की अपेक्षा हमारे जीवन में बुद्धि का अधिक महत्व है।

पाठ से संवाद –

प्रश्न 1.
अधूरे वाक्यों को अपने शब्दों से पूरा करें –
हम नया सोचने-लिखने का प्रयास नहीं करते क्योंकि …………..
लिखित अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास नहीं होता क्योंकि ………
हमें विचार-प्रवाह को थोड़ा नियंत्रित रखना पड़ता है क्योंकि ……….
लेखन के लिए पहले उसकी रूपरेखा स्पष्ट होनी चाहिए क्योंकि ………
लेख में ‘मैं’ शैली का प्रयोग होता है क्योंकि ………..
उत्तर :
हम नया सोचने-लिखने का प्रयास नहीं करते क्योंकि हमें आत्म-निर्भर होकर लिखित रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करने का अभ्यास नहीं होता है।
लिखित अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास नहीं होता क्योंकि हम कुछ नया सोचने-लिखने का प्रयास करने के स्थान पर किसी विषय पर पहले से उपलब्ध सामग्री पर निर्भर हो जाते हैं।
हमें विचार – प्रवाह को थोड़ा नियंत्रित रखना पड़ता है क्योंकि विचारों को नियंत्रित करने से ही हम जिस विषय पर लिखने जा रहे हैं उसका विवेचन उचित रूप से कर सकेंगे।
लेखन के लिए पहले उसकी रूपरेखा स्पष्ट होनी चाहिए क्योंकि जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि हमने क्या और कैसे लिखना है हम अपने विषय को सुसंबद्ध और सुसंगत रूप से प्रस्तुत नहीं कर सकते।
“लेख में ‘मैं’ शैली का प्रयोग होता है क्योंकि लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने होते हैं और लेख पर लेखक के अपने व्यक्तित्व की छाप होती है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित विषयों पर दो से तीन सौ शब्दों में लेख लिखिए –
झरोखे से बाहर
सावन की पहली झड़ी
इम्तहान के दिन
दीया और तूफ़ान
मेरे मुहल्ले का चौराहा
मेरा प्रिय टाइम पास
एक कामकाज़ी औरत की शाम
उत्तर :

1. झरोखे से बाहर

झरोखा भीतर से बाहर की ओर झाँकने का माध्यम और बाहर से भीतर देखने का रास्ता है – हमारी आँखें भी तो झरोखा ही हैं। ये मन-मस्तिष्क को संसार से और संसार को मन-मस्तिष्क से जोड़ने का माध्यम मन रूपी झरोखे से किसी भक्त को संसार के कण-कण में बसनेवाले ईश्वर के दर्शन होते हैं तो मन रूपी झरोखे से ही किसी डाकू लुटेरे को किसी धनी सेठ की धन-संपत्ति दिखाई देती है जिसे लूटने के प्रयत्न में वह हत्या जैसा जघन्य कार्य करने में तनिक नहीं झिझकता। झरोखा स्वयं कितना छोटा-सा होता है पर उसके पार बसने वाला संसार कितना व्यापक है जिसे देख तन-मन की भूख जाग जाती है और कभी-कभी शांत भी हो जाती है।

किसी पर्वतीय स्थल पर किसी घर के झरोखे से गगन चुंबी पर्वत मालाएँ, ऊँचे-ऊँचे पेड़, गहरी-हरी घाटियाँ, डरावनी खाइयाँ यदि पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं तो दूर-दूर तक घास चरती भेड़-बकरियाँ, बाँसुरी बजाते चरवाहे, पीठ पर लंबे टोकरे बाँधकर इधर-उधर जाते सुंदर पहाड़ी युवक-युवतियाँ मन को मोह लेते हैं। राजस्थानी महलों के झरोखों से दूर-दूर फैले रेत के टीले कुछ अलग ही रंग दिखाते हैं। गाँवों में झोंपड़ों के झरोखों के बाहर यदि हरे-भरे खेत लहलहाते दिखाई देते हैं तो कूड़े के ऊँचे-ऊँचे ढेर भी नाक पर हाथ रखने को मज़बूर कर देते हैं।

झरोखे कमरों को हवा ही नहीं देते बल्कि भीतर से ही बाहर के दर्शन करा देते हैं। सजी-सँवरी दुल्हन झरोखे के पीछे छिप कर यदि अपने होने वाले पति की एक झलक पाने को उतावली रहती है तो कोई विरहनी अपनी नज़रें बिछाए झरोखे पर ही आठों पहर टिकी रहती है। माँ अपने बेटे के आगमन की इंतज़ार झरोखे पर टिककर करती है। झरोखे तो तरह-तरह के होते हैं पर झरोखों के पीछे बैठ प्रतीक्षारत आँखों में सदा एक ही भाव होता है – कुछ देखने का, कुछ पाने का। युद्ध भूमि में मोर्चे पर डटा जवान भी तो खाई के झरोखे से बाहर छिप-छिपकर झाँकता है – अपने शत्रु को गोली से उड़ा देने के लिए। झरोखे तो छोटे-बड़े कई होते हैं पर उनके बाहर के दृश्य तो बहुत बड़े होते हैं जो कभी-कभी आत्मा तक को झकझोर देते हैं।

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2. सावन की पहली झड़ी

पिछले कई दिनों से हवा में घुटन – सी बढ़ गई थी। बाहर तपता सूर्य और सब तरफ़ हवा में नमी की अधिकता जीवन दूभर बना रही थी। बार-बार मन में भाव उठता कि हे भगवान, कुछ तो दया करो। न दिन में चैन और न रात को आँखों में नींद-बस गरमी – ही – गरमी, पसीना – ही पसीना। रात को बिस्तर पर करवटें लेते-लेते पता नहीं कब आँख लग गई। सुबह आँखें खुलीं तो अहसास हुआ कि खिड़कियों से ठंडी हवा भीतर आ रही है। उठकर खिड़की से बाहर झाँका तो मन खुशी से झूम उठा। आकाश तो काले बादलों से भरा हुआ था।

आकाश में कहीं नीले रंग की झलक नहीं। सूर्य देवता बादलों के पीछे पता नहीं कहाँ छिपे हुए थे। पक्षी पेड़ों पर बादलों के स्वागत में चहचहा रहे थे। मुहल्ले से सारे लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकल मौसम के बदलते रंग को देख रहे थे। उमड़ते-घुमड़ते मस्त हाथियों से काले-कजरारे बादल मन में मस्ती भर रहे थे। अचानक बादलों में तेज़ बिजली कौंधी ज़ोर से बादल गरजे और मोटी-मोटी कुछ बूँदें टपकीं। कुछ लोग इधर-उधर भागे ताकि अपने-अपने घरों में बाहर पड़ा सामान भीतर रख लें। पलभर में ही बारिश का तेज़ सर्राटा आया और फिर लगातार तेज़ बारिश शुरू हो गई।

महीनों से प्यासी धरती की प्यास बुझ गई। पेड़-पौधों के पत्ते नहा गए। उनका धूल-धूसरित चेहरा धुल गया और हरी-भरी दमक फिर से लौट आई। छोटे-छोटे बच्चे बारिश में नहा रहे थे, खेल रहे थे, एक-दूसरे पर पानी उछाल रहे थे। कुछ ही देर में सड़कें गलियाँ छोटे-छोटे नालों की तरह पानी से भर-भरकर बहने लगी थीं। कल रात तक दहकने वाला दिन आज खुशनुमा हो गया था। तीन-चार घंटे बाद बारिश की गति कुछ कम हुई और फिर पाँच-दस मिनट के लिए बारिश रुक गई। लोग बाहर निकलें इससे पहले फिर से बारिश शुरू हो गई- कभी धीमी तो कभी तेज़।

सुबह से शाम हो गई है पर बादलों का अँधेरा उतना ही है जितना सुबह था। रिमझिम बारिश हो रही है। घरों की छतों से पानी पनालों से बह रहा है। मेरी दादी अभी कह रही थी कि आज शनिवार को बारिश की झड़ी लगी है। यह तो अगले शनिवार तक ऐसे ही रहेगी। भगवान करे ऐसा ही हो। धरती की प्यास बुझ जाए और हमारे खेत लहलहा उठें।

3. इम्तहान के दिन

बड़े-बड़े भी काँपते हैं इम्तिहान के नाम से। इम्तहान छोटों का हो या बड़ों का, पर यह डराता सभी को है। दो वर्ष पहले जब दसवीं की बोर्ड परीक्षा हमें देनी थी तब सारा वर्ष स्कूल में हमें बोर्ड परीक्षा नाम से डराया गया था और घर में भी इसी नाम से धमकाया जाता था। मन ही मन हम इसके नाम से भी डरा करते थे कि पता नहीं, इस बार इम्तहान में क्या होगा। सारा वर्ष अच्छी तरह पढ़ाई की थी, बार-बार टेस्ट दे-देकर तैयारी की थी पर इम्तहान के नाम से भी डर लगता था। जिस दिन इम्तहान का दिन था, उससे पहली रात मुझे तो बिलकुल नींद नहीं आई।

पहला प्रश्न-पत्र हिंदी का था और विषय पर मेरी अच्छी पकड़ थी पर ‘इम्तहान’ का भूत सिर पर इस प्रकार सवार था कि नीचे उतरने का नाम ही नहीं लेता था। सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार हुआ। स्कूल – बस में सवार हुआ तो हर रोज़ हो-हल्ला करने वाले साथियों के हाथों में पकड़ी पुस्तकें और उनकी झुकी हुई आँखों ने मुझे और अधिक डराया। सबके चेहरों पर खौफ़ – सा छाया था। खिलखिलाने वाले चेहरे आज सहमे हुए थे। मैंने भी मन ही मन अपने पाठों को दुहराना चाहा पर ऐसा लगा कि मुझे तो कुछ भी याद ही नहीं। सब कुछ भूलता-सा प्रतीत हो रहा था।

मैंने भी अपनी पुस्तक खोली। पुस्तक देखते ही ऐसा लगा कि मुझे तो यह आती है। खैर, स्कूल पहुँच अपनी जगह पर बैठे। प्रश्न-पत्र मिला, आसान लगा। ठीक समय पर पूरा प्रश्न-पत्र हल हो गया। जब बाहर निकले तो सभी प्रसन्न थे। पर साथ ही चिंता आरंभ हो गई अगले पेपर की। अगला पेपर गणित का था। चाहे दो छुट्टियाँ थीं, पर ऐसा लगता था कि ये तो बहुत कम हैं। वह पेपर भी बीता, पर चिंता समाप्त नहीं हुई। पंद्रह दिन में सभी पेपर खत्म हुए पर ये सारे दिन बहुत व्यस्त रहे थे। इन दिनों न तो भूख लगती थी और न खेलने की इच्छा होती थी। इन दिनों न तो मैं अपने किसी मित्र के घर गया और न ही मेरे किसी मित्र को मेरी सुध आई। इम्तहान के दिन बड़े तनाव भरे थे।

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4. दीया और तूफ़ान

मिट्टी का बना हुआ एक नन्हा सा दीया जब जलता है तो रात्रि के अंधकार से लड़ता हुआ उसे दूर भगा देता है। अपने आस-पास हल्का-सा उजाला फैला देता है। जिस अंधकार में हाथ को हाथ नहीं सूझता उसे भी दीया अपना मंद प्रकाश फैलाकर रास्ता दिखा देता है। हवा का हलका-सा झोंका जब दीये की को कँपा देता है तब ऐसा लगता है कि इसके बुझते ही अंधकार फिर छा जाएगा और फिर हमें उजाला कैसे मिलेगा ? दीया चाहे छोटा-सा होता है पर वह अकेला अंधकार के संसार का सामना कर सकता है तो हम इस इंसान जीवन की राह में आने वाली कठिनाइयों का भी उसी की तरह मुकाबला क्यों नहीं कर सकते ? यदि वह तूफ़ान का सामना करके अपनी टिमटिमाती लौ से प्रकाश फैला सकता है तो हम भी हर कठिनाई में कर्मठ बनकर संकटों के घेरों से निकल सकते हैं।

महाराणा प्रताप ने सब कुछ खोकर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की ठानी थी। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नन्हें-से दीये के समान जीवन की कठोरता का सामना किया था और विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र भारत का प्रधानमंत्री पद प्राप्त कर लिया था। हमारे राष्ट्रपति कलाम ने अपना जीवन टिमटिमाते दीये के समान आरंभ किया था पर आज वही दीया हमारे देश को मिसाइलें प्रदान करने वाला प्रचंड अग्नि- पुंज है। उसने देश को जो शक्ति प्रदान की है वह स्तुत्य है। समुद्र में एक छोटी-सी नौका ऊँची-तूफ़ानी लहरों से टकराती हुई अपना रास्ता बना लेती है और अपनी मंज़िल पा लेती है।

एक छोटा-सा प्रवासी पक्षी साइबेरिया से उड़कर हज़ारों-लाखों मील दूर पहुँच सकता है तो हम इंसान भी कठिन से कठिन मंज़िल प्राप्त कर सकते हैं। अकेले अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में कौरवों जैसे महारथियों का डट कर सामना किया था। कभी-कभी तूफान अपने प्रचंड वेग से दीये की लौ को बुझा देता है पर जब तक दीया जगमगाता है तब तक तो अपना प्रकाश फैलाता है और अपने अस्तित्व को प्रकट करता है। मिटना तो सभी को है एक दिन। मनुष्य को चाहिए कि वह कठिनाइयों से डरकर छिपा न रहे और डट कर उनका मुकाबला करे। श्रेष्ठ मनुष्य वही है जो दीये के समान जगमगाता हुआ तूफ़ानों की परवाह न करे और अपनी रोशनी से संसार को उजाला प्रदान करता रहे।

5. मेरे मोहल्ले का चौराहा

मोहल्ले की सारी गतिविधियों का केंद्र मेरे घर के पास का चौराहा है। नगर की चार प्रमुख सड़कें यहाँ से गुज़रती हैं इसलिए इस पर हर समय हलचल बनी रहती है। पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली सड़क रेलवे स्टेशन की ओर से आती है और मुख्य बाज़ार की तरफ़ जाती है जिसके आगे औद्योगिक क्षेत्र हैं। रेलवे स्टेशन से आने वाले यात्री और मालगाड़ियों से उतरा सामान ट्रकों में भर इसी से गुज़रकर अपने – अपने गंतव्य पर पहुँचता है। उत्तर से दक्षिण की तरफ जाने वाली सड़क मॉडल टाउन और बस स्टैंड से गुज़रती है। इस पर दो सिनेमा हॉल तथा अनेक व्यापारिक प्रतिष्ठान बने हैं जहाँ लोगों का आना-जाना लगा रहता है।

चौराहे पर फलों की रेहड़ियाँ, कुछ सब्ज़ी बेचने वाले, खोमचे वाले तो सारा दिन जमे ही रहते हैं। चूँकि चौराहे के आसपास घनी बस्ती है इसलिए लोगों की भीड़ कुछ न कुछ खरीदने के लिए यहाँ आती ही रहती है। सुबह-सवेरे स्कूल जाने वाले बच्चों से भरी रिक्शा और बसें जब गुज़रती हैं तो भीड़ कुछ अधिक बढ़ जाती है। कुछ रिक्शाओं में तो नन्हें-नन्हें बच्चे गला फाड़कर चीखते-चिल्लाते सबका ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। चौराहे पर लगभग हर समय कुछ आवाग मजनूँ छाप भी मँडराते रहते हैं जिन्हें ताक-झाँक करते हुए पता नहीं क्या मिलता है। मैंने कई बार पुलिस के द्वारा उनकी वहाँ की जाने वाली पिटाई भी देखी है पर इसका उन पर कोई विशेष असर नहीं होता। वे तो चिकने घड़े हैं। कुछ तो दिन भर नीम के पेड़ के नीचे घास पर बैठ ताश खेलते रहते हैं। मेरे मुहल्ले का चौराहा नगर में इतना प्रसिद्ध है कि मुहल्ले और आस-पास की कॉलोनियों की पहचान इसी से है।

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6. मेरा प्रिय टाइम-पास

आज के आपाधापी से भरे युग में किस के पास फ़ालतू समय है। फिर भी हम लोग मशीनी मानव तो नहीं हैं। कभी-कभी अपने लिए निर्धारित काम-धंधों के अतिरिक्त हम कुछ और भी करना चाहते हैं। इससे मन सुकून प्राप्त करता है और लगातार काम करने से उत्पन्न बोरियत दूर होती है। हर व्यक्ति की पसंद अलग होती है इसलिए उसका टाइम-पास का तरीका भी अलग होता है। किसी का टाइम-पास सोना है तो किसी का टी० वी० देखना, किसी का सिनेमा देखना तो किसी का उपन्यास पढ़ना, किसी का इधर-उधर घूमना तो किसी का खेती-बाड़ी करना।

मेरा प्रिय टाइम पास विंडो शॉपिंग है। जब कभी काम करते-करते मैं ऊब जाता हूँ और मन कोई काम नहीं करना चाहता तब मैं तैयार होकर घर से बाहर बाज़ार की ओर निकल जाता हूँ – विंडो – शॉपिंग के लिए। जिस नगर में मैं रहता हूँ वह काफ़ी बड़ा है। बड़े-बड़े बाज़ार, शॉपिंग मॉल्ज और डिपार्टमेंटल स्टोर्स की संख्या काफ़ी है। दुकानों की शो- विंडोज़ सुंदर ढंग से सजे-सँवरे सामान से ग्राहकों को लुभाते रहते हैं।

नए-नए उत्पाद, सुंदर कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स का नया सामान, तरह-तरह के खिलौने, सजावटी सामान आदि इनमें भरे रहते हैं। मैं इन सजी-सँवरी दुकानों की शो- विंडोज़ को ध्यान से देखता हूँ, मन ही मन खुश होता हूँ, उनकी सुंदरता और उपयोगिता की सराहना करता हूँ। जिस वस्तु को मैं खरीदने की इच्छा करता हूँ उसके दाम का टैग देखता हूँ और मन में सोच लेता हूँ कि मैं इसे तब खरीद लूँगा जब मेरे पास अतिरिक्त पैसे होंगे। ऐसा करने से मेरी जानकारी बढ़ती है। नए-नए उत्पादों से संबंधित ज्ञान बढ़ता है और मन नए सामान को लेने की तैयारी करता है और इसलिए मस्तिष्क और अधिक परिश्रम करने के लिए तैयार होता है। टाइम-पास की मेरी यह विधि उपयोगी है, और सार्थक है, जो परिश्रम करने की प्रेरणा देती है, ज्ञान बढ़ाती है और किसी का कोई नुकसान भी नहीं करती।

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7. एक कामकाजी औरत की शाम

हमारे देश में मध्यवर्गीय परिवारों के लिए अति आवश्यक हो चुका है कि घर-परिवार को ठीक प्रकार से चलाने के लिए पति-पत्नी दोनों धन कमाने के लिए काम करें और इसीलिए समाज में कामकाजी औरतों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। कामकाजी औरत की जिंदगी पुरुषों की अपेक्षा कठिन है। वह घर- बाहर एक साथ संभालती है। उसकी शाम तभी आरंभ हो जाती है जब वह अपने कार्यस्थल से छुट्टी के बाद बाहर निकलती है। वह घर पहुँचने से पहले ही रास्ते में बाज़ार से फल-सब्ज़ियाँ खरीदती है, छोटा-मोटा किरयाने का सामान लेती है और लदी-फदी घर पहुँचती है।

तब तक पति और बच्चे भी घर पहुँच चुके होते हैं। दिन-भर की थकी- हारी औरत कुछ आराम करना चाहती है पर उससे पहले चाय तैयार करती है। यदि वह औरत संयुक्त परिवार में रहती है तो कुछ और तैयार करने की फरमाइशें भी उसे पूरी करनी पड़ती हैं। चाय पीते-पीते वह बच्चों से, बड़ों से बातचीत करती है। यदि उस समय कोई घर में मिलने-जुलने वाला आ जाता है तो सारी शाम आगंतुकों की सेवा में बीत जाती है।

लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो भी उसे फिर से बाज़ार या कहीं और जाना पड़ता है ताकि घर के लोगों की फरमाइशों को पूरा कर सके। लौटकर बच्चों को होमवर्क करने में सहायता देती है और फिर रात के खाने की तैयारी में लग जाती है। कभी-कभी उसे आस-पड़ोस के घरों में भी औपचारिकतावश जाना पड़ता है। कामकाजी औरत तो चक्करघिन्नी की तरह हर पल चक्कर ही काटती रहती है। उसकी शाम अधिकतर दूसरों की फ़रमाइशों को पूरा करने में बीत जाती है। वह हर पल चाहती है कि उसे भी घर में रहने वाली औरतों के समान कभी शाम अपने लिए मिले पर प्रायः ऐसा हो नहीं पाता, क्योंकि कामकाज़ी औरत का जीवन तो घड़ी की सुइयों से बँधा होता है।

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प्रश्न 3.
घर से स्कूल तक के सफ़र में आज आपने क्या-क्या देखा और अनुभव किया ? लिजिए और अपने लेख को एक अच्छा-सा शीर्षक भी दीजिए।
उत्तर :

संवेदनाओं की मौत

मैं घर से अपने विद्यालय जाने के लिए निकली। आज मैं अकेली ही जा रही थी क्योंकि मेरी सखी नीलम को ज्वर आ गया था। मेरा विद्यालय मेरे घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। रास्ते में बस स्टैंड भी पड़ता है। वहाँ से निकली तो बसों का आना-जाना जारी था। मैं बचते-बचाते निकल ही रही थी कि मेरे सामने ही एक बस से टकरा कर एक व्यक्ति बीच सड़क पर गिर गया। मैं किनारे पर खड़ी होकर देख रही थी कि उस गिरे हुए व्यक्ति को उठाने कोई भी नहीं आ रहा। मैं साहस करके आगे जा ही रही थी कि एक बुजुर्ग ने मुझे रोक कर कहा, “बेटी ! कहाँ जा रही हो ? वह तो मर गया है। हाथ लगाओगी तो पुलिस के चक्कर में पड़ जाओगी।” मैं घबरा कर पीछे हट गई और सोचते-सोचते विद्यालय पहुँच गई कि हमें क्या हो गया है जो हम किसी के प्रति हमदर्दी भी नहीं दिखा सकते, किसी की सहायता भी नहीं कर सकते ?

प्रश्न 4.
अपने आस-पास की किसी ऐसी चीज़ पर एक लेख लिजिए, जो आप को किसी वजह से वर्णनीय प्रतीत होती हो। वह कोई चाय की दुकान हो सकती है, कोई सैलून हो सकता है, कोई खोमचे वाला हो सकता है या किसी खास दिन पर लगने वाला हाट – बाज़ार हो सकता है। विषय का सही अंदाज़ा देने वाला शीर्षक अवश्य दीजिए।
उत्तर :

पानी के नाम पर बिकता ज़हर

जेठ की तपती दोपहरी। पसीना, उमस और चिपचिपाहट ने लोगों को व्याकुल कर दिया था। गला प्यास से सूखता है तो मन सड़क के किनारे खड़ी ‘रेफ्रीजरेटर कोल्ड वाटर’ की रेहड़ी की ओर चलने को कहता है। प्यास की तलब में पैसे दिए और पानी पिया। पर कभी सोचा नहीं कि इन रेहड़ी की टंकियों की क्या दशा है ? क्या इन्हें कभी साफ़ भी किया जाता है ? क्या इनमें वास्तव में रेफ्रीजरेटर कोल्ड वाटर है या पानी में बर्फ़ डाली हुई है ? कहीं हम पैसे देकर पानी के नाम पर ज़हर तो नहीं पी रहे ? इन कोल्ड वाटर बेचने वालों के ‘वाटर’ की जाँच स्वास्थ्य विभाग का कार्य है परंतु वे तो तब तक नहीं जागते हैं जब तक इनके दूषित पानी पीने से सैकड़ों व्यक्ति दस्त और हैज़े के शिकार नहीं हो जाते। आशा है इन गर्मियों में स्वास्थ्य विभाग जागेगा और पानी के नाम पर ज़हर बेचने वाली इन ‘कोल्ड वाटर’ की रेहड़ियों की जाँच करेगा।

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रिपोर्ट –

घटनाओं से संबंधित तथ्यों को तटस्थ भाव से प्रकट करना समाचार का लक्ष्य होता है और वह सदा किसी रिपोर्ट पर आधारित होता है। किसी स्थान पर घटित किसी भी प्रकार की घटना, जो समाचार बनने की योग्यता रखती है, रिपोर्टर के द्वारा रिपोर्ट की जाती है। इसमें भावात्मकता का अभाव होता है और पूर्ण रूप से तथ्यात्मकता पर टिकी होती है। रिपोर्ट किसी घटना का सत्य वृत्तांत है जो संतुलित समाचार को मूल्यवान बनाता है – Whole truth and nothing but the truth सत्य को ठेस पहुँचाना समाचार की आत्मा को नष्ट करना है। ‘सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्’ उसका मूल मंत्र है।

गूढ़ अध्ययन पर आधारित गंभीर विद्वतापूर्ण प्रामाणिक रचना आलेख कहलाता है। इसका संबंध मस्तिष्क से होता है जबकि फ़ीचर का संबंध हृदय से होता है। आलेख बहु-आयामी, गंभीर, उच्च और व्यंग्यपूर्ण रचना होते हैं। आलेख को अनेक कमरों वाला बहुमंजिला विशाल भवन माना जा सकता है। ‘भारत में दहेज-प्रथा’ पर आलेख लिखते समय दहेज की परिभाषा, विविध कालों में इसके विविध रूप, इसके अभिशप्त आँकड़े, सरकार तथा स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा दहेज के निराकरण हेतु उठाए गए विभिन्न कदमों का विवेचन करना होगा। रिपोर्ट की भाषा सपाट, स्पष्ट होनी चाहिए लेकिन आलेख में भावात्मकता का पुट हो सकता है।

रिपोर्ट संक्षिप्त होती है तो आलेख का आकार विषय-वस्तु पर निर्भर करता हुआ बड़ा हो सकता है। रिपोर्ट (प्रतिवेदन) एक ऐसा लिखित विवरण है जिसमें तथ्यात्मकता पर आधारित किसी घटना, संस्था, विभाग में संबंधित सूचना आदि को प्रस्तुत दिया जाता है। इसका मूल कार्य सही, सीधी और सपाट जानकारी देना है। इसके द्वारा किसी कार्य की प्रगति, जाँच – स्तर, कार्य और उनके परिणामों को स्पष्ट रूप में व्यक्त किया जाता है। साहित्यिक गोष्ठियों, सभाओं, कवि सम्मेलनों, संस्थाओं की मासिक / त्रैमासिक / छमाही / वार्षिक प्रगति, व्यावसायिक संस्थानों की स्थिति या प्रगति और जाँच समितियों की रिपोर्ट के साथ-साथ आँखों देखी घटनाओं की रिपोर्ट भी की जाती है।

रिपोर्टों के द्वारा विभिन्न संस्थाओं और संस्थानों की वर्ष भर की गतिविधियों और उनकी प्रगति का विवरण संबंधित लोगों तक पहुँचा कर उसे सार्वजनिक किया जाता है। प्रत्येक स्कूल और कॉलेज की वर्ष भर की गतिविधियों की रिपोर्ट उनके द्वारा आयोजित वार्षिक खेल-कूद प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पुरस्कार वितरण समारोह आदि में प्राचार्य / प्राचार्या के द्वारा प्रस्तुत करने का प्रचलन है। व्यवसायों की प्रगति और जाँच समितियों की रिपोर्ट तकनीकी आधार पर रची जाती है। यह रिपोर्ट काफ़ी लंबी होती है और इन्हें छपवा कर प्रत्येक सदस्य को प्रेषित किया जाता है। जाँच समितियों की रिपोर्ट भी बहुत लंबी होती है जो महीनों या वर्षों के परिश्रम का परिणाम होती है।

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रिपोर्ट की विशेषताएँ –

  1. किसी भी रिपोर्ट को तथ्यों पर आधारित होना चाहिए।
  2. उसकी भाषा सरल – सीधी और पूर्ण रूप से स्पष्ट होनी चाहिए जिसमें मुहावरे लोकोक्तियों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। भाषा को अलंकारों और लक्षणा शब्द – शक्ति से रहित होना चाहिए।
  3. किसी भी शब्द या वाक्य से अनेक अर्थ नहीं निकलने चाहिए।
  4. रिपोर्ट में प्रथम पुरुष (मैं या हम) का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  5. सभी तथ्य सत्य पर आधारित और विश्वसनीय होने चाहिए। उनमें कल्पना का पुट नहीं होना चाहिए।
  6. रिपोर्ट में केवल महत्वपूर्ण तथ्यों को ही स्थान दिया जाना चाहिए। रिपोर्ट संक्षिप्त होनी चाहिए।
  7. सभी तथ्य क्रमानुसार होने चाहिए ताकि उनसे पूरी जानकारी व्यवस्थित सूचनाएँ ही प्राप्त हों।
  8. रिपोर्ट को उचित शीर्षक देना चाहिए जिससे रिपोर्ट की विषय संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके।
  9. रिपोर्ट को विषय एवं तथ्यों के आधार पर अनुच्छेदों में बँटा होना चाहिए।
  10. रिपोर्ट के अंत में रिपोर्ट लिखने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए। यदि किसी सभा/संस्था/संस्थान आदि के प्रधान या सचिव ने किसी से रिपोर्ट लिखवाई हो तो उन्हें उस पर हस्ताक्षर करने चाहिए।

रिपोर्ट लिखने से पूर्व आवश्यक तथ्यों की जानकारी –

रिपोर्ट लिखने से पहले जिन तथ्यों की पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है, वे हैं –

  1. संस्था/संस्थान /विद्यालय/महाविद्यालय आदि का नाम।
  2. उद्देश्य।
  3. स्थल, दिनांक और समय।
  4. घटना, वक्ता, मंच संचालन, प्रतिभागी, आमंत्रित अतिथि आदि।
  5. प्रगति, निर्णय, दशा-अवस्था आदि जानकारी।
  6. प्रतियोगिता या कलात्मक प्रस्तुति की जानकारी।

रिपोर्ट के कुछ उदाहरण –

1. आपके विद्यालय के कला-विभाग ने ‘बेकार पदार्थों से उपयोगी वस्तुएँ’ विषय पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया है। उसकी रिपोर्ट तैयार कीजिए।

बेकार पदार्थों से उपयोगी वस्तुएँ

हमारे विद्यालय के सभागार में ‘बेकार पदार्थों से उपयोगी वस्तुएँ’ विषय पर तीन दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जो 1 से 3 अगस्त चला। आयोजन किया गया है। इस आयोजन को कला – विभाग के द्वारा पूर्ण रूप से सफल बनाने के लिए डॉ० रमेश अग्रवाल के नेतृत्व में अध्यापक मंडल के अतिरिक्त विभिन्न कक्षाओं के पचास छात्र – छात्राओं का सक्रिय योगदान रहा। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से स्कूल की प्रत्येक कक्षा को इस प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए प्रेरित ही नहीं किया बल्कि पूरे विद्यालय में कला के प्रति जागृति- सी उत्पन्न कर दी। प्रदर्शनी को दस विभिन्न भागों में बाँटा गया था।

जिस सामान को घर में व्यर्थ और कूड़ा समझकर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाता है उसे नया रूप देकर अति आकर्षक ढंग से इस प्रकार प्रस्तुत कर दिया गया था कि उसे अब उसी घर में सजाने की इच्छा होती थी। बारहवीं कक्षा के दो छात्रों ने पुराने टायरों से बैठने योग्य सोफा सैट तैयार किया था जो आकर्षक ही नहीं अति उपयोगी भी थे। टूटे कप-प्लेट तथा क्रॉकरी को कल्पनापूर्वक जोड़-जोड़कर अनूठे रूप – आकार दे दिए गए थे। कुछ वर्ष पहले ऐसे रूप- आकार चंडीगढ़ के रॉक गार्डन में देखे थे। लगता है, कुछ विद्यार्थियों को इन्हें बनाने की उसी से प्रेरणा प्राप्त हुई होगी।

रद्दी अख़बारों, फटे-पुराने कागज़ के टुकड़ों, चीथड़ों आदि से सुंदर खिलौने और कठपुतलियाँ तैयार की गई थी। छोटी कक्षा के बच्चों ने शटल कॉक से सुंदर खिलौने तैयार किए थे। क्रिकेट की पुरानी तथा टेबल टेनिस की टूटी हुई गेंदों से गोल-मटोल मोटे लोगों की सुंदर मुखाकृतियाँ तैयार की गई थीं। नारियल के छिलकों और जूतों के पुराने डिब्बों से आकर्षक कोठियों के प्रारूप तो सभी का मन मोह लेने की योग्यता रखते थे। आधुनिक पेड़ों की टूटी-फूटी शाखाओं को कलात्मक ढंग से नए-नए रूप आकार देकर संभाल कर रखने योग्य बना दिया गया था।

विद्यालय के प्राचार्य ने प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए विद्यार्थियों की कलात्मक दृष्टि की भूरि-भूरि प्रशंसा की और बताया कि प्रदर्शनी की समाप्ति पर यह सारा सामान बेच दिया जाएगा और प्राप्त धन से निर्धन विद्यार्थियों को सहायता दी जाएगी। इस प्रदर्शनी को देखने के लिए अन्य विद्यालयों के विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में आए थे। जिन छात्र – छात्राओं की कला-कृतियाँ प्रदर्शनी में रखी गई थी, उनके माता-पिता उन्हें वहाँ देख फूले नहीं समा रहे। विद्यालय प्रशासन ने इस प्रदर्शनी की सफलता को देख निर्णय किया, कि अगले वर्ष से ऐसी प्रदर्शनी हर वर्ष आयोजित की जाएगी जिससे नई पीढ़ी की कला प्रतिभा उभर कर सामने आ सके।

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2. आपकी कक्षा के 40 विद्यार्थी एक दिन के लिए कक्षा अध्यापक के साथ हरिद्वार गए थे। कक्षा – मॉनिटर के रूप में आप इस ट्रिप की एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

एक दिवसीय हरिद्वार यात्रा

दो दिन पहले 10 सितंबर को हमारी कक्षा ग्यारहवीं ‘डी’ के इंचार्ज श्री सोमदेव चालीस विद्यार्थियों को स्कूल बस में एक दिन के लिए हरिद्वार की यात्रा पर लेकर गए थे। इस यात्रा की प्राचार्य महोदय से स्वीकृति सोमवार प्राप्त हुई थी।

पच्चीस लड़कों और पंद्रह लड़कियों की यह टोली सुबह छह बजे स्कूल परिसर में इकट्ठी हुई थी। प्रतिदिन स्कूल यूनिफॉर्म में दिखाई देने वाले सारे विद्यार्थियों की रंग-बिरंगी वेशभूषा आज अधिक सुंदर लग रही थी। सबके चेहरे पर रौनक थी। हमारी कक्षा को पढ़ाने वाले अन्य अध्यापक तथा प्राचार्य महोदय हमें विदा करने के लिए वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने हम सब को रास्ते में शरारतें न करने तथा गंगा नदी में सावधानीपूर्वक नहाने की सलाह दी। बस चलते ही सारे विद्यार्थी गप्पें लगाने और अंताक्षरी खेलने में मस्त हो गए। बस सहारनपुर में रुकी। सभी ने वहाँ नाश्ता किया। इसकी व्यवस्था की पूर्व सूचना पहले ही दे दी गई थी।

हम लगभग ग्यारह बजे हरिद्वार पहुँचे। हर की पौड़ी पर बहुत भीड़ थी। सभी ने वहाँ स्नान किया। गरमी में भी गंगा का पानी बहुत ठंडा था। नहाना बहुत अच्छा लगा। लगभग घंटा – भर तो सभी नहाते ही रहे। घाट पर वस्त्र बदल हम बस से ऋषिकेश पहुँचे। रास्ते में जितने भी दर्शनीय मंदिर और स्थल आए उन्हें देखते हुए हम आगे बढ़े थे। लक्ष्मण झूला तो सच ही इधर-उधर झूलता है। मन-ही-मन डर भी लगता रहा कि तारों पर टिका यह झूला यदि यह टूट जाए तो सबका क्या होगा। शाम को छह बजे हम वहाँ से वापिस अपने नगर को चले। चलने से पहले सभी ने बाज़ार से प्रसाद तथा छोटे-छोटे उपहार खरीदे।

लौटती बार बस में उतना शोर नहीं था जितना जाती बार था क्योंकि सब थक चुके थे। रास्ते में हम खाना खाने के लिए एक जगह रुके। रात को दस बजे हम वापिस स्कूल पहुँच गए जहाँ सभी के मम्मी- पापा लेने के लिए पहुँचे हुए थे। हमारा ट्रिप वास्तव में ही यादगार रहा। हम इसे कभी नहीं भूल सकते।।

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3. आपकी कक्षा में अध्यापक की अनुपस्थिति में दो छात्रों ने मॉनीटर की अनदेखी करके और उसके आदेश को न मानते हुए आपस में लड़ाई-झगड़ा किया। इस घटना की लिखित रिपोर्ट कक्षा अध्यापक को दीजिए ताकि दोषी छात्रों के विरुद्ध उचित कार्रवाई की जा सके।

दो उद्दंड छात्रों की कक्षा में अनुशासनहीनता

आज तीसरे पीरियड में हमारे गणित के अध्यापक श्री जतिंद्र आर्य अवकाश पर होने के कारण कक्षा में नहीं आए थे। कक्षा मॉनीटर के रूप में मैं कक्षा को नियंत्रित कर रहा था। मैंने श्यामपट पर एक प्रश्न लिख दिया था ताकि विद्यार्थी उसे तब तक हल करें जब तक आर्य साहब की जगह कोई अन्य अध्यापक कार्यालय के द्वारा वहाँ न भेज दिए जाएँ। जब मेरा मुँह श्यामपट की ओर था तब मुझे नरेश के द्वारा राजन को दी गई गाली की आवाज़ सुनाई दी। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो नरेश ने राजन और राजन ने नरेश की कमीज़ को गले से पकड़ा हुआ था।

जब मैंने उन्हें ऐसा न करने के लिए कहा तो वे दोनों एक साथ बोले कि वह उनके बीच का मामला है, इसलिए मुझे उन दोनों के बीच बोलने का कोई हक नहीं है। फिर भी जब मैंने उनके निकट जाकर उन्हें छुड़वाने का प्रयत्न किया तो उन्होंने मुझे धक्का देकर गिरा दिया। उसके बाद वे गुत्थमगुत्था हो गए और उन्होंने एक-दूसरे को ठोकरें मारीं, मुक्के मारे और गाली-गलौच किया। इससे सारी कक्षा में अव्यवस्था फैल गई। साथ की कक्षा से श्री गुप्ता ने आकर उन दोनों के बीच झगड़े को शांत कराया तथा विद्यार्थियों को उनकी जगह पर बिठाया।

इस घटना से मैंने स्वयं को मॉनीटर के रूप में अपमानित महसूस किया। इन दोनों छात्रों को किसी-न-किसी प्रकार अहसास कराया जाना चाहिए कि उनका कक्षा में यह व्यवहार ठीक नहीं था। कृपया इन दोनों के विरुद्ध उचित कार्रवाई कर कक्षा का पहले के समान अनुशासन और व्यवस्था का प्रबंध करें।

4. आपके घर के बाहर खड़ी आपकी मोटर साइकिल चोरी हो गई है। उसकी रिपोर्ट थाने में लिखित रूप में कीजिए।

मोटर साइकिल की चोरी

आज 25 जून को दोपहर के समय मेरे घर 546 – आदर्श नगर के बाहर खड़ी मोटर साइकिल नंबर एच आर – 51 चोरी हो गई है। मैंने बाज़ार से वापिस लौट कर लगभग 2 बजे इसे बाहर खड़ी की थी। इसे लॉक किया था और इसकी चाबी अब भी मेरे पास है। लगभग पंद्रह मिनट बाद जब मैं अपने मित्र के घर जाने के लिए बाहर निकला तो वह अपने स्थान पर नहीं था। मैंने आसपास सभी से इसके बारे में पूछा पर किसी ने मोटर साइकिल या इसे चुराने वाले को देखने में अनभिज्ञता प्रकट की।

मैंने यह मोटर साइकिल पिछले महीने एकता ऑटोमोबाइल्ज़ से खरीदा था। यह हीरो होंडा कंपनी का बना है और सिल्वर ग्रे रंग का है। इसकी क्रय समय रसीद की फोटो कॉपी साथ संलग्न कर रहा हूँ। कृपया मेरी मोटर साइकिल को शीघ्र अति शीघ्र ढूँढ़वा दें।

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5. आपके विद्यालय प्रबंधन में कुछ ऐसी अव्यवस्थाएँ हैं जिनके कारण छात्र-छात्राओं को परेशानी होती है। स्कूल के हैड ब्वाय के रूप में इससे संबंधित एक रिपोर्ट लिखिए।

छात्र – छात्राओं की परेशानी के कारण

हमारा विद्यालय नगर का अति प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान है। इसका परीक्षा परिणामों की दृष्टि से राज्य भर में नाम है। अच्छी शिक्षा, मेहनती अध्यापकवर्ग, श्रेष्ठ अनुशासन और विद्यार्थियों की बड़ी संख्या के बावजूद इसके प्रबंधन में कुछ ऐसी अव्यवस्थाएँ हैं जो सभी छात्र – छात्राओं को खलती हैं। हमारे विद्यालय में शुद्ध पेयजल और जलनिकासी दोनों का अभाव है। विद्यार्थियों और अध्यापक वर्ग के लिए पीने के जल की व्यवस्था अच्छी नहीं है। यद्यपि विद्यालय में छह कूलर इसके लिए अलग-अलग स्थानों पर लगवाए गए हैं पर उन पर जलशोधन की व्यवस्था नहीं है। टंकी से आने वाला जल ठंडा तो अवश्य होता है पर साफ़ नहीं।

वर्षा ऋतु में वर्षा का जल खेल के मैदानों में भर जाता है। वहाँ से जल निकासी का कोई साधन नहीं है। वे मैदान कई दिन तक तालाबों का रूप लिए रहते हैं। खेल – कूद की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। विद्यालय में शौचालय हैं पर उनमें जल की उचित व्यवस्था न होने के कारण स्वच्छता का पूर्ण अभाव बना ही रहता है। वे अनेक बीमारियों के कारक बन सकते हैं। हमारे विद्यालय की कक्षाओं के कमरों से प्रयोगशालाओं के बीच लगभग 200 मीटर की दूरी है। वर्षा के दिनों में बारिश के कारण इस दूरी को पार करने में समस्या होती है क्योंकि वह रास्ता ऊपर से ढका हुआ नहीं है। यह ढका हुआ होना चाहिए जैसा कि अन्य विद्यालयों में है। हमारा साइकिल स्टैंड कुछ छोटा है जिस कारण अनेक छात्र – छात्राओं को साइकिलें बाहर रखनी पड़ती हैं। असुरक्षित होने के साथ-साथ वे आने-जाने वालों के राह में रुकावट बनती हैं। इन अव्यवस्थाओं के कारण सभी छात्र-छात्राओं के साथ अध्यापक वर्ग को परेशानी होती है।

6. बस स्टैंड पर हुए बम विस्फोट के आप प्रत्यक्षदर्शी हैं। इसकी एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

बस स्टैंड में बम विस्फोट

आज 9 अगस्त को प्रातः 8.00 बजे भीड़-भाड़ से भरे अति व्यस्त बस स्टैंड में बम विस्फोट हो गया। विस्फ़ोट का ज़ोरदार धमाका दूर-दूर तक सुना गया। उसके कारण उत्पन्न काला धुआँ आकाश में देर तक छाया रहा। बम से निकले छर्रों से चार लोग घायल हो गए लेकिन इससे किसी के जीवन की क्षति नहीं हुई। विस्फोट के कारण कुछ खिड़कियों के शीशे टूट गए। वहाँ उपस्थित लोगों में मची भगदड़ से कुछ लोगों को गिरने के कारण हलकी चोटें आईं। पुलिस ने तत्काल विस्फोट स्थल को घेर लिया। वह कारणों की जानकारी प्राप्त कर रही है। विस्फ़ोट एक साइकिल के पीछे रखे थैले में विस्फोटक सामग्री के कारण हुआ। इस विस्फ़ोट के पीछे आतंकवादियों का हाथ हो सकता है।

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7. आपके विद्यालय में संस्थापक दिवस पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया जिसमें अध्यापकों और विद्यार्थियों ने रक्तदान किया। आप इसकी रिपोर्ट तैयार कीजिए।

संस्थापक दिवस पर विद्यालय में रक्तदान शिविर का आयोजन

आज 18 सितंबर को प्रातः दस बजे से दोपहर दो बजे तक रेडक्रॉस सोसायटी के द्वारा विद्यालय के सभागार में रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। यह आयोजन विद्यालय की संस्थापक सेठ धन्नामल की पुण्य स्मृति में प्रतिवर्ष की तरह इस बार भी किया गया। प्राचार्या श्री राकेश भारद्वाज ने सबसे पहले स्वयं रक्तदान कर शिविर का शुभारंभ किया। विद्यालय के पंद्रह अध्यापक और अध्यापिकाओं ने रक्तदान कर विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाया। ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के 150 विद्यार्थियों ने रक्तदान किया।

इस अवसर पर विद्यालय की प्रबंधक समिति के प्रधान ने सभी रक्तदाताओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा बताया कि रक्त की एक-एक बूँद किसी जरूरतमंद की जीवन रक्षा कर सकती है। रक्तदान ही महादान है। रेडक्रॉस के अधिकारियों की ओर से सभी रक्तदाताओं को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए तथा उन्होंने विद्यालय को धन्यवाद दिया।

CBSE Class 12 Hindi Elective रचना नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन

8. शिक्षक दिवस पर ‘गुरुवंदन छात्र अभिनंदन’ कार्यक्रम उत्साहपूर्वक आपके विद्यालय के प्रांगण में मनाया गया। इसकी एक रिपोर्ट लिखिए।

गुरुवंदन छात्र अभिनंदन

विद्यालय की प्रबंध समिति की ओर से विद्यालय में शिक्षक दिवस के पवित्र अवसर पर शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इसमें 11 शिक्षिकाओं को सम्मानित किया गया। इस समारोह में छठी से बारहवीं कक्षा के 50 मेधावी छात्र – छात्राओं को भी पुरस्कृत किया गया। समारोह की अध्यक्षता दिल्ली प्रदेश उत्तर के अध्यक्ष एवं पूर्व महापौर श्री महेश चंद्र शर्मा ने की। पुरस्कार वितरण श्री सुरेंद्र वधवा, राष्ट्रीय वित्त मंत्री, श्री सुनील गर्ग, महासचिव, श्री कपूर चंद्र गोयल, सचिव ने किया। श्री सुरेंद्र वधवा ने बताया कि शिक्षक राष्ट्र-निर्माता होता है। इनका सम्मान राष्ट्र का सम्मान। पुरस्कार वितरण भूपेंद्र मोहन भंडारी और श्री अरुण जैन व श्री गुलशन मखीजा द्वारा किया गया श्री कपूर चंद गोयल ने सभी को धन्यवाद दिया।

9. आपके गणित के अध्यापक पिछले सप्ताह सेवानिवृत्त हो गए। उनका विदाई समारोह छात्रों और अध्यापकों ने मिलकर मनाया। इसकी एक रिपोर्ट लिखिए।

श्री आनंदस्वरूप सेवानिवृत्त

गत मास दिसंबर में गणित विभाग के अध्यक्ष श्री आनंद स्वरूप तीस वर्ष की लंबी और सफल सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो गए। वे छात्रों में अति लोकप्रिय थे। गणित जैसे कठिन और शुष्क विषय को उन्होंने कभी किसी के लिए बोझ नहीं बनने दिया था। विदाई समारोह का आयोजन सभागार में किया गया था जिसमें आठवीं से बारहवीं कक्षा के सभी छात्र-छात्राएँ तथा विद्यालय के सभी अध्यापकगण उपस्थित थे। हिंदी के अध्यापक श्री रमेश लाल ने मंच संचालन करते हुए सारे वातावरण को भावुकता से भर दिया था। उन्होंने श्री आनंद स्वरूप के सद्गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उनके जीवन की उन घटनाओं को सुनाया जो छात्र – छात्राओं को पता नहीं थीं। अनेक अध्यापकों और छात्र – छात्राओं ने उनके गुणों पर प्रकाश डाला। मुख्य अध्यापक श्री समीर सक्सेना ने उनकी कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा की।

अंत में श्री आनंद स्वरूप ने स्वयं सभी का धन्यवाद किया और विद्यालय को अपनी कर्मभूमि बताया जहाँ उन्होंने तीस वर्ष सफलतापूर्वक व्यतीत किए। विद्यालय की ओर से उन्हें प्रशस्ति पत्र, शॉल और एक स्मृति चिह्न भेंट किया गया, जिससे वे अभिभूत हो उठे और उनकी भावुकतावश आँखें छलछला आईं। विद्यालय के लॉन में चाय पार्टी के बाद समारोह संपन्न हो गया।

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10. विद्यालय में ‘हेड ब्वाय’ और ‘हेड गर्ल’ के चुनाव के लिए बुलाई गई सभा की कार्रवाई से संबंधित रिपोर्ट लिखिए।

हेड ब्वाय और हेड गर्ल का चुनाव

आज 10 अप्रैल को विद्यालय के सभागार में दसवीं से बारहवीं कक्षा के सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों की उपस्थिति में इस वर्ष के लिए हेड ब्वाय और हैड गर्ल का चुनाव किया गया। मुख्याध्यापक श्री नरेंद्र कुमार गुप्ता ने ‘हेड ब्वाय’ और ‘हेड गर्ल’ की विद्यालय प्रशासन के लिए उपयोगिता और महत्व बताया। हेड ब्वाय के लिए दो लड़कों के नाम प्रस्तावित किए गए थे। सभी छात्र – छात्राओं से हाथ खड़ा कर राजेश और योगेश में से किसी एक को चुनने के लिए कहा गया था। योगेश के पक्ष में अधिक छात्र – छात्राओं ने हाथ खड़े कर अपना समर्थन दिया था। ‘हेड गर्ल’ के रूप में अनुष्का को निर्विरोध चुन लिया गया। चुने गए हेड ब्वाय और हेड गर्ल ने सभी का धन्यवाद किया।

11. स्कूल के जीव विज्ञान क्लब के द्वारा आयोजित गोष्ठी की रिपोर्ट लिखिए।

पर्यावरण संबंधी गोष्ठी का आयोजन

जीव विज्ञान क्लब के तत्वावधान में पर्यावरण संरक्षण एवं परिस्थिति विषयक गोष्ठी बौद्धिक प्रमुख डॉ० प्रमोद कुमार ‘अनंग’ के सभापतित्व में संपन्न हुई। इस अवसर पर चिंतक डॉ० अवधेश पांडेय ने कहा कि ज्वलंत विषय पर गोष्ठी अत्यंत सराहनीय है। प्रदूषण से उत्पन्न होने वाले खतरों से आगाह कराते हुए उन्होंने कहा कि हमारे समाज में अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पेड़-पौधों की कटाई बेखौफ जारी है। इन्हें रोके जाने की ज़रूरत है। स्कूल के उपाचार्य डॉ० वशिष्ठ मति ने कहा कि कंपोस्ट खाद का प्रयोग कर अन्न के उपयोग से तमाम तरह की बीमारियों से बचा जा सकता है।

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12. ‘भारत को जानो’ अंतर्विद्यालयी क्विज प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। उसकी रिपोर्ट लिखिए।

भारत को जानो प्रतियोगिता’ का अंतर्विद्यालय स्तरीय आयोजन 25 सितंबर को आई० एम० ए० भवन में किया गया। प्रथम चरण में 480 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया जिनमें से चयनित 21 विद्यालयों की वरिष्ठ एवं कनिष्ठ वर्ग की टोलियों ने शाखा स्तरीय प्रतियोगिता में भागीदारी की। चुनी गई चार- चार टोलियों के मध्य हुए मौखिक प्रश्न- मंच से वरिष्ठ वर्ग में मॉडर्न स्कूल और कनिष्ठ वर्ग में डी० ए० वी० स्कूल ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त विद्यालयों को वैजयंती शाखा – अध्यक्ष श्री नरोत्तम दास अग्रवाल के सौजन्य से भेंट की गई।

CBSE Class 12 Hindi Elective रचना कैसे लिखें कहानी

Refer to the 12th Class Hindi Book Antra Questions and Answers CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana कैसे लिखें कहानी to develop Hindi language and skills among the students.

CBSE Class 12 Hindi Elective Rachana कैसे लिखें कहानी

प्रश्न 1.
कहानी क्या है ? परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
कहानी एक ऐसी साहित्यिक विधा है, जो अपने सीमित क्षेत्र में पूर्ण एवं स्वतंत्र है, प्रभावशाली है। कहानी में मानव जीवन की कथा होती है। अलग-अलग विद्वानों और लेखकों ने कहानी की विभिन्न परिभाषाएँ दी हैं परंतु कहानी की परिभाषा को लेकर एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते। प्रेमचंद ने कहानी की परिभाषा इस प्रकार दी है –
“कहानी एक रचना है, जिसमें जीवन के किसी अंग, किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य होता है। उसका चरित्र, उसकी शैली तथा कथा – विन्यास सब उसी भाव को पुष्ट करते हैं।” किसी घटना, पात्र या समस्या का क्रमबद्ध ब्योरा जिसमें परिवेश हो, द्वंद्वात्मकता हो, कथा का क्रमिक विकास हो, चरम उत्कर्ष का बिंदु हो, उसे कहानी कहा जा सकता है

प्रश्न 2.
कहानी का हमारे जीवन से क्या संबंध है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आदिम युग से ही कहानी मानव जीवन का प्रमुख हिस्सा रही है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में कहानी सुनता और सुनाता है। प्रत्येक मनुष्य में अपने अनुभव बाँटने और दूसरों के अनुभवों को जानने की प्राकृतिक इच्छा होती है। यह भी कहा जा सकता है कि प्रत्येक मनुष्य में कहानी लिखने की मूल भावना होती है। यह दूसरा सत्य है कि कुछ व्यक्तियों में कहानी की यह भावना विकसित हो जाती है और कुछ इस भावना को विकसित करने में समर्थ नहीं होते।

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प्रश्न 3.
कहानी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कहानी का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव का इतिहास। कहानी मानव स्वभाव का एक प्रमुख हिस्सा है। कहानी सुनने और कहानी कहने की प्रवृत्ति मनुष्य में आदिम युग से है। जैसे-जैसे आदिम कला का विकास होता गया उसी प्रकार कथा वाचक कहानी सुनाते गए और श्रोता कहानी सुनते रहे। कहानी में किसी घटना, युद्ध, प्रेम, प्रतिशोध के किस्से सुनाए जाते थे और श्रोता इन किस्से, कहानियों को बहुत ही चाव से सुनते थे। फलस्वरूप कहानी कला धीरे-धीरे विकसित होती चली गई।

प्रश्न 4.
कल्पना किस प्रकार कहानी बनती है ? विवरण कीजिए।
उत्तर :
कल्पना करना मानव का स्वभाव और गुण है। कई बार घटना सच्ची होती है परंतु उसे सुनाते समय अपने आप कल्पना का मिश्रण हो जाता है। मनुष्य वही सुनना पसंद करता है जो प्रिय लगता है। मान लीजिए युद्ध क्षेत्र में हमारा नायक हार गया है परंतु हम यह सुनना ज़रूर पसंद करेंगे कि वह किस प्रकार वीरता से लड़ा। कितनी वीरता से लड़ते हुए उसने एक बड़े और अच्छे उद्देश्य के लिए अपने प्राणों की कुर्बानी दी। नायक की वीरता का बखान करने वाले कथावाचक की सभी प्रशंसा करते हैं और कुछ उसे ईनाम भी देते हैं। कथावाचक सुनने वालों की इच्छानुसार अपनी कल्पना के माध्यम से नायक के गुणों का वर्णन रोचकता के साथ करता है। इस प्रकार कल्पना कहानी में परिवर्तित हो जाती है।

प्रश्न 5.
प्राचीनकाल में मौखिक कहानी की लोकप्रियता का क्या कारण था ?
उत्तर :
प्राचीनकाल में मौखिक कहानियों की लोकप्रियता इसलिए अधिक थी क्योंकि संचार माध्यमों की कमी थी। कोई बड़ा संचार का साधन नहीं था जिससे मनोरंजन किया जा सके। दिनभर कार्य करने के पश्चात रात के समय कहानी सुनने और सुनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। धर्म प्रचारकों ने भी अपने विचारों को प्रचार-प्रसार करने के लिए इसी सिद्धांत का सहारा लिया। शिक्षा संबंधी कार्यों में कहानी विधा का प्रयोग प्रचलित है। छोटे बच्चे कहानी के माध्यम से शिक्षा की बात को जल्दी ग्रहण करते हैं। ‘पंचतंत्र’ की कहानियों के माध्यम से बच्चों में शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता था क्योंकि पंचतंत्र की कहानियाँ शिक्षाप्रद होने के साथ रोचक भी थीं। इस प्रकार प्राचीनकाल से कहानी के साथ उद्देश्य जुड़ा है जो आगे चलकर विकसित होता गया।

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प्रश्न 6.
कहानी का केंद्र-बिंदु कथानक होता है। स्पष्ट कीजिए।
अथवा
कहानी का कथानक क्या होता है ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कहानी की सभी घटनाओं को कथानक कहते हैं। कथानक कहानी प्रथम मसौदा अथवा नक्शा होता है। जिस प्रकार मकान बनाने से पहले घर का नक्शा बनाया जाता है उसी प्रकार कहानी लिखने से पहले उसका कथानक कागज़ पर लिखा जाता है। कहानी का कथानक आमतौर पर किसी घटना, जानकारी, अनुभव या कल्पना पर आधारित होता है। यह घटना, जानकारी या अनुभव कहानीकार के मन अथवा दिमाग में अंकित होता है। कोई एक प्रसंग मात्र भी कहानी का कथानक हो सकता है। एक छोटी-सी घटना कथानक की प्रमुख घटना हो सकती है।

उसके बाद कहानीकार इसी छोटी-सी घटना या प्रसंग का विस्तार देने में कल्पना का सहारा लेता है। यह भी सत्य है कि कहानीकार की कल्पना ‘कोरी’ कल्पना नहीं होती। कल्पना असंभव नहीं होनी चाहिए। बल्कि कल्पना ऐसी होनी चाहिए कि उसमें संभावनाएँ निहित हों। कहानीकार किसी समस्या और उद्देश्य को भी कथानक का केंद्र – बिंदु बनाता है। संपूर्ण कहानी कथानक के इर्द-गिर्द घूमती है। इस प्रकार कथानक कहानी का केंद्र – बिंदु होता है।

प्रश्न 7.
देशकाल और वातावरण कहानी लेखन में किस प्रकार आवश्यक है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर :
जब कहानीकार कहानी के कथानक का स्वरूप बना लेता है तब वह कथानक को देशकाल और वातावरण के साथ जोड़ने का प्रयास करता है। देशकाल और वातावरण कहानी को प्रामाणिक और रोचक बनाने के लिए अति आवश्यक होता है। कथानक का देशकाल और वातावरण से सीधा संबंध होता है। अगर कथानक की घटनाएँ वातावरण से मेल नहीं खातीं तो कहानी असफल साबित हो जाती है। यानि कि कहानीकार जिस परिवेश से कहानी के कथानक को जोड़ना चाहता है उस परिवेश के बारे में कहानीकार को संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए तभी वह कथानक का विस्तार कर सकता है।

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प्रश्न 8.
कहानी में चरित्रों का क्या महत्व है ? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
कहानी में पात्रों के चरित्र-चित्रण का क्या स्थान होता है ?
उत्तर :
चरित्र किसी भी कहानी के मूल होते हैं। बिना चरित्रों के कहानी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। देशकाल और वातावरण के बाद कहानीकार कहानी के पात्रों पर विचार करता है। प्रत्येक पात्र का अपना स्वभाव और स्वरूप होता है। वे किसी-न-किसी उद्देश्य से जुड़े होते हैं। चरित्र के विकास के साथ कहानी का विकास होता है। इसलिए पात्रों का ठीक चयन कहानी की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिन पात्रों के बारे में लेखक को जानकारी नहीं है। उनके चित्रण से कहानीकार को बचना चाहिए।

पात्रों के आपसी संबंध भी कहानी में स्पष्ट होने चाहिए। कौन-सा पात्र किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करता है कहानीकार को इसकी समझ होनी चाहिए। कहानी में चरित्रों के गुणों और अवगुणों का वर्णन होना अति आवश्यक है। ऐसा न हो पाने पर पाठक, पात्रों के साथ तारतम्य नहीं जोड़ पाता। पात्रों का चित्रण उनकी अभिरुचियों और आदतों के अनुसार भी होता है। मान लीजिए एक पात्र जंगल में जाकर खतरनाक जानवरों के चित्र खींचता है। निश्चित रूप से यह पात्र साहसी व्यक्ति होगा। इस प्रकार कहानी में चरित्रों का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 9.
कहानी में संवाद योजना कैसी होनी चाहिए ? संक्षेप में लिखिए
उत्तर :
कहानी लेखन में संवाद योजना एक महत्वपूर्ण तत्व है। बिना संवाद के पात्रों की कल्पना ही संभव नहीं है। संवाद ही किसी पात्र का स्वरूप और विकास निश्चित करते हैं। संवाद कहानी के कथानक को गति प्रदान करते हैं। संवादों के माध्यम से घटनाओं का वर्णन भी किया जाता है। पात्रों के निर्माण में भी संवाद सहायक सिद्ध होते हैं। इसलिए कहानी लेखन में संवाद का महत्व लगातार बना रहता है। पात्रों के संवाद लिखते समय लेखक को यह ध्यान रखना चाहिए कि संवाद उस पात्र के स्वभाव और पृष्ठभूमि के अनुकूल हों।

संवाद के माध्यम से किसी भी पात्र के आदर्श, विश्वास, संस्कार और परिस्थितियाँ प्रदर्शित होती हैं। संवाद लिखते समय लेखक स्वयं पर्दे के पीछे चला जाता है। उस समय लेखक नहीं उसके पात्र बोलते हैं। संवाद छोटे, सटीक, स्वाभाविक एवं उद्देश्यपूर्ण होने चाहिए। संवादों का अत्यधिक विस्तार और लंबापन कथानक में विरोध पैदा करता है। फलस्वरूप कहानी असफल हो जाती है।

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प्रश्न 10.
कहानी के कथानक में पात्रों के द्वंद्व का क्या महत्व है ?
उत्तर :
कहानी के कथानक में पात्रों के द्वंद्व का अत्यधिक महत्व है। उदाहरण के लिए कहानी के दो पात्र किसी बात के लिए अलग-अलग मत रखते हैं। वे अपनी बात ठीक साबित करने के लिए अलग-अलग तर्क देते हैं। यही असहमति कहानी में रोचकता पैदा करती है। अगर द्वंद्व नहीं होगा तो कहानी का कथानक सपाट होगा एवं रुचिकर भी नहीं होगा। द्वंद्व के कारण कहानी का कथानक सरलता से आगे बढ़ेगा तथा पाठक के लिए यह जिज्ञासा बनी रहेगी कि किस पात्र की जीत हुई है। मानसिक द्वंद्व भी कथानक को रोचक बनाता है। मानव मन में उद्वेलित होती हुई भावनाएँ कथानक में द्वंद्व उत्पन्न करती हैं। कहानीकार अपने कथानक में जितना अधिक द्वंद्व के बिंदुओं को स्पष्ट लिखेगा कहानी उतनी ही रोचक एवं सफल सिद्ध होगी। इस प्रकार कहानी के कथानक में द्वंद्व का एक विशेष महत्त्व है।

पाठ से संवाद –

प्रश्न 1.
चरित्र-चित्रण के कई तरीके होते हैं। ‘ईदगाह’ कहानी में किन-किन तरीकों का इस्तेमाल किया गया है ? इस कहानी में आपको सबसे प्रभावी चरित्र किसका लगा और कहानीकार ने उसके चरित्र-चित्रण में किन तरीकों का उपयोग किया है ?
उत्तर :
कहानी में किसी भी पात्र का चरित्र चित्रण उसके क्रिया-कलापों, संवादों तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा उससे संबंधित बोले गए संवादों से होता है। लेखक स्वयं भी किसी पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को उजागर करने के लिए कुछ संकेत दे देता है। ‘ईदगाह’ कहानी में लेखक ने पात्रों के चरित्र चित्रण के लिए इन सभी तरीकों का प्रयोग किया है। ‘ईदगाह’ कहानी का पात्र ‘हामिद’ हमें सबसे अधितक प्रभावित करता है। लेखक ने हामिद का परिचय देते हुए लिखा है – वह चार-पाँच साल का गरीब सूरत दुबला-पतला लड़का।

जिसका बाप गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती होती एक दिन मर गई। लेखक ने संवादों के माध्यम से भी हामिद के चरित्र को स्वर प्रदान किया है। हामिद का मेले से चिमटा खरीदना उसके मन में अपनी दादी के प्रति संवेदनाओं को व्यक्त करता है। उसे रोटी पकाते समय दादी के हाथ के जलने की चिंता रहती थी, इसलिए उसने चिमटा खरीदा। हामिद का मिठाई और मिट्टी के खिलौनों पर पैसे बर्बाद न करना उसकी समझदारी को व्यक्त करता है। इस प्रकार ‘ईदगाह’ कहानी में लेखक ने स्वयं, संवादों के माध्यम से तथा अन्य बच्चों के वार्तालापों से हामिद का चरित्र चित्रण किया है।

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प्रश्न 2.
संवाद कहानी में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है। महत्त्व के हिसाब से क्रमवार संवाद की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कहानी में संवादों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। संवाद कहानी को गति प्रदान करते हैं। कहानी में चित्रित पात्रों का चरित्र-चित्रण संवादों के माध्यम से होता है। जो घटना अथवा प्रतिक्रिया कहानीकार होती हुई नहीं दिखा सकता उसे संवादों के द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। संवादों से पात्रों के बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक स्तरों का ज्ञान भी हो जाता है। उदाहरण के लिए ‘ईदगाह’ कहानी मुस्लिम परिवेश को व्यक्त करती है इसलिए इसके संवादों में उर्दू के शब्दों की अधिकता है। अधिकतर संवाद बच्चों के हैं इसलिए बच्चों की कल्पनाओं को भी पूरी तरह से उभारा गया है। जैसे – जिन्नात को मिलने वाले रुपयों के बारे में मोहसिन और हामिद का यह वार्तालाप –
मोहसिन ने कहा – “जिन्नात को रुपयों की क्या कमी ? जिस खजाने में चाहें, चले जाएँ। ”
हामिद ने फिर पूछा – ” जिन्नात बहुत बड़े – बड़े होते हैं। ”
मोहसिन – ” एक – एक का सिर आसमान के बराबर होता है। ”
इस वार्तालाप से बच्चों के भोलेपन, कौतूहल आदि चारित्रिक गुणों का भी पता चलता है। संवाद पात्रों के स्तर के अनुरूप, सरल, सहज, स्वाभाविक, संक्षिप्त तथा अवसरानुकूल होने चाहिए। अनावश्यक रूप से लंबे संवाद कथानक में गतिरोध उत्पन्न कर देते हैं।

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए चित्रों के आधार पर चार छोटी-छोटी कहानियाँ लिखए।

1.
CBSE Class 12 Hindi Elective रचना कैसे लिखें कहानी 1

एक दिन राम घर में घूम रहा था और उसकी माँ अपना काम कर रही थीं। अचानक उसकी माँ की नज़र उसके शहीद पति मेजर करण सिंह पर पड़ी। उसने राम को बुलाते हुए कहा कि क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता का देहांत कब हुआ था ? उनको मरे हुए एक वर्ष हो गया था। राम ने बिलकुल ठीक-ठाक उत्तर दे दिया। उसकी माँ ने उसे उन्हें प्रणाम करने को कहा। दोनों ने उनको प्रणाम किया और भगवान से प्रार्थना की कि अगले जन्म में वे ही हमारे परिवार के सदस्य बनें। उनके परिवार में शहीद की पत्नी और उनका आठ साल का लड़का राम रहते थे। राम ने बड़े ही आदर से अपनी माँ से पूछा कि उनका देहांत कैसे हुआ था। उसकी माँ ने बताया कि दुश्मनों को मारते-मारते वह खुद भी चल बसे। उन्होंने वहाँ दीपक जलाया और वापस अपने-अपने कामों में लग गए।

CBSE Class 12 Hindi Elective रचना कैसे लिखें कहानी

2.
CBSE Class 12 Hindi Elective रचना कैसे लिखें कहानी 2

एक रात एक चोर किसी के घर चोरी करके आया था। जाते-जाते उसने देखा कि एक सरकारी नौकर पेड़ काट रहा था। रात बहुत हो चुकी थी। सारा शहर सो गया था। कोई वाहन सड़क पर नहीं था। केवल चोर और वह पेड़ काटने वाला ही सड़क पर थे। चोर ने सारा तमाशा एक कोने में खड़े होकर देखा। पहले तो वह बहुत खुश हो रहा था। लेकिन बाद में जब उसने सारा पेड़ काट दिया तो उस पत्थर दिल में थोड़ी हमदर्दी उस पेड़ के लिए आई। धीरे-धीरे उस चोर का दिल मोम की तरह पिघल गया। उसने सोचा कि यह पेड़ हमें छाया देते हैं। यह उसे काटे जा रहा है। उसने चोरी किया हुआ सामान वापस उस घर में रखा जहाँ से उसने चोरी की थी। वापस आकर देखा तो सारा पेड़ कट चुका था और वह आदमी वहीं उसे काटकर सो गया था। चोर ने अपनी बंदूक साथ के तालाब में फेंक दी और प्रण लिया कि वह सारे बुरे काम छोड़ देगा और एक अच्छा आदमी बन कर रहेगा। उसने अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। उसे एक साल की जेल हुई। बाहर आने पर उसने कुछ कमाने के लिए टी-स्टॉल खोल लिया और खुशी-खुशी जीने लगा।

3.
CBSE Class 12 Hindi Elective रचना कैसे लिखें कहानी 3

राजू और उसकी माँ हर रोज़ की तरह अपना-अपना काम कर रहे थे। उसकी माँ फ़ोन पर बात कर रही थी और वह बाहर खेल रहा था। वह घर पर आया और सीधा रसोई की तरफ़ चल पड़ा। वह बहुत प्यासा था। गैस खुली हुई थी। उसने जैसे ही लाइट का स्विच ऑन किया वैसे ही धमाका हुआ और रसोई में आग लग गई। उसने चिल्लाना शुरू कर दिया – ‘ बचाओ – बचाओ।’ उसकी माँ ने आवाज़ सुनी और वह घबरा गई। वह मदद के लिए आस-पास के घरों में भागी लेकिन कोई मदद करने को तैयार नहीं था। उसने फ़ोन उठाया और 102 पर डॉयल किया। फॉयरब्रिगेड को आने में पंद्रह मिनट लगने थे। उसने आग बुझाने की पूरी कोशिश की लेकिन आग धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। राजू बेहोश हो गया था। अचानक फॉयरब्रिगेड आई और उसने आग बुझा दी। राजू को फ़ौरन अस्पताल पहुँचा दिया गया। थोड़े दिनों में ही वह ठीक हो गया और फिर से खेलने लगा। उसकी माँ ने सीखा कि कभी भी गैस खुली नहीं छोड़नी चाहिए।

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प्रश्न 4.
एक कहानी में कई कहानियाँ छिपी होती हैं। किसी कहानी को किसी खास मोड़ पर रोककर नई स्थिति में कहानी को नया मोड़ दिया जा सकता है। नीचे दी गई परिस्थिति पर कहानी लिखने का प्रयास करें –
“सिद्धेश्वरी ने देखा कि उसका बड़ा बेटा रामचंद्र धीरे-धीरे घर की तरफ़ आ रहा है। रामचंद्र माँ को बताता है कि उसे अच्छी नौकरी मिल गई।” आगे की कहानी आप लिखिए।
उत्तर :
सिद्धेश्वरी ने देखा कि उसका बड़ा बेटा रामचंद्र धीर-धीरे घर की तरफ़ आ रहा है। रामचंद्र माँ को बताता है कि उसे अच्छी नौकरी मिल गई। सुनते ही माँ खुशी से झूम उठी और आँगन की ओर दौड़ पड़ी। वहाँ चारपाई पर लेटे हुए अपने पति को जगाकर कहती है – सुनते हो ! अपने राम को अच्छी नौकरी मिल गई है।’
राम के पिता ऊँघते हुए उठ बैठते हैं और राम को अपने पास बैठाकर उससे पूछते हैं – कहाँ नौकरी मिली है ?
राम – मल्होत्रा बुक डिपो में।
पिता – क्या वेतन मिलेगा ?
राम – बीस हज़ार रुपए।
यह सुनते ही राम के पिता और माता उस पर न्योछावर हो उठते हैं। उन्हें लगता है कि अब तो उनके दिन फिर जाएँगे और घर में खुशहाली आ जाएगी। राम के पिता मिठाई लेने बाहर निकल जाते हैं और माँ राम को प्यार से खाना खिलाने लग जाती हैं।